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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( ३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

श्यत् । स च तं परिज्ञाय समीपं गत्वा स्वयमेव कौतुकात्
अताडयत् । भूयश्च हर्षात् अचिन्तयत् । "अहो ! चिरादेतत्
अस्माकं महत् भोजनमापतितम्,तत् नूनं प्रभूतमांसमेदोऽसृ-
ग्भिः परिपूरितं भविष्यति" । ततः परुषचर्मावगुंठितं तत्क-
थमपि विदार्य्य एकदेशे छिद्रं कृत्वा संहृष्टमना मध्ये प्रविष्टः
परं चर्मविदारणतोदंष्ट्राभङ्गः समजनि । अथ निराशीभूतः
तत् दारुशेषमवलोक्य श्लोकमेनम्पठत्।"पूर्वमेव मया ज्ञातम्'
इति । ततो न शब्दमात्रात् भेतव्यम्"। पिङ्गलक आह-“भोः।
पश्य अयं मम सर्वोऽपि परिग्रहो भयव्याकुलितमनाः पला-
यितुमिच्छति । तत् कथमहं धैर्यावष्टम्भं करोमि" ।
सोऽब्रवी-“स्वामिन् ! नैषामेष दोषो यतः स्वामिसदृशा
एव भवन्ति भृत्याः । उक्तञ्च-
सो पहले मैं यह जानूं, कि, यह किसका शब्द है" । धैर्य्यको अव-
लम्बन कर जबतक शनैः २ गया तबतक नगाडेको देखता भया । वह इसको
जान धोरे जाकर स्वयंही कौतुकसे ताडन करता हुआ,फिरभी प्रसन्नतासे विचा-
रता भया । "अहो ! बहुत कालमें यह भोजन हमको प्राप्त हुआहै । सो निश्च-
यही बहुतसे मांस मेंद रुधिरसे परिपूर्ण होगा" सो कठिन चर्मसे मढे हुए इस
(ढोल) को किसी प्रकारसे विदीर्ण करके एक देशमें छिद्र करके प्रसन्नमनसे
भीतर प्रविष्ट हुआ । और चर्मके विदारण करनेसे दाढैं टूटगईं । तब निराश
होकर केवल काष्ठमात्र देखकर इसश्लोकको पढताहुआ कि, "मैने पहले जाना
था" । इससे शब्दमात्रसे न डरना चाहिये" पिंगलक बोला “भो ! देखो यह मेरा
सम्पूर्ण कुटुम्ब भयव्याकुल मन होकर भागनेकी इच्छा करता है, सो मैं किस
प्रकार धैर्य्य धारण करूं" । वह बोला-“स्वामिन् ! इनका दोष नहीं जिस
कारण कि, भृत्य स्वामीकी समान होते हैं । कहाभी है-
अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा वाणी नरश्च नारी च ।
पुरुषविशेषं प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च ॥ ११९ ॥
घोडा, शस्त्र, शास्त्र, वीणा, वाणी, नर और नारी यह पुरुषविशेषको प्राप्त
होकर योग्य अयोग्य होजाते हैं ॥ ११९ ॥