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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( २१६ ) पञ्चतन्त्रम् ।
त्नीनां, लुब्धकहरिणानां, श्रोत्रियभ्रष्टक्रियाणां, मूर्ख-
पण्डितानां, पतिव्रताकुलटानां, सज्जनदुर्जनानाम्।
न कश्चित् केनापि व्यापादितः, तथापि प्राणान् सन्ता-
पयन्ति ।
काक बोला-“भो ! दो प्रकारके बैरके लक्षण सुननेकी इच्छा करता हूं सो
कहो” हिरण्यक बोला,-“भो ! जो कारणसे निष्पन्न होजाय वह कृत्रिम है
उसके योग्य साधनोंसे वह निवृत्त हो जाता है । और स्वाभाविक फिर किसी
प्रकारसे नहीं जाता है । सो जैसा न्योले सर्पका, तृणभोजी नखायुधोंका, जल
अग्निका, देव दैत्योंका, कुत्ते बिल्लोका, महान् और दरिद्रीका, सौतोंका,
लुब्धक हरिणोंका, वेदपाठी और भ्रष्ट क्रियावालोंका, मूर्ख पंडितोंका, पतिव्रता
कुलटाओंका, सज्जन दुर्जनोंका । सो किसीको किसीने मार नहीं डाला तोभी
प्राणोंको तो सन्ताप देते हैं ।
वायस आह,-
कौआ बोला,-
“कारणान्मित्रतां याति कारणादेति शत्रुताम् ।
तस्मान्मित्रत्वमेवात्र योज्यं वैरं न धीमता ॥ ३४ ॥
कारणसेही मित्र और कारणसेही शत्रु होजाता है इस कारण बुद्धिमान्‌को
मित्रताही करनी चाहिये वैर नहीं ॥ ३४ ॥
तस्मात् कुरु मया सह समागमं मित्रधर्मार्थम् ।”
हिरण्यक आह,-“भोः ! श्रूयतां नीतिसर्वस्वम्-
इस कारण मेरे साथ मित्रधर्म अर्थात् मित्रता करो” हिरण्यक बोला,-“भो !
नीतिका सर्वस्व सुनो-
सकृद्दुष्टमपीष्टं यः पुनः सन्धातुमिच्छति ।
स मृत्युमुपगृह्णाति गर्भमश्वतरी यथा ॥ ३५ ॥
जो एकबारही दुष्ट हुए मित्रके साथ फिर सन्धिकी इच्छा करता है वह
मृत्युको ही ग्रहण करता है जैसे गर्भको खच्चरी ॥ ३५ ॥
अथवा गुणवानहं न मे कश्चित् वैरियातनां
करिष्यति एतदपि न सम्भाव्यम् । उक्तञ्च-