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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

( ४४८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
प्राह,-“भोः ! न अहमन्येन हतं सत्वं कदाचिदपि भक्ष-
यामि । उक्तञ्च-
किसी वनमें महा चतुरक नाम शृगाल रहताथा । उसको एक समय वनमें
स्वयं मृतक हुआ हाथी मिला । उसके चारों ओर घूमा परन्तु उसकी कठिन
त्वचा भंग करनेको समर्थ न हुआ । इसी समय इधर उधर विचारण करता
कोई सिंह वहां आया, तब सिंहको आया हुआ देखकर यह पृथ्वीमें अपना शिर
धरकर दोनों हाथ जोडकर विनयपूर्वक बोला,-“स्वामिन् ! मैं आपकी लकडी
धारणकरनेवाला स्थित हूं आपहीके निमित्त इस हाथीकी रक्षा करता हूं । सो
स्वामी इसको भक्षण करे” । उस प्रणाम करते हुएको देखकर सिंह बोला,-
“भो ! मैं दूसरेके मारे हुए जीवको कभी भक्षण नहीं करता हूं । कहा है कि-
वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्ष्या
बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति ।
एवं कुलीना व्यसनाभिभूता
न नीतिमार्गं परिलङ्घयन्ति ॥ ७५ ॥
वनमें भी सिंह मृगके मांसका भक्षण करते हैं भूखे होकरभी तृण नहीं खाते
हैं, इसी प्रकार कुलके मनुष्य व्यसनसे तिरस्कृत होकर भी नीतिमार्गको उल्लंघन
नहीं करते हैं ॥ ७५ ॥
तत् तव एव गजोऽयं मया प्रसादीकृतः” तत् श्रुत्वा शृगालः
सानन्दमाह,-“युक्तमिदं स्वामिनो निजभृत्येषु । उक्तञ्च यतः-
सो यह हाथी तुमको मैंने प्रसन्नतारूपसे दिया है” । यह सुनकर
शृगाल आनंदित होकर बोला,-“स्वामीको अपने भृत्योंमें यह बात उचितही
है । जिससे कि कहा है-
अन्त्यावस्थोऽपि महान्स्वामिगुणान्न जहाति शुद्धतया ।
न श्वेतभावमुज्झति शंखः शिखिभुक्तिमुक्तोऽपि ॥ ७६ ॥
अन्त्य अवस्थाको प्राप्त हुआ भी महान् पुरुष शुद्धतासे स्वामीके गुणोंको
नहीं त्यागता है जैसे शुद्ध करनेको अग्निमें भस्मकर निकाला हुआ शंख अपनी
श्वेतताको नहीं त्यागता है ॥ ७६ ॥
अथ सिंहे गते कश्चिद् व्याघ्रः समाययौ, तमपि दृष्ट्वा
असौ व्यचिन्तयत् । “अहो ! एकस्तावत् दुरात्मा प्रणिपातेन