पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३५० ) पञ्चतन्त्रम् ।
श्वेतं पदं शिरसि यत्तु शिरोरुहाणां
स्थानं परं परिभवस्य तदेव पुंसाम् ।
आरोपितास्थिशकलं परिहृत्य यान्ति
चाण्डालकूपमिव दूरतरं तरुण्यः ॥ १९३ ॥
जो कि शिरपर श्वेत बालोंका स्थान है यह पुरुषोंके तिरस्कारका परम स्थान
है तरुणी चाण्डालके कूपकी समान आरोपित अस्थिखण्डकी समान उसे
त्यागकर चली जाती हैं ॥ १९३ ॥
तथाच-
और देखो-
गात्रं संकुचितं गतिर्विगलिता दन्ताश्च नाशं गता
दृष्टिर्भ्राम्यति रूपमप्युपहंतं वक्त्रञ्च लालायते ।
वाक्यं नैव करोति बान्धवजनः पत्नी न शुश्रूषते
धिक् कष्टं जरयाभिभूतपुरुषं पुत्रोऽप्यवज्ञायते ॥ १९४ ॥
शरीरमें झिल्ली पडी, गति हीन हुई, दांत नाशको प्राप्त हुए, दृष्टि घूमने
लगी, रूप नष्ट हुआ, मुखसे लार गिरने लगी, बन्धुजन उसके वचन नहीं
मानते तथा पत्नी भी नहीं सुनती । जरासे तिरस्कृत पुरुषको धिक् तथा कष्ट है
कि जिसकी पुत्र भी अवज्ञा करता है ॥ १९४ ॥
अथ कदाचित् सा तेन सह एकशयने पराङ्मुखी यावत्
तिष्ठति, तावद्गृहे चौरः प्रविष्टः। सा अपि तं चौरं दृष्ट्वा
भयव्याकुलिता वृद्धमपि तं पतिं गाढं समालिलिङ्ग। सोऽपि
विस्मयात् पुलकांकितसर्वगात्रः चिन्तयामास । "अहो !
किमेषा मामद्य अवगूहते" । यावत् निपुणतया पश्यति,
तावत् गृहकोणैकदेशे चौरं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत् । "नूनं एषा
अस्य भयात् मामालिङ्गति" इति ज्ञात्वा तं चौरमाह-
एक समय जब वह उसके साथ एक ही शयनमें मुख फेरे स्थित थी उसके
घरमें उस समय चोर घुसा । वह भी उस चोरको देख भयसे व्याकुल चित्त
हो उस वृद्धकोही आलिंगन करती हुई । वह भी विस्मयसे सब शरीर पुलकित
हो विचारने लगा । "अहो ! आज यह कैसे मुझे आलिंगन करती है" । जब