पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 509, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें[Header]
( ४९४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
[Body]
उत्पन्न होंगे उनके बेचनेसे बहुतसा सोना प्राप्त होगा, उससे चतुःशाला घर
बनाऊंगा तब कोई ब्राह्मण मेरे घरमें आकर वयस युक्त मनोहर कन्या देगा ।
उसके द्वारा मेरे पुत्र होगा । उसका मैं सोमशर्मा नामकरण करूंगा । फिर
उसके जांघोंसे चलने योग्य होनेमें पुस्तक ग्रहणकर अश्वशालाके पीछे बैठा हुआ
उसका ध्यान करूंगा । इसी समय सोमशर्मा मुझे देखकर, माताकी गोदसे
घुटनोंसे चलता हुआ घोडेके खुरके समीपवर्ती होकर मेरे निकट आवेगा । तब
मैं ब्राह्मणीसे क्रोध कर कहूंगा । बालकको ग्रहणकर । वहभी घरके कार्यमे
व्यग्र हुई मेरा वचन न सुनेगी तो मैं उठकर उसे पाद प्रहारसे ताड़न करूंगा।"।
इस प्रकारसे ध्यानमे स्थित हुए उसने ज्योंही लात मारी त्योंही वह घडा टूटा
और सत्तूओके बिखरने से श्वेतताको प्राप्त हुआ । इससे मैं कहता हूं-
अनागतवतीं चिन्तामसम्भाव्यां करोति यः।
स एव पाण्डुरः शेते सोमशर्मपिता यथा ॥ ७३ ॥"
जो नहीं आई हुई और असम्भाव्य चिन्ताको करता है वह सोमशर्मा ब्रह्म-
णके पिताकी समान श्वेत हो सोता है ॥ ७३ ॥
सुवर्णसिद्धिः आह-"एवमेतत् । कस्ते दोषो ? यतः सर्वो-
ऽपि लोभेन विडंबितो बाध्यते । उक्तञ्च-
सुवर्णसिद्धिने कहा-"ऐसेही है तेरा दोष क्या है ? सब लोभसे वंचितहो
पीडित होतेहैं । कहा है-
यो लौल्यात्कुरुते कर्म नैवोदर्कमवेक्षते ।
विडम्बनामवाप्नोति स यथा चन्द्रभूपतिः ॥ ७४ ॥"
जो चपलतासे कर्म करता है और उसका परिणाम नहीं सोचता है वह
चन्द्रराजाकी समान विडम्बनाको प्राप्त होता है ॥ ७४ ॥"
चक्रधर आह,-"कथमेतत् ?" आह ।
चक्रधर बोला-"यह कैसे ?" वह बोला-
: कथा १०. :
कस्मिंश्चित् नगरे चन्द्रो नाम भूपतिः प्रतिवसति स्म,
तस्य पुत्रा वानरक्रीडारता वानरयूथं नित्यमेव अनेकभोजन-