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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 170 में से

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पृष्ठ 26

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
१४ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
वैश्वदेवे तु सम्प्राप्ते भिक्षुके गृहमागते ।
उद्धृत्य वैश्वदेवार्थं भिक्षां दत्त्वा विसर्जयेत् ॥५०॥
वैश्वदेव काल में यदि भिक्षुक (संन्यासी) घर पर आ जाय तो
पाक में से वैश्वदेव के लिये अलग अन्न निकालकर संन्यासी को भिक्षा
देकर बिदा कर देना चाहिये। पश्चात् वैश्वदेव आदि क्रिया कर
भोजन करे ॥ ५० ॥
यतिश्च ब्रह्मचारी च पक्वान्न-स्वामिनावुभौ ।
तयोरन्नमदत्त्वा च भुक्त्वा चान्द्रायणं चरेत् ॥५१॥
संन्यासी और ब्रह्मचारी दोनों पक्वान्न के अधिकारी हैं। इन दोनों
को बिना अन्न दिये ही जो भोजन कर लेता है, उसे चान्द्रायण व्रत
करना चाहिये ॥ ५१ ॥
दद्याच्च भिक्षात्रितयं परिव्राड् ब्रह्मचारिणाम् ।
इच्छया च ततो दद्याद् विभवे सत्यवारितम् ॥५२॥
ब्रह्मचारी एवं संन्यासी को भिक्षा का तिगुना देना चाहिये।
(ग्रासमात्र तु भिक्षा स्यात्) इसके बाद यदि ऐश्वर्य अधिक हो तो
अधिक भी दिया जा सकता है। उसमें कोई रोक नहीं है ॥ ५२ ॥
यतिहस्ते जलं दद्याद् भैक्ष्यं दद्यात् पुनर्जलंम् ।
तद् भैक्ष्यं मेरुणा तुल्यं तज्जलं सागरोपमम् ॥५३॥
संन्यासी के घर आ जाने पर प्रथम जल, पश्चात् भिक्षा तथा
तदुपरान्त जल देना चाहिए। इस प्रकार दी गयी भिक्षा सुमेरु के तुल्य
तथा समुद्र के समान हो जाती है ॥ ५३ ॥
यस्यच्छत्रं हयश्चैव कुञ्जरारोहमृद्धिमत् ।
ऐन्द्रस्थानमुपासीत तस्मात् तं न विचारयेत् ॥५४॥
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal