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पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation

महर्षि पराशर द्वारा

स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished170 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

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१२४ पाराशरस्मृतिः [ द्वादशो-

नवाहमतिकृच्छ्री स्यात् पाणिपूरान्नभोजनः ॥५५॥
प्रहार के द्वारा रक्तपात होने पर अतिकृच्छ्र और चमड़े के अन्दर
रक्त जम जाने पर कृच्छ्र व्रत का अनुष्ठान करना चाहिए । एक मुट्ठी
अन्न के द्वारा नव दिन तक व्यतीत करना चाहिए ॥ ५५ ॥
त्रिरात्रमुपवासी स्यादतिकृच्छ्रः स उच्यते ।
सर्वेषामेव पापानां सङ्करे समुपस्थिते ॥५६॥
इसके पश्चात् तीन दिन तक उपवास करने से कृच्छ्र नामक व्रत
पूरा होता है । जब समस्त प्रकार के पापों का एक साथ समन्वय हो
जाय तब ॥ ५६ ॥
दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्रीशोधनं परम् ॥५७॥
इति पाराशरीये धर्मशास्त्रे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
दस हजार गायत्री मन्त्र का पाठ करने से समस्त पापों का नाश
हो जाता है ॥ ५७ ॥
इस प्रकार 'शिवदत्तो' भाषा टीका में पाराशरीय धर्मशास्त्र में
ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ॥ ११ ॥

१२. द्वादशोऽध्यायः
दुःस्वप्नं यदि पश्येद् वा वान्ते वा क्षुरकर्मणि ।
मैथुने प्रेतधूमे³ च स्नानमेव विधीयते ॥ १ ॥
किसी प्रकार का खराब स्वप्न देखने, वमन करने, क्षौर-कर्म
कराने, मैथुन करने या प्रेतधूम (श्मशान आदि स्थानों का धुआँ)
लगने पर स्नान मात्र से ही शुद्धि हो जाती है ॥ १ ॥
१. 'त्रिरात्रमुपवासः' इति । २. 'पश्येत्तु' इति । ३. 'धूम्र' इति ।