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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 536 में से

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अथ लब्धप्रणाशंनाम चतुर्थं तन्त्रम् ।
अथ इदमारभ्यते लब्धप्रणाशं नाम चतुर्थं तन्त्रं यस्य
अयमादिमः श्लोकः-
अब यह लब्धप्रणाशनाम ( प्राप्त होकर नष्ट होजाना ) चौथे तन्त्रको
आरभ किया जाता है जिसके आदिके यह श्लोकहै-
समुत्पन्नेषु कार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते ।
स एव दुर्गं तरति जलस्थो वानरो यथा ॥ १ ॥
कार्यके उत्पन्न होनेमे जिसकी बुद्धि क्षय नहीं होती है वह कठिन कार्यको
इस प्रकार तरजाताहै जैसे जलमें स्थित वानर ॥ १ ॥
तद्यथा अनुश्रूयते-
सो यह सुना गयाहै कि-
कथा १.
अस्ति कस्मिंश्चित् समुद्रोपकण्ठे महान् जम्बूपादपः
सदाफलः, तत्र च रक्तमुखो नाम वानरः प्रतिवसति स्म ।
तत्र च तस्य तरोरधः कदाचित् करालमुखो नाम मकरः
समुद्रसलिलात् निष्क्रम्य सुकोमलवालुकासनाथे तीरोपान्ते
न्यविशत् । ततश्च रक्तमुखेन स प्रोक्तः-“भो ! भवान् सम-
भ्यागतोऽतिथिः । तद्भक्षयतु मया दत्तानि अमृततुल्यानि
जम्बूफलानि । उक्तञ्च-
किसी सागरके किनारे जामुनका वृक्ष सदा फलवालाहै, वहा रक्तमुखनामवाला
वानर रहताथा । सो उस वृक्षके नीचे एक समय करालमुखनामवाला नाका समुद्रके
जलसे निकलकर सुकोमल रेतसे युक्त उसके तटमें प्राप्त हुआ । तब रक्तमुखने
कहा-“भो ! आप आये हुए हमारे अतिथियो । सो खाओ हमारे दिये हुए
अमृतकी समान जम्बूफल । कहा है-
प्रियो वा यदि वा द्वेष्यो मूर्खो वा यदि पण्डितः ।
वैश्वदेवान्तमापन्नः सोऽतिथिः स्वर्गसंक्रमः ॥ २ ॥