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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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“कि-बहुत बुद्धिसे युक्त, विज्ञानवाले, बलसे उत्कट शत्रुके वञ्चन करनेमें
समर्थ होजाते हैं जैसे ब्राह्मणसे छाग लेलिया ॥ १२१ ॥”
अथवा साधु इदमुच्यते-
अथवा यह साधु कहाहै कि-
अभिनवसेवकविनयैः प्राघूर्णकोक्तैर्विलासिनिरुदितैः ।
धूर्त्तजनवचननिकरैरिह कश्चिदवञ्चितो नास्ति ॥ १२२ ॥
नये सेवकोंकी विनयसे, आगन्तुकके बचनोंसे, स्त्री जनोंके रोनेसे, धूर्त
जनोंके वाक् प्रपञ्चसे इस जगतमें कौन नहीं वचित हुआ है ॥ १२२ ॥
किञ्च, दुर्बलैः अपि बहुभिः सह विरोधो न युक्तः।
उक्तञ्च-
किंच बहुत दुर्बलोंके साथभी विरोध करना उचित नहीं है । कहाहै-
बहवो न विरोद्धव्या दुर्जया हि महाजनाः ।
स्फुरन्तमपि नागेन्द्रं भक्षयन्ति पिपीलिकाः ॥ १२३ ॥”
कि बहुतोंके साथ विरोध नहीं करना चाहिये महाजन दुर्जय होते हैं क्यों
कि चींटी तेजस्वी सर्पकोभी भक्षण करगई ॥ १२३ ॥”
मेघवर्ण आह-“कथमेतत् ?” स्थिरजीवी कथयति-
मेघवर्ण बोला-“यह कैसे ?” स्थिरजीवी कहने लगा-
कथा ४.
अस्ति कस्मिंश्चित् वल्मीके महाकायः कृष्णसर्पोऽतिदर्पो
नाम । स कदाचित् बिलानुसारिमार्गमुत्सृज्य अन्येन लघु-
द्वारेण निष्क्रमितुमारब्धः।निष्क्रामतश्च तस्य महाकायत्वात्
दैववशतया लघुविवरत्वाच्च शरीरे व्रणः समुत्पन्नः । अथ व्रण-
शोणितगन्धानुसारिणीभिः पिपीलिकाभिः सर्वतो व्याप्तो
व्याकुलीकृतश्च । कति व्यापोदयति कति वा ताडयति।
अथ प्रभूतत्वात् विस्तारितबहुव्रणः क्षतसर्वाङ्गोऽतिदर्पः पञ्च-
त्वमुपागतः । अतोऽहं ब्रवीमि-
किसी वल्मीकमें महा कायावाला काला साप अतिदर्प नामवाला है। वह
एक समय बिलानुसारी मार्गको छोड़कर और लघुद्वारसे निकलने लगा । निकलते