पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४३७ )
जो मनमें है वह जिह्वा ( वचन )'मे नहीं, जो जिह्वामें वह बाहर नहीं, जो
हित है उसके करनेकी इच्छा नहीं करती, स्त्रियें अद्भुत चरित्रवाली है ॥ ५६ ॥
के नाम न विनश्यन्ति मिथ्याज्ञानान्नितम्बिनीम् ।
रम्यां य उपसर्पन्ति दीपाभां शलभा यथा ॥ ५७ ॥
अज्ञानसे मनोहर नितम्बवाली स्त्रीके निकट जाकर कौन नष्ट नहीं होते हैं
दीपकी ज्योतिको प्राप्त होकर पतंग जैसे नहीं बचते ॥ ५७ ॥
अन्तर्विषमया ह्येता बहिश्चैव मनोरमाः ।
गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषितः ॥ ५८ ॥
यह स्त्री भीतर विषरूप बाहरसे मनोहर हैं स्वभावसेही स्त्री चौंटलीके फलके
आकारवाली हैं ॥ ५८ ॥
ताडिता अपि दण्डेन शस्त्रैरपि विखण्डिताः ।
न वशं योषितो यान्ति न दानैर्न च संस्तवैः ॥ ५९ ॥
दण्डसे ताडित और शस्त्रसे विखण्डित होकर तथा दान और स्तुतिसेभी स्त्री
वशीभूत नहीं होती हैं ॥ ५९ ॥
आस्तां तावत्किमन्येन दौरात्म्येनेह योषिताम् ।
विधृतं स्वोदरेणापि घ्नन्ति पुत्रं स्वकं रुषा ॥ ६० ॥
स्त्रियोंकी और दुरात्मता इस संसारमे रहो अर्थात् अधिक क्या कहें यह
क्रोधसे अपने उदरमें स्थित पुत्रकोभी मार देती हैं ॥ ६० ॥
रूक्षायां स्नेहसद्भावं कठोरायां सुमार्दवम् ।
नीरसायां रसं बालो बालिकायां विकल्पयेत् ॥ ६१ ॥”
मूर्ख ( पुरुष ) रूखीमें प्रेम सद्भाव, कठोरमें मृदुता, नीरसमे रस इन बाला-
ओंमें कल्पना करता है ॥ ६१ ॥
मकर आह,-“भो मित्र ! अस्तु एतत्, परं किं करोमि,
मम अनर्थद्वयमेतत् सञ्जातम् । एकस्तावत् गृहभंगः, अपर-
स्त्वद्विधेन मित्रेण सह चित्तविश्लेषः, अथवा भवति एवं
दैवयोगात्, उक्तञ्च यतः-
मकरने कहा,-“भो मित्र ! है तो ऐसाही परन्तु मैं क्या करू मुझको यह
दो अनर्थ हुए । एक तो घरका नाश दूसरे तुम्हारी समान मित्रका वियोग ।
अथवा दैव योगसे ऐसा होता ही है । कहा है-