पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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भाषाटीकासमेतम् । (४१७)
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किसी स्थानमें करालकेशर ( कठिन गर्दनके वालवाला ) नामक सिंह रहता
था, उसका धूसरक नाम शृगाल सदा अनुगामी परिचारक था । एक समय
हाथीके साथ युद्ध करते उसके शरीरमे कठिन प्रहार पडगयेथे जिनसे एक
पगभी चलनेको समर्थ नहीं था । उसके असमर्थ होनेसे वह धूसरक भी भूखसे
व्याकुलकण्ठ दुर्बलतताको प्राप्त होगया और किसी दिन उससे बोला- "स्वामिन् !
मैं भूखसे व्याकुल हो एक पगभी नहीं चल सकता । सो किस प्रकार तुम्हारी
शुश्रूषा करू" सिंह बोला- "भो ! जाकर कोई जीव ढूंढ जिससे इस अवस्थाको
प्राप्त हुआ भी उसे मारू" । यह सुन शृगाल खोज कर्ता किसी समीपवर्ती
ग्राममे प्राप्त हुआ । वह लम्बकर्ण नामवाला गधा सरोवरके समीप लम्बायमान
दूर्वादलके अंकुरोंकू कृच्छ्र ( कष्ट ) से खाता हुआ देखा । तब समीपवर्ती होकर
उसने कहा- "मामा ! हमारा नमस्कार ग्रहण करो, बहुत दिनोंसे देखा है कहो
क्यो ऐसे दुर्बल हो रहे हो ?" वह बोला "भो भान्जे ! क्या कहू यह निर्दयी
धोबी अति बोझसे मुझको पीडा देताहै मुट्ठीभर घासभी नही देता । केवल
धूरिमिले दूर्वाङ्कुर भक्षण करता हू तो कहासे मेरे शरीरमे पुष्टि होगी" । शृगाल
बोला- "जो ऐसा है तो मरकतमणीकी समान शष्प ( घास ) वाला नदीके
किनारे मनोहर स्थान है। वहा आकर मेरे साथ सुभाषित गोष्ठीका सुख अनुभवकर
स्थित हो" । लम्बकर्ण बोला,- "भो भान्जे ! ठीक कहा तुमने । परन्तु हम
ग्राम्य पशु वनचारियोंके वध्य हैं सो उस मनोहर स्थानसे क्या है " शृगाल
बोला- "मामा ! ऐसा मत कहो वह देश मेरे भुजपजरसे रक्षित है । सो
वहा किसी औरका प्रवेश नहीं है किन्तु इसी दोषसे रजकसे क्लेशित हुई तीन
गधी अनाथा वहा और भी हैं । वे पुष्टिको प्राप्त हुई जवानीसे उत्कट मुझसे
यों बोलीं - "जो तू हमारा सत्य मामा है तो-किसी ग्रामान्तरमें जाकर हमारे-
योग्य किसी स्वामीको लाओ" । उस कारण मैं तुमको वहा लिये जाता हू" ।
तब शृगालके वचन सुन कामसे पीडित अग हो उससे बोला- "भद्र ! जो
ऐसा है तो आगे हो जिससे मैं वहा पहुचू । अथवा अच्छा कहा है-
नामृतं न विषं किञ्चिदेकां मुक्ता नितम्बिनीम् ।
यस्याः सङ्गेन जीव्येत म्रियेत च वियोगतः ॥ ३४ ॥
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