पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
कभी जल आकाशसे पुष्करिणी आदिमें पतित होता है, कभी पातालसे निकलता
है, दैव अचिन्त्य और बलवान् है पुरुषकारमें यह बात नहीं (विफल) है ॥२९॥
अभिमतासिद्धिरशेषा भवति हि पुरुषस्य पुरुषकारेण ।
दैवमिति यदपि कथयसि पुरुषगुणः सोऽप्यदृष्टाख्यः॥३०॥
पुरुषकारसे पुरुषको सम्पूर्ण मनोरथ सिद्धि मिलती है और जो दैवको कहता
है वहभी पुरुषका अदृष्ट नामक गुण है ॥ ३० ॥
भयममुलं गुरुलोकात्तृणमिव तुलयन्ति साधु साहिसकाः।
प्राणानद्भुतमेतच्चरितं चरितं ह्युदाराणाम् ॥ ३१ ॥
साहसी पुरुष गुरुजनोंसे अतुल भय तथा प्राणोंको तृणकी समान मानते
हैं महान् पुरुषोंका यह अद्भुत चरित्र है ॥ ३१ ॥
क्लेशस्याङ्गमदत्त्वा सुखमेव सुखानि नेह लभ्यन्ते ।
मधुभिन्मथनायस्तैराश्लिष्यति बाहुभिर्लक्ष्मीम् ॥ ३२ ॥
इस संसारमें शरीरको बिना क्लेश दिये सुखकी प्राप्ति नहीं होती है मधुसूद-
नने समुद्रमथनसे श्रान्तहुए भुजाओं द्वाराही लक्ष्मीकी प्राप्ति की थी ॥ ३२ ॥
तस्य कथं न चला स्यात्पत्नी विष्णोर्नृसिंहकस्यापि।
मासांश्चतुरो निद्रां यः सेवति जलगत्तः सततम् ॥ ३३ ॥
नृसिंहरूपधारी उन विष्णुकी लक्ष्मी क्यों चलायमान नहो जो जलमें स्थित
हो चार महीने निरन्तर निद्रा सेवन करते हैं ॥ ३३ ॥
दुरधिगमः परभागो यावत्पुरुषेण साहसं न कृतम् ।
जयति तुलामधिरूढो भास्वानिह जलदपटलानि ॥३४॥
जबतक पुरुष साहस नहीं करता तबतक पराया भाग दुर्लभ है तुला
(राशि) को प्राप्त होकरही सूर्य मेघसमूहोंको जीतता है ॥ ३४ ॥
तत्कथ्यताम् अस्माकं कंश्चित् धनोपायो विवरप्रवेशशा-
किनीसाधनश्मशान सेवन महामांस विक्रयसाधकवर्त्तिप्रभृती-
नामेकतम इति । अद्भुतशक्तिर्भवान् श्रूयते । वयमपि अति-
साहसिकाः । उक्तञ्च-
सो कोई हमको धनप्राप्तिका उपाय कहो, पातालगमन, शाकिनीसाधन,
श्मशानसेवन, महामांसविक्रय, साधकवर्ति आदिमें कोई एक (विधि बताओ)
आप अद्भुत शक्तिवाले सुने जाते हो । हमभी बडे साहसी हैं । कहा है-