पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम्। (२९)
राजा तुष्टो हि भृत्यानामर्थमात्रं प्रयच्छति ।
ते तु सम्मानमात्रेण प्राणैरप्युपकुर्वते ॥ ९१ ॥
राजा प्रसन्न होकर भृत्योंको अर्थमात्र प्रदान करता है, और वे सन्मानमात्रसे
उसके निमित्त अपने प्राण लगादेते हैं ॥ ९१ ॥
एवं ज्ञात्वा नरेन्द्रेण भृत्याः कार्या विचक्षणाः ।
कुलीनाः शौर्यसंयुक्ताः शक्ता भक्ताः क्रमागताः ॥ ९२ ॥
यह विचारकर राजाओंको चतुर भृत्य करने चाहिये, जो कुलीन शूरतासे
संयुक्त समर्थ भक्त और कुलपरंपरासे आये हों ॥ ९२ ॥
यः कृत्वा सुकृतं राज्ञो दुष्करं हितमुत्तमम् ।
लज्जया वक्ति नो किञ्चित्तेन राजा सहायवान् ॥ ९३ ॥
जो राजाका दुःसाध्य उत्तम हित करके लज्जासे कुछ नहीं कहता है, उससे
ही राजा सहायवान् होता है ॥ ९३ ॥
यस्मिन् कृत्यं समावेश्य निर्विशङ्केन चेतसा ।
आस्यते सेवकः स स्यात्कलत्रमिव चापरम् ॥ ९४ ॥
जिसमें कार्यको निर्भय चित्तसे समर्पण करके राजा स्थित होताहै वह सेवक
राजाको अन्य कलत्रकी समान पोषणीय है ॥ ९४ ॥
योऽनाहूतः समभ्येति द्वारि तिष्ठति सर्वदा ।
पृष्टः सत्यं मितं ब्रूते स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९५ ॥
जो बिनाबुलाये समीपमें स्थित रहता है सदा द्वारेही स्थित रहता है और
पूछनेसे सत्य बोलता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९५ ॥
अनादिष्टोऽपि भूपस्य दृष्ट्वा हानिकरञ्च यः ॥
यतते तस्य नाशाय स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९६ ॥
और जो राजाकी आज्ञाके बिनाभी हानिकारक वार्ताको देख उसके नाश
करनेका यत्न करता है, वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९६ ॥
तांडितोऽपि दुरुक्तोऽपि दण्डितोऽपि महीभुजा ।
यो न चिन्तयते पापं स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९७ ॥
जो राजासे ताडित होकर कठोर कहा जाकर दण्ड दिया जाकर भी राजाका
अनिष्ट चिन्तन नहीं करताहै वह राजाका भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९७ ॥