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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 429

( ४१४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
धृतम् । तत् निःशङ्केन मनसा समागम्यताम्" । तत् आकर्ण्य
गङ्गदत्त आह-
सो अब भी अपने निकलनेका उपाय विचार करो इसके वधका उपाय भी
विचारो" इस प्रकार समयके बीतते २ वह सम्पूर्ण मण्डूककुलको भक्षण
करगया । केवल एक गंगदत्त रहगया । तब प्रियदर्शनने कहा- "भो गंग-
दत्त ! मैं भूखा हूं सम्पूर्ण निःशेष होगये । सो मुझे कुछ भोजन दे क्यों कि
तू मुझे यहां लाया है" । वह बोला- "भो मित्र ! इस विषयमें तुझे मेरे रहते
कुछ चिन्ता न करनी चाहिये । सो यदि तुम मुझे भेजो तो और कूपमें स्थित
मेंडकोंको विश्वास देकर यहां लाऊं" । वह बोला- "भो ! तू तो भाईके स्था-
नमें होनेसे मेरा अभक्ष्य है । सो यदि ऐसा करेगा तो तू मेरे पिताके स्थानमें
होगा । सो ऐसाही करो" वह भी यह सुनकर उस ढेंकलीका आश्रय कर अनेक
देवताओंकी पूजाका संकल्प करके उस कूपसे निकला । प्रियदर्शन भी उसकी
आकांक्षासे वहीं स्थित हो वाट देखता स्थित था । तब बहुत दिनोंतक गंग-
दत्तके न आनेमें प्रियदर्शन दूसरी खखोडलमें रहनेवाली गोधासे बोला- "भद्रे !
थोडी हमारी सहाय करो । कारण कि तुम गंगदत्तको बहुत समयसे जानती
हो । सो जा उसके पास उसे किसी सरोवरमें ढूंढकर मेरा संदेशा कह तुम
इकले ही शीघ्र चले आओ यदि दूसरे मेंडक नहीं आते हैं तो मैं तुम्हारे बिना
यहां रहनेको समर्थ नहीं हूं । और यदि म तेरे साथ विरुद्ध आचरण करूं तो
मैंने इस अन्तरमें अपने पुण्यका फल लगा दिया है" । गोधा भी उसके बचन-
से शीघ्र गंगदत्तको ढूंढ कर बोली- "भद्र गंगदत्त ! वह तुम्हारा मित्र प्रियदर्शन
तुम्हारी वाट देखता स्थित है सो शीघ्र आओ । कदाचित् शंका हो तो तुमसे
विरुद्ध आचरण करनेपर उसने अपना पुण्य बीचमें धर दिया है । सो निश्शंक
मनसे आओ" । यह सुन गंगदत्त बोला-
“बुभुक्षितः किं न करोति पापं
क्षीणा नरा निष्करुणां भवन्ति ।
आख्याहि भद्रे प्रियदर्शनस्य