पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 45, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३० ) पञ्चतन्त्रम् ।
न गर्वं कुरुते माने नापमाने च तप्यते ।
स्वाकारं रक्षयेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९८ ॥
जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीं होता है और जो
अपने मानापमानके भावको रक्षित करता है वह राजाका भृत्य होनेके योग्यहै ९८
न क्षुधा पीड्यते यस्तु निद्रया न कदाचन ।
न च शीतातपाद्यैश्च स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९९ ॥
कभीभी जो निद्रा और क्षुधा शीत आदिसे पीडित नहीं होता है वह राजा-
ओंके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९९ ॥
श्रुत्वा सांग्रामिकीं वार्त्तां भविष्यां स्वामिनं प्रति ।
प्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०० ॥
जो आगे होनेवाली स्वामीकी संग्राम वार्ताको सुनकर प्रसन्नमुख होता है
वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०० ॥
सीमावृद्धिं समायाति शुक्लपक्ष इवोडुराट् ।
नियोगसंस्थिते यस्मिन् स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०१ ॥
जिस भृत्यके नियुक्त होनेमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी समान राजाकी सीमा
वृद्धिको प्राप्त होती हे वही राजाओंका भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०१ ॥
सीमा सङ्कोचमायाति वह्नौ चर्म इवाहितम् ।
स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो भृत्यो राज्यं समीहता ॥ १०२ ॥
और जिसकी स्थितिमें अग्निमें चर्मकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त
होतीहै राज्यकी इच्छा करनेवाले राजा उस भृत्यको त्यागने करे ॥ १०२ ॥
तथा शृगालोऽयमिति मन्यमानेन ममोपरि स्वामिना यदि
अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम् । उक्तं च यतः-
और यह शृगाल है यदि ऐसा मानकर स्वामी मेरी अवज्ञा करें तो यहभी
अनुचित है । कारण कहा भी है-
कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाहूवाप गोरोमतः
पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् ।
काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना
प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना १०३