पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता ११३,
यदि भुक्तं तु विप्रेण अज्ञानादापदाऽपि वा ।
ज्ञात्वा समाचरेत् कृच्छ्रं ब्रह्मकूर्चं तु पावनम् ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण संकट काल में या अनजान में भक्षण कर ले और बाद
में उसकी यथार्थता का बोध होने पर उस ब्राह्मण के लिए कृच्छ्र व्रत
और ब्रह्मकूर्च का पान शुद्धि के साधन माने गये हैं ॥५॥
बालैर्नकुल-मार्जारैरन्नमुच्छिष्टितं१ यदा ।
तिल-दर्भोंदकैः प्रोक्ष्य शुद्धयते नाऽत्र संशयः ॥ ६ ॥
जिस परिपक्व अन्न को किसी बालक, नेवले या बिलाव ने जूठा
कर दिया हो तो ऐसे अन्न पर तिल और कुशा का जल छिड़कने मात्र
से ही वह अन्न पवित्र हो जाता है ॥६॥
शूद्रोऽप्यभोज्यं भुक्त्वाऽन्नं पञ्चगव्येन शुद्ध्यति ।
क्षत्रियो वाऽपि वैश्यश्च प्राजापत्येन शुद्ध्यति ॥ ७ ॥
यदि किसी शूद्र ने अभोज्य पदार्थ का भक्षण किया हो तो उसके
लिए पंचगव्य का पान और ऐसी ही अवस्था के क्षत्रिय या वैश्य के
लिए प्राजापत्य व्रत करने का विधान है ॥७॥
एकपङ्क्त्युपविष्टानां विप्राणां सहभोजने ।
यद्येकोऽपि त्यजेत् पात्रं शेषमन्नं न भोजयेत् ॥ ८ ॥
ब्राह्मणों की मण्डली की कतार में बैठकर भोजन करनेवाला कोई
व्यक्ति यदि भोजन छोड़कर उठ जाय तो उस कतार के सभी ब्राह्मणों
को भोजन का परित्याग कर देना चाहिए । क्योंकि इसके बाद किया
जानेवाला भोजन जूठा माना जाता है ॥८॥
मोहाद् भुञ्जीत यस्तत्र पङ्क्तावुच्छिष्टभोजने ।
प्रायश्चित्तं चरेद् विप्रः कृच्छ्रं सान्तपनं तथा ॥ ९ ॥
१. '-मुच्छेषितं' इति । २. 'तदा' इति ।
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