पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें१२६ पराशरस्मृतिः [ द्वादशो-
स-शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् ॥ ७ ॥
वन में स्थित चौराहे के बीच बैठकर शिखा सहित मुण्डन और
दो प्राजापत्य करने से ब्राह्मण की शुद्धि होती है ॥ ७ ॥
गोद्वयं दक्षिणां दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ।
मुच्यते तेन पापेन ब्राह्मणत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥
इसके अतिरिक्त दक्षिणा में दो गायों का दान करना चाहिए ।
ऐसा महर्षि पाराशर का आदेश है । फिर उक्त पाप से रहित होकर
ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व को पा लेता है ॥ ८ ॥
स्नानादि पञ्च पुण्यानि कीर्तितानि मनीषिभिः ।
आग्नेयं वारुणं ब्राह्मं वायव्यं दिव्यमेव च ॥ ९ ॥
आग्नेय, वारुण, ब्राह्म, वायव्य और दिव्य—इन पाँच प्रकार के
स्नानों को पण्डितों ने पुनीत (पवित्र) कहा है ॥ ९ ॥
आग्नेयं भस्मना स्नानमवगाह्य तु वारुणम् ।
'आपो हिष्ठे'ति च ब्राह्मं वायव्यं गोरजः स्मृतम् ॥१०॥
सम्पूर्ण शरीर में भस्म लेपन 'आग्नेय' स्नान, जल में नहाना
'वारुण' स्नान, 'आपो हिष्ठा-' मन्त्र द्वारा मार्जन करने से 'ब्राह्म'
स्नान, गाय के रज से 'वायव्य' स्नान होता है ॥ १० ॥
यत्तु सातपवर्षेण ३तत्स्नानं दिव्यमुच्यते ।
तत्र स्नात्वा तु गङ्गायां स्नातो भवति मानवः ॥११॥
जब धूप निकलने के साथ ही साथ कुछ बारिश भी हो रही हो
तो उसमें नहाने से 'दिव्य' स्नान होता है । उसमें नहाने से मनुष्य को
गंगा-स्नान करने का फल मिलता है ॥ ११ ॥
स्नातुं यान्तं द्विजं सर्वे देवाः पितृगणैः सह ।
१. 'स्वायम्भुवोऽब्रवीत्' इति । २. 'आपो हिष्ठा०'-ऋ० १०,९,१ । ३. स्नानं
तद्दिव्यमुच्यते' इत्यपि पाठः ।