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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 170 में से

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पृष्ठ 16

CC-0. In Public Domain. Digitization by eGangotri
४ पाराशरस्मृतिः [ प्रथमो-
व्यासजी ने भी अपने पिता से कुशलादि कहकर उनसे पूछा—
हे भक्तवत्सल ! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं अथवा मुझमें
पुत्रवत्सलता के कारण अधिक स्नेह रखते हैं, तो ॥ ११ ॥
धर्मं कथय मे तात ! अनुग्राह्यो ह्यहं तव ।
श्रुता मे मानवा धर्मा वासिष्ठाः काश्यपास्तथा ॥१२॥
हे महर्षे ! मुझे आप धर्म का लक्षण बताइए, क्योंकि मैं आपका
शिष्य तथा पुत्र होने के कारण अनुग्रह का पात्र हूँ। मैंने मनु, वसिष्ठ,
कश्यप, ॥ १२ ॥
गार्गीया गौतमीयाश्च तथा चौशनसाः स्मृताः ।
अत्रेर्विष्णोश्च संवर्ताद् दक्षादङ्गिरसस्तथा ॥ १३ ॥
गर्ग, गौतम, उशनस (शुक्र), अत्रि, विष्णु, संवर्त्त, दक्ष,
अंगिरस, ॥ १३ ॥
शातातपाच्च हारीताद् याज्ञवल्क्यात्तथैव च ।
आपस्तम्बकृता धर्माः शङ्खस्य लिखितस्य च ॥१४॥
शतातप, हारीत, याज्ञवल्क्य, आपस्तम्ब, शंख लिखित, ॥ १४ ॥
कात्यायनकृताश्चैव तथा प्राचेतसान्मुनेः ।
श्रुत्वा ह्येते भवत्प्रोक्ताःश्रौतार्था मे न विस्मृताः ॥ १५॥
कात्यायन तथा प्राचेतस् से निर्मित धर्मशास्त्रों को आपसे सुन
लिया है, वे सभी श्रुतिसम्मत धर्मशास्त्र हैं, अभी वे मुझे विस्मृत
नहीं हुए हैं ॥ १५ ॥
अस्मिन् मन्वन्तरे धर्माः कृत-त्रेतादिके युगे ।
सर्वे धर्माः कृते जाताः सर्वे नष्टाः कलौ युगे ॥१६॥
उनको इसी मन्वन्तर के सतयुग, त्रेता तथा द्वापरादि युगों के लिए
महर्षियों ने निर्माण किया है, यद्यपि देश-धर्म, कुल-धर्म, जाति-धर्म,
वयधर्म, गुणधर्म, शरीरधर्म, कालधर्म, आपद्-धर्म से धर्म के अनेक
Prof. Madhav Prasad Lamichhane Collection, Kathmandu, Nepal