पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२७९)
यह कह लघुपतनक चित्रांगको समझाकर जहा हिरण्यक मन्थरक थे वहा जाकर
सम्पूर्ण चित्रांगके पाशका बंधन कथन किया । चित्रागके पाश छेदनमें निश्चय
करे हुए हिरण्यकको पीठपर चढा कर बहुत शीघ्र चित्रांगके समीप गया ।
वहभी मूषकको देख कुछ जीनेकी आशासे युक्त हो बोला--
“आपन्नाशाय विबुधैः कर्त्तव्याः सुहृदोऽमलाः ।
न तरत्यापदं कश्चिद्योऽत्र मित्रविवर्जितः ॥ १८६ ॥”
“पंडितोंको आपत्तिके नाश करनेको निर्मल सुहृद् करने चाहिये जो
मित्रोंसे वर्जित है वह कभी आपत्तिको नहीं तर सक्ता है ॥ १८६ ॥”
हिरण्यक आह,—“भद्र ! त्वं तावत् नीतिशास्त्रज्ञो दक्ष-
मतिः । तत् कथमत्र कूटपाशे पतितः” स आह,—“भो न
कालोऽयं विवादस्य । तन्न यावत् स पापात्मा लुब्धकः सम-
भ्येति तावत् द्रुततरं कर्त्तय इमं मत्पादपाशम्”। तदाकर्ण्य
विहस्य आह,—हिरण्यकः-“किं मयि अपि समायाते
लुब्धकात् बिभेषि । ततः शास्त्रं प्रति महती मे विरक्तिः
सम्पन्ना यद्भवद्विधा अपि नी शास्त्रविदः एनामवस्थां
प्राप्नुवन्ति । तेन त्वां पृच्छामि”। स आह-“भद्र ! कर्मणा
बुद्धिरपि हन्यते । उक्तञ्च-
हिरण्यक बोला-“भद्र तुम तो नीतिशास्त्रके ज्ञाता चतुर बुद्धिवाले हो । सो
किस प्रकार इस कूटपाशमे फसगये” वह बोला,-“भो ! यह समय विवा-
दका नहीं हे सो जबतक वह पापात्मा लुब्धक नहीं आता तबतक शीघ्रतासे
मेरे चरणोंकी पाशी काटो”। यह सुन हिरण्यक हँसकर बोला-“क्या मेरे आने
पर भी लुब्धकसे डरता है । अब शास्त्रसे मुझे बडा भारी विराग प्राप्त हुआ ।
जो आप सरीखे नीतिशास्त्रके ज्ञाता इस अवस्थाको प्राप्त होते हैं इस कारण
तुझसे पूछताहूं”। वह बोला-“भद्र ! कर्मसे बुद्धि क्षीण होजाती है । कहा है-
कृतान्तपाशबद्धानां दैवोपहतचेतसाम् ।
बुद्धयः कुब्जगामिन्यो भवन्ति महतामपि ॥ १८७ ॥
कालपाशमें बँधेहुओंकी दैवसे हत चित्तवाले महात्माओंकी बुद्धि भी
कुटिलगामिनी होती है ॥ १८७ ॥