पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४०२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
ब्रह्महत्यारा, सुरापी, चोर, व्रतभंगकरनेवाला सत्पुरुषोंने इनकी निष्कृति कही
है परन्तु कृतघ्नकी निष्कृति नहीं है ॥ ११ ॥
तत् त्वं मम देवरं गृहीत्वा अद्य प्रत्युपकारार्थं गृहमानय।
नो चेत् त्वया सह मे परलोके दर्शनम्" । तत् अहं तया
एवं प्रोक्तः तव सकाशमागतः । तत् अद्य तया सह त्वदर्थे
कलहायतो मम इयती वेला विलग्ना। तत् आगच्छ मे गृहम्।
तव भ्रातृपत्नी रचितचतुष्का प्रगुणितवस्त्रमणिमाणिक्याद्यु-
चिताभरणा द्वारदेशबद्धवन्दनमाला सोत्कण्ठा तिष्ठति" ।
मर्कट आह-"भो मित्र ! युक्तमभिहितं मद्भ्रातृपत्न्या ।
उक्तञ्च-
सो तू मेरे देवरको ग्रहण कर उसका प्रत्युपकार करनेको घर लेआना । नहीं
तो तेरे साथ मेरा परलोक दर्शन होगा"। सो मैं इस प्रकारसे कहा हुआ तुम्हारे
पास आया हूं । सो आज तुम्हारे अर्थ स्त्रीके साथ क्लेश करते हुए मुझे इतनी
देर लग गई । सो मेरे घरको आओ । तुम्हारी भाभी आंगन सजाये बडे मोलके
वस्त्र मणि माणिक्यसे रचित गहनेवाले द्वारदेश बंधी वंदन माला किये उत्कं-
ठित स्थित है" वानर बोला-"भो मित्र ! तुम्हारी जायाने सत्य कहा है ।
कहा है कि-
वर्जयेत्कौलिकाकारं मित्रं प्राज्ञतरो नरः ।
आत्मनः सम्मुखं नित्यं य आकर्षति लोलुपः ॥ १२ ॥
अति बुद्धिमान् मनुष्य कपट आकारवाले मित्रको त्याग दे जो कपटी मित्र
लोभके कारण नित्य अपने सम्मुख मित्रको खैंचता है ॥ १२ ॥
तथाच-
और देखो-
ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति ।
भुङ्क्ते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम् ॥ १३ ॥
जो देता, ग्रहण करता, गुप्त बात कहता और पूछता, भोजन करता,
भोजन कराता है ये छः प्रकारका प्रीतिका लक्षण है ॥ १३ ॥
परं वयं वनचराः, युष्मदीयञ्च जलान्ते गृहं, तत् कथं