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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

ऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ७
अन्ये कृतयुगे धर्मास्त्रेतायां द्वापरे युगे ।
अन्ये कलियुगे नॄणां युगरूपाऽनुसारतः ॥२२॥
कृतयुग में धर्म का प्रकार दूसरा है। इसी प्रकार त्रेता तथा
द्वापर में भी धर्म के अन्य-अन्य प्रकार हैं। कलि में धर्म का प्रकार
अन्य है। युगभेद होने से मनुष्यों की शक्ति का उपचय तथा ह्रास
होने के कारण भिन्न-भिन्न युगों के मनुष्यों के धर्म भी भिन्न-भिन्न हैं।
युग-युग में सामर्थ्य-भेद होने के कारण धर्म भी भिन्न हो गये हैं ॥२२॥
तपः परं कृतयुगे त्रेतायां ज्ञानमुच्यते ।
द्वापरे यज्ञमेवाऽऽहुर्दानमेव कलौ युगे ॥२३॥
कृतयुग में तपःप्रधान धर्म, त्रेता में ज्ञान-प्रधान धर्म, द्वापर में
यज्ञप्रधान धर्म तथा कलि में दानप्रधान धर्म का लक्षण कहा
गया है ॥ २३ ॥
कृते तु मानवा धर्मास्त्रेतायां गौतमाः स्मृताः ।
द्वापरे शंखलिखिताः कलौ पाराशराः स्मृताः॥२४॥
सत्युग में मनुस्मृति, त्रेता में गौतमस्मृति, द्वापर में शंख-द्वारा
लिखित स्मृति और कलि में तो पराशर स्मृति ही प्रधान मानी
गयी है ॥ २४ ॥
त्यजेद् देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत् ।
द्वापरे कुलमेकं तु कर्त्ता तु कलौ युगे ॥२५॥
सतयुग में अधर्म होने पर देश का त्याग, त्रेता में अधर्म होने
पर उस गाँव का त्याग, द्वापर में केवल उस कुल का त्याग तथा
कलि में केवल अधर्म करनेवाले का ही त्याग किया जाता है।
युगभेद से धर्म-भिन्न हो जाता है ॥ २५ ॥
कृते सम्भाषणादेव त्रेतायां स्पर्शनेन च ।
द्वापरे त्वन्नमादाय कलौ पतति कर्मणा ॥२६॥