पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४१९ )
दृष्ट्वा सानुरागं आलिंगयितुं समुत्थिता । त्वं च कातरत्वात्
नष्टः सा पुनर्न शक्ता त्वां विना स्थातुमातया तु नश्यतः तेऽ-
वलम्बनार्थ हस्तः क्षितो न अन्यकारणेन, तत आगच्छ, सा
त्वत्कृते प्रायोपवेशना उपविष्टा तिष्ठति । एतत् वदति- "यत्
लम्बकर्णो यदि मे भर्त्ता न भवति, तत् अहमग्नौ जले वा
प्रविशामि, पुनस्तस्य वियोगं सोढुं न शक्नोमि"। तत्प्रसादं
कृत्वा तत्र आगम्यतामिति । नो चेत् तव स्त्रीहत्या भवि-
ष्यति । अपरं भगवान् कामः कोपं तव उपरि करिष्यति ।
उक्तञ्च-
ऐसा करनेपर शृगालके साथ सिंहके समीप आया। सिंह भी व्याकुल हो
उसे देख जबतक उठता है कि तबतक गधा भागने लगा । तब उस भागते
हुएके सिंहने पंजेका प्रहार किया वह मन्दभागीके उद्यमकी समान व्यर्थ होगया।
इसी समय शृगाल क्रोधित हो उससे बोला- "भो ! क्या आपका ऐसा प्रहार
है, जो गधा भी तुम्हारे आगेसे बलपूर्वक जाता है । सो हाथीके साथ कैसे
युद्ध करोगे ? सो देखलिया तुम्हारा बल" । तब लज्जित हो सिंह बोला,- "मैं
क्या करूं पहलेसे तयार नथा। नहीं तो हाथीभी मेरे पराक्रमसे न जाने पाता"।
शृगाल बोला- "अब भी एक बार उसे तुम्हारे पास लाऊंगा परन्तु तुम तयार
रहना" । सिंह बोला- "भद्र जो मुझे प्रत्यक्ष देखकर गया है वह फिर किस
प्रकार यहा आवेगा । सो और किसी जीवकी खोज करो" । शृगाल बोला-
"तुम्हें इस बातसे क्या, तुम केवल तयार रहो" ऐसा कहकर शृगालभी जबतक
गधेके मार्गसे जाने लगा । तब उसी स्थानमे उसे चरते देखा । तब शृगालको
देखकर गधा बोला- "भो भगिनीपुत्र ! अच्छे स्थानमे मुझे लेगये एक साथही
मृत्युको प्राप्त किया था । सो कह वह कौनसा जीव है ? जिसके अति कठिन
बज्रकी समान प्रहारसे मैं छुटा हू" । यह सुन हँसता हुआ शृगाल बोला- "भद्र !
वह गधी तुझे आया हुआ देख अनुरागसे आलिंगन करनेको उठी थी । तू
कातरतासे भाग गया अब वह तेरे बिना स्थित होनेको समर्थ न हुई । उसने
भागते हुए तुझे पकडनेको हाथ फैलाया था और कारणसे नहीं सो आओ। वह
तेरे बिना मरणके निमित्त बैठी है । और यों कहती है "जो लम्बकर्ण मेर,