पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
जले स्थलस्थो नाऽऽचामेज्जलस्थश्च१ बहिःस्थले ।
उभे स्पृष्ट्वा समाचामेदुभयत्र शुचिर्भवेत् ॥१७॥
स्थल पर खड़े होकर जल में और जल में खड़े होकर स्थल पर-
आचमन नहीं करना चाहिए । एक पैर जल में और दूसरा स्थल पर
रखकर आचमन करने से वह आचमन शुद्ध माना जाता है ॥ १७ ॥
स्नात्वा पीत्वा क्षुते सुप्ते भुक्त्वा रथ्योपसर्पणे ।
आचान्तः पुनराचामेद् वासो विपरिधाय च ॥१८॥
स्नान, जलपान, भोजन, शयन और मार्ग में भ्रमण तथा वस्त्र
धारण के बाद दो बार आचमन करना चाहिए । इसी तरह ॥ १८ ॥
क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथाऽनृते ।
पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ॥१९॥
छींकने, थूकने, दाँतों में अन्न का कण रहने, मिथ्या भाषण करने
और पतितों के साथ वार्तालाप करने के बाद दाहिने कान का स्पर्श
करना चाहिए ॥ १९ ॥
भास्करस्य करैः पूतं दिवा स्नानं प्रशस्यते ।
अप्रशस्तं निशि स्नानं राहोरन्यत्र दर्शनात् ॥२०॥
दिन में किया जानेवाला स्नान उत्तम माना गया है, क्योंकि
सूर्य की रश्मियों द्वारा वह जल पवित्र किया गया होता है । ग्रहण के
अतिरिक्त रात्रि में स्नान करने का निषेध किया गया है ॥ २० ॥
मरुतो वसवो रुद्रा आदित्याश्चाऽथ देवताः ।
सर्वे सोमे प्रलीयन्ते तस्माद् दानं तु संग्रहे ॥२१॥
मरुत्, वसु, रुद्र, आदित्य और समस्त देवता चन्द्रमा में मिल
जाते हैं । इसीलिए ग्रहण के समय सभी देवताओं की रक्षा के निमित्त
दान करने का माहात्म्य बतलाया गया है ॥ २१ ॥
१. 'श्चेद्' इति ।