सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 50

भाषाटीकासमेतम् । ( ३५ )
यह जानकर स्वामीको धैर्यकी स्थिति करनी योग्य है, शब्दमात्रसे डरना
न चाहिये कहाभी है-
पूर्वमेव मया ज्ञातं पूर्णमेतद्धि मेदसा ।
अनुप्रविश्य विज्ञातं यावच्चर्म च दारु च ॥ ११७ ॥"
मैने पहले मज्जासे पूर्ण जान लिया था परन्तु पीछे प्रवेश कर देखा तो इसमें
चर्म और दारुही निकला ॥ ११७ ॥"
पिङ्गलक आह- "कथमेतत्"? सोऽब्रवीत्-
पिंगलक बोला- "यह कैसी कथा है" ? । वह बोला-
-कथा २ .
कश्चित् गोमायुर्नाम शृगालः क्षुत्क्षामकंठः इतस्ततः परि-
भ्रमन् वने सैन्यद्वयसंग्रामभूमिमपश्यत् । तस्याञ्च दुन्दुभेः पति-
तस्य वायुवशात् वल्लीशाखाग्रैः हन्यमानस्य शब्दमशृणोत् ।
अथ क्षुभितहृदयश्चिन्तयामास । "अहो ! विनष्टोऽस्मि । तद्या-
वत् न अस्य प्रोच्चारितशब्दस्य दृष्टिगोचरे गच्छामि तावद्
अन्यतो व्रजामि । अथवा नैतत् युज्यते सहसैव पितृपैतामहं
वनं त्यक्तुम् । उक्तञ्च-
कोई गोमायु नामवाला शृगाल भूखसे दुर्बल कंठवाला इधर उधर घूमता
हुआ वनमे दोनो सेनाकी संग्रामभूमि देखता भया । वहां गिरे हुए नगाडेका
पवनके वशसे वल्ली शाखाओके अग्रभागके ताडनसे उठा शब्द सुनता भया ।
तब क्षुभितहृदय हो विचारने लगा "अहो मैं मरा, सो जबतक इस उच्चारण किये
शब्दके सन्मुख नहूं, तबतक यहासे अन्य स्थानमें जाऊ। अथवा एकसाथै पिता-
मह जनोका यह वन त्यागन करनेके योग्य नहीं है। कहाभी है-
भये वा यदि वा हर्षे संप्राप्ते यो विमर्शयेत् ।
कृत्यं न कुरुते वेगात्न स सन्तापमाप्नुयात् ॥ ११८ ॥
भय वा हर्षके प्राप्त होनेपर जो विचार करता है और कार्यको शीघ्रतासे
नहीं करता है, वह सन्तापको प्राप्त नहीं होता है ॥ ११८ ॥
तत् तावत् जानामि कस्य अयं शब्दः" । धैर्यमालम्ब्य
विमर्शयन् यावत् मन्दं मन्दं गच्छति तावत् दुन्दुभिम् अप-