पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०५
एतास्तु मोहितो गत्वा त्रीणि कृच्छ्राणि सञ्चरेत् ।
चान्द्रायणत्रयं कुर्याल्लिङ्गनच्छेदेन शुद्ध्यति ॥११॥
तो तीन-तीन कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रत करके अन्त में जननेन्द्रिय
को ही काट डालना चाहिए ॥११॥
मातृष्वसृगमे चैवमात्ममेढ्रनिकृन्तनम् ।
१अज्ञानेन तु यो गच्छेत् कुर्याच्चान्द्रायणत्रयम् ॥१२॥
इसी प्रकार यदि अपनी मौसी ( माता की वहन ) से सम्भोग करे
तब भी उसे जननेन्द्रिय का छेदन कर डालना उचित है । यदि अनजान
में समागम हुआ हो तो उसे तीन चान्द्रायण करने के बाद ॥१२॥
दशगोमिथुनं दद्याच्छुद्धिं पाराशरोऽब्रवीत् ।
पितृदारान् समारुह्य मातुराप्तां च भ्रातृजाम् ॥१३॥
दस-दस की संख्या में गाय और बैल का दान करना चाहिए ।
ऐसा करने से उसकी शुद्धि हो जाती है । विमाता, माता की सहेली,
भ्रातृ-तनया, ॥ १३ ॥
गुरुपत्नीं स्नुषां चैव भ्रातृभार्या तथैव च ।
मातुलानीं स-गोत्रां च प्राजापत्यत्रयं चरेत् ॥१४॥
गुरु-पत्नी, पुत्रवधू ( पतोहू ), भाई की पत्नी, मामी सगोत्रीय
स्त्रियों के साथ मैथुन करने पर तीन प्राजापत्य व्रत का विधान कहा
गया है ॥ १४ ॥
गोद्वयं दक्षिणां दत्वा शुद्ध्यते नाऽत्र संशयः ।
पशु-वेश्यादिगमने महिष्युष्ट्री-कपीस्तथा ॥१५॥
तत्पश्चात् दक्षिणा में दो गायों का दान देने से पूर्णरूपेण शुद्धि प्राप्त
होती है । पशु, वेश्या, मादा भैंस, ऊँटिन, बन्दरी, ॥ १५ ॥
खरीं च सूकरीं गत्वा प्राजापत्यव्रतं चरेत् ।
गोगामी च त्रिरात्रेण गामेकां ब्राह्मणे ददेत् ॥१६॥
१ 'अज्ञानात्ता' इति । २. 'चान्द्रायणद्वयम्' इति ।