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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (३४९)
यह सुन अरिमर्दनने दीप्ताक्षसे पूछा- "ऐसा कहनेपर आप क्या मानते
हो?"। वह बोला- "देव! इसको मत मारो-
यतः-
जिससे-
या ममोद्विजते नित्यं सा मामद्यावगूहते ।
प्रियकारक भद्रं ते यन्ममास्ति हरस्व तत् ॥ १९१ ॥
जो निरन्तर मुझसे क्लेश मानती थी वह आज मुझे आलिंगन करती है
हे प्रियकारक ! तुम्हारा मगल हो जो मेरा है उसे ग्रहण कर (चोरके प्रति
गृहस्थीका वचन है) ॥ १९१ ॥
चौरेण चापि उक्तम्-
तब चोरने भी कहा-
"हर्त्तव्यं ते न पश्यामि हर्त्तव्यं चेद्भविष्यति ।
पुनरप्यागमिष्यामि यदीयं नावगूहते ॥ १९२ ॥"
तेरे हरने योग्य धनको नहीं देखता हूं जो हरने योग्य होगा तो फिर भी
आऊंगा जो यह स्त्री आलिंगन न करेगी ॥ १९२ ॥"
अरिमर्दनः पृष्टवान्,-"का च नावगूहते ? कश्चार्यं
चौर इति विस्तरतः श्रोतुमिच्छामि"। दीप्ताक्षः कथयति-
अरिमर्दन पूछने लगा- "कौन नहीं आलिंगन करती ? कौन यह चोर है ?
यह विस्तारसे सुननेकी इच्छा करता हूँ"। दीप्ताक्ष कहने । लगा-
कथा ८.
अस्ति कस्मिंश्चिदधिष्ठाने कामातुरो नाम वृद्धवणिक्,
तेन च कामोपहतचेतसा मृतभार्येण काचिन्निर्द्धनवणिक्-
सुता प्रभूतं धनं दत्त्वा उद्वाहिता । अथ सा दुःखाभिभूता
तं वृद्धवणिजं द्रष्टुमपि न शशाक । युक्तञ्चैतत्-
किसी एक स्थानमे कामातुर नाम वृद्ध वणिक् रहता था, उसने कामसे
उपहत चित्त हो भार्याके मृत होजानेसे कोई निर्धन वणिकपुत्री बहुतसा धन
देकर विवाही। वह दुःखसे व्याकुल हुई उस वृद्ध वणिकको देखनेको भी समर्थ
न हुई। यह युक्तही हे-