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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

( ४२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
“एह्येहि दुष्टवृषभ ! स्वामी पिङ्गलकः त्वाम् आकारयति किं
निःशङ्को भूत्वा मुहुर्मुहुर्नर्दसि वृथेति” । तच्छ्रु सञ्जीव-
कोऽब्रवीत्-“भद्र ! कोऽयं पिङ्गलकः ?” । दमनकः आह-“किं
स्वामिनं पिङ्गलकमपि न जानासि ? तत्क्षणं प्रतिपालय फले-
नैव ज्ञास्यसि। ननु अयं सर्वमृगपरिवृतो वटतले स्वामी पिङ्ग-
लकनामा सिंहस्तिष्ठति” । तच्छ्रुत्वा गतायुषमिवात्मानं
मन्यमानः सञ्जीवकः परं विषादमगमत् । आह च-“भद्र !
भवान् साधुसमाचारो वचनपटुश्च दृश्यते। तत् यदि मामवश्यं
तत्र नयसि तदभयप्रदानेन स्वामिनः सकाशात् प्रसादः
कारयितव्यः” । दमनक आह-“भोः सत्यमभिहितं भवता ।
नीतिरेषा । यतः-
पिंगलक बोला-“जो ऐसा है तो तुझको अमात्यपदमें स्थापित किया । आजसे
लेकर (प्रजा अनुजीवियोंपर ) प्रसाद निग्रह (दंड) तुम्हारेही आधीन है यह निश्चय है”
तब दमनक शीघ्रतासे जाकर तिरस्कारपूर्वक यह बोला-“आओ आओ !
दुष्ट वृषभ ! स्वामी पिंगलक तुझको पुकारताहै । क्यों निश्शंक होकर
बारंबार वृथा नाद करताहै” । यह सुनकर सञ्जीवक बोला-“भद्र ! पिंगलक
कौन है ?” दमनक बोला-“क्या तू स्वामी पिंगलकको नहीं जानताहै ? । सो
क्षणमात्रको ठहर फलसेही जानलेगा, निश्चयही यह सब मृगोंसे युक्त वटतले
हमारा स्वामी पिंगलक सिंह स्थित है” । यह सुन आयुरहित अपनेको मानता-
हुआ संजीवक महादुःखको प्राप्त हुआ और बोला-“भद्र ! आप साधु-
समाचार और वचन बोलनेमें चतुर दीखते हो । यदि मुझको अवश्य ही वह
लिये जाते हो, तो अभयप्रदानसे स्वामीके निकट प्रसाद कराओ” । दमनक
बोला-“भो ! तुमने सत्य कहा नीति ऐसी ही है । क्योंकि-
पर्यन्तो लभ्यते भूमेः समुद्रस्य गिरेरपि ।
न कथञ्चिन्महीपस्य चित्तान्तः केनचित् क्वचित् ॥ १३६ ॥
मनुष्य पृथ्वी, समुद्र और पर्वतका भी अन्त पासकतेहैं, परन्तु राजाके
चित्तका अन्त कभी किसीने नहीं पाया ॥ १३६ ॥