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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( ४३६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
वचन सुनकर हृदयसे. अति व्याकुल होकर वह इस प्रकार विलाप करने लगा ।
“यह मुझ मन्द भाग्यका क्या हुआ । कहा है-
माता यस्य गृहे नास्ति भार्य्या च प्रियवादिनी ।
अरण्यं तेन गन्तव्यं यथा रण्यं तथा गृहम् ॥ ५३ ॥
जिसके घरमें माता नहीं तथा प्रियवादिनी स्त्री नहीं उसको वनमें जाना
उचित है कारण कि घर वनकाही समान है ॥ ५३ ॥
तत् मित्र ! क्षम्यतां, मया तेऽपराधः कृतः सम्प्रति अहं
तु स्त्रीवियोगात् वैश्वानरप्रवेशं करिष्यामि” । तत् श्रुत्वा
वानरः प्रहसन् प्रोवाच,-“भो ज्ञातः मया प्रथममेव यत् त्वं
स्त्रीवश्यः स्त्रीजितश्च । साम्प्रतञ्च प्रत्ययः सञ्जातः । तत्
मूढ ! आनन्देऽपि जाते त्वं विषादं गतः तादृग् भार्य्यायां
मृतायां उत्सवः कर्त्तुं युज्यते, उक्तञ्च यतः-
सो मित्र ! क्षमा करना जो मैने आपका अपराध किया हे मैं अब स्त्रीवियोगसे
अग्निमें प्रवेश करूंगा” । यह सुन वानर हँसता हुआ बोला-“भो ! यह मैने
पहिलेही जाना था कि तू स्त्रीके वशीभूत और स्त्रीसे जीता गया है । अब विश्वास
होगया । सो मूर्ख ! आनन्दके समयभी तू विषादको प्राप्त हुआ ऐसी स्त्रीके
मरनेमें तो उत्सव करना चाहिये । कहा है कि-
या भार्य्या दुष्टचारित्रा सततं कलहप्रिया ।
भार्य्यारूपेण सा ज्ञेया विदग्धैर्दारुणा जरा ॥ ५४ ॥
जो भार्या दुष्ट चरित्र सदा क्लेश करनेवाली हो पंडितोंको वह स्त्रीरूप दारुण
बुढापा जानना ॥ ५४ ॥
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन नामापि परिवर्जयेत् ।
स्त्रीणामिह हि सर्वासां य इच्छेत्सुखमात्मनः ॥ ५५ ॥
इस करण जो अपने सुखकी इच्छा करे वह स्त्रियोंके नामको भी त्याग-
न करे ॥ ५५ ॥
यदन्तस्तन्न जिह्वायां यज्जिह्वायां न तद्बहिः ।
यद्धितं तन्न कुर्व्वन्ति विचित्रचरिताः स्त्रियः ॥ ५६ ॥