पराशर स्मृति (माधवाचार्य भाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Parashara Smriti with Madhavacharya Bhashya & Hindi Translation
महर्षि पराशर द्वारा
स्रोत: ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी · ठाकुरप्रसाद एण्ड संस वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 115, कुल 170 में से
संदर्भ में पढ़ेंऽध्यायः ] भाषाटीकासहिता १०३
अब मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-इन चारों वर्णों की शुद्धि
का उपाय बतलाऊँगा। अपनी पत्नी के अतिरिक्त अन्य अगम्या स्त्रियों
से गमन करने पर चान्द्रायण व्रत से शुद्धि होती है ॥ १ ॥
एकैकं हासयेद् ग्रासं कृष्णे शुक्ले च वर्द्धयेत् ।
अमावास्यां न भुञ्जीत ह्येष चान्द्रायणो विधिः ॥ २ ॥
चान्द्रायण व्रत की विधि इस प्रकार है : कृष्णपक्ष में भोजन का
क्रमशः एक-एक ग्रास घटाकर शुक्लपक्ष में एक-एक कौर बढ़ाते रहना
चाहिए और अमावास्या के दिन निराहार व्रत करना चाहिए ॥ २ ॥
कुक्कुटाण्डप्रमाणं तु ग्रासं व परिकल्पयेत् ।
अन्यथा ¹जातदोषेण न धर्मो न च ²शुद्ध्यति ॥ ३ ॥
भोजन के ग्रास का प्रमाण अण्डे के बराबर होना चाहिए। इसकी
मात्रा में कमी-वेशी करने से दोष का भागी होना पड़ता है और शुद्धि
नहीं होती ॥ ३ ॥
प्रायश्चित्ते ततश्चीर्णे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ।
गोद्वयं वस्त्रयुग्मं च दद्याद् विप्रेषु दक्षिणाम् ॥ ४ ॥
प्रायश्चित्त करने के अनन्तर ब्राह्मण को भोजन कराकर दक्षिणा-
स्वरूप दो गाय और एक जोड़ा वस्त्र देना चाहिए ॥ ४ ॥
चाण्डालीं वा श्वपाकीं वा ³ह्यभिगच्छति यो द्विजः ।
त्रिरात्रमुपवासित्वा⁴ विप्राणामनुशासनात् ॥ ५ ॥
जो ब्राह्मण चाण्डाल या श्वपच जाति की स्त्री से मैथुन करता है,
उसे चाहिए कि वह ब्राह्मणों की आज्ञा लेकर, ॥ ५ ॥
स शिखं वपनं कृत्वा प्राजापत्यद्वयं चरेत् ।
ब्रह्मकूर्चं ततः कृत्वा कुर्याद् ब्राह्मणतर्पणम् ॥ ६ ॥
१. 'भावदोषेण' इति । २. 'शुद्ध्यते' इति । ३. 'अनुगच्छति' इति ।
४. 'त्रिरात्रमुपवासी च' इति ।