पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 391, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३७६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तब सिंहके शब्द और उसकी प्रतिध्वनिसे वह गुहा पूर्ण होकर अन्य भी वनके
स्थित जीवोको त्रास देती हुई। शृगाल भी यह श्लोक पढता भागा-
अनागतं यः कुरुते स शोभते
स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्।
वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा
बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता ॥ २२७ ॥"
कि जो अनागत विपत्तिका उपाय करता है वह सुखी होता है जो अना-
गतका विचारही नहीं करता वह कष्ट पाता है, इसी वनमें रहते मैं बूढा होगया
परन्तु बिलकी वाणी मैंने कभी नहीं सुनी ॥ २२७ ॥”
तदेवं मत्वा युष्माभिर्मया सह गन्तव्यम्"इति। एवमभि-
धाय आत्मानुयायिपरिवारानुगतो दूरदेशान्तरं रक्ताक्षो
जगाम ।
सो ऐसा विचार कर तुमको मेरे साथ चलना चाहिये" ऐसा कह अपने
अनुगामी परिवारके साथ रक्ताक्ष दूर देशको चलगया ।
अथ रक्ताक्षे गते स्थिरजीवी अतिहृष्टमनाः व्यचिन्तयत,
"अहो ! कल्याणमस्माकमुपस्थितं यत् रक्ताक्षो गतः। यतः
स दीर्घदर्शी, एते च मूढमनसः ततो मम सुखघातयाः सञ्जा-
ताः। उक्तञ्च यतः-
रक्ताक्षके जानेपर स्थिरजीवी प्रसन्न हो विचारने लगा "अहो ! कल्याण
उपस्थित हुआ है जो रक्ताक्ष गया । जो कि वह दीर्घदर्शी है और यह मूढ
मनवाले हैं सो मेरे सुखसे घातके निमित्त हुए हैं। कहाहै कि-
न दीर्घदर्शिनो यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः ।
क्रमायाता ध्रुवं तस्य न चिरात्स्यात्परिक्षयः ॥ २२८ ॥
जिस राजाके यहां दीर्घदर्शी मंत्री नहीं होते हैं और वंशक्रमके नहीं हैं उसका
शीघ्रही विनाश हो जाता है ॥ २२८ ॥
अथवा साधु इदमुच्यते-
अथवा यह अच्छा कहा है-