पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ें१२° पराशरस्मृतिः [ एकादशो-
सात अपराधों के निवारक ऐसे कुशों को ग्रहण करें जिनके आगे का
भाग कटा-फटा न हो और उनका रंग बिलकुल हरा हो ॥३५॥
एतैरुद्धृत्य होतव्यं पञ्चगव्यं यथाविधि ।
१'इरावती' २‘इदं विष्णुर्मानस्तोके’३ति४ ५'शंवती ॥३६॥
उपर्युक्त प्रकार की कुशाओं द्वारा पंचगव्य उठाकर विधिपूर्वक
हवन करना चाहिए । हवन की ऋचाएं 'इरावती०', 'इदं विष्णु०',
'मानस्तोके०' और 'शंवतीः०' हैं ॥३६।
एताभिश्चैव होतव्यं हुतशेषं पिवेद् द्विजः ।
आलोड्य प्रणवेनैव निर्मन्ध्य प्रणवेन तु ॥३७॥
इन्हीं से हवन करना चाहिए । हवन करने के बाद जो कुछ शेष
रह जाय उसे पान करना चाहिए । ब्राह्मण को पान के पूर्व प्रणव पाठ
द्वारा उसका आलोडन और मंथन करना उचित है ॥३७॥
उद्धृत्य प्रणवेनैव पिवेच्च प्रणवेन तु ।
यत्त्वगस्थिगतं पापं देहे तिष्ठति देहिनाम् ॥३८॥
प्रणव से निकालकर प्रणव द्वारा ही पान करे । मनुष्य की हड्डी
और चमड़े में जो कुछ भी पाप समाविष्ट रहता है । ३८॥
६ब्रह्मकूर्चो दहेत् सर्वं ७प्रदीप्ताग्निरिवेन्धनम् ।
पवित्रं त्रिषु लोकेषु देवताभिरधिष्ठितम् ॥३९॥
१. इरावती धेनुमती हि भूतं सूयवसिनी मनुषे दशस्या ।
व्यस्तम्ना रोदसी विष्णवेते दाधर्थ पृथिवीमभितो मयूखैः ॥ - ऋ० ७,९९,३
२. इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेदा नि दधे पदम् । समूळहमस्य पांसुरे ।-ऋ० १,२२,१७
३. 'मानस्तोके'—ऋ० १,११४,८ । ४. 'च' इति ।
५. शंवतीः पारयन्त्येते तं पृच्छन्ति वचो यया ।
अभ्यारन्तं यमकेतं य एवेदमिति ब्रवत् ।
—ऋ० परिशिष्टम्
६. 'ब्रह्मकूर्चं' इति । ७. 'यथैवाग्निरिवेन्धनम्' इति ।