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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 170 में से

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पृष्ठ 45

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ३३
सेनाओं के इधर-उधर भागने पर जो वीर उसको रक्षा के लिए
शत्रु के सन्मुख होता है, उसे यज्ञ करने का फल होता है ॥ ३५ ॥
यस्य छेदक्षतं गात्रं शर-मुद्गर-यष्टिभिः ।
देवकन्यास्तु तं वारं हरन्ति रमयन्ति च ॥३६॥
जिस वीर पुरुष का शरीर वाण, मुद्गर तथा लाठियों की चोट से
क्षत-विक्षत हो जाता है, उस वीर पुरुष को देव-कन्याएँ अपने स्थान
में ले जाती हैं और उससे रमण करता हैं ॥ ३६ ॥
देवाङ्गना-सहस्राणि शूरमायोधने हतम् ।
त्वरमाणाः प्रधावन्ति 'मम भर्त्ता ममेति' च ॥३७॥
युद्ध में शत्रु-सन्मुख लड़कर मरनेवाले वीरों को हजारों
देवांगनाएँ यह कहती उसके निकट दौड़ती हुई आती हैं कि 'यह
मेरा पति है', 'यह मेरा पति है' ॥ ३७ ॥
ये यज्ञसङ्घस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणो यत्र यथैव यान्ति ।
क्षणेन यान्त्येव हि तत्र वीराः प्राणान् सुयुद्धेन परित्यजन्तः¹ ।३८।
स्वर्गादि उत्तम लोक की इच्छा रखनेवाले ब्राह्मण अनेक यज्ञ
तथा तपस्या से जिस भाँति जिस लोक को प्राप्त करते हैं, धर्मपूर्वक
युद्ध कर प्राण को त्यागनेवाले वीर उन-उन लोकों को उसी प्रकार
क्षणभर में प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३८ ॥
जितेन लभ्यते लक्ष्मीमृतेनाऽपि सुराङ्गना ।
क्षणध्वंसिनी कायेऽस्मिन् का चिंता मरणे रण ? ॥३९॥
वीरों को विजय होने पर लक्ष्मी प्राप्त होती हे और मर जाने पर
अप्सराओं की प्राप्ति होती है। इसलिए वे क्षणभंगुर इस शरीर की
चिन्ता क्यों करें ? ॥ ३९ ॥
१. 'परित्यजन्ति' इत्यपि पाठः ।
३