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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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पृष्ठ 183

( १६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
समय प्रसव समीपवाली प्रसववेदनासे अपने यूथसे भ्रष्ट हुई ऊंटनी बैठी हुई
गहन वनमें देखी ( पाई ) उसको मारकर जबतक पेट फोडता है तबतक
जीता हुआ छोटा ऊंटनीका बच्चा निकला । सिंहभी ऊंटनीके मांससे परिवार-
सहित परम तृप्तिको प्राप्त हुआ परंतु स्नेहसे बालक ऊंटनीके त्यागे बच्चेको घरमें
लाकर यह बोला—"भद्र ! तेरेको मृत्युसे भय नहीं न मुझसे न अन्यसे । सो
स्वेच्छासे अपने वनमें भ्रमण करो । जो कि, तेरे शंकुकी समान कानहैं इससे
तेरा शंकुकर्ण नाम होगा" । ऐसा अनुष्ठान कर फिर वे चारों एक स्थानमें
विहार करते परस्पर अनेक प्रकार गोष्ठीसुख अनुभव करते स्थित थे । शंकुक-
र्णभी यौवनपदवीको प्राप्त हुआ क्षणमात्रभी सिंहको न छोडता । कभी वज्रदं-
ष्ट्रका किसी दूसरे वनके हाथीके साथ युद्ध हुआ । उससे मदके वीर्यसे वह
दन्तके प्रहारोंसे इस प्रकार क्षतशरीर होगया कि, एक पगभी चलनेको समर्थ
न हुआ । तब भूखसे व्याकुल हुआ उनसे बोला—"भो ! कोई जीव ढूंढो जो मैं
इस दशामें स्थित हुआभी उसको मारकर अपनी और तुम्हारी क्षुधा शान्त करूं.”
यह सुनकर वे तीनों वनमें सन्ध्याकाल पर्यन्त घूमे परन्तु कोई जीव न मिला ।
तब चतुरक विचार करनेलगा "जो यह शंकुकर्ण माराजाय तो सबकी कुछ
दिनोंतक तृप्तिहो परन्तु मित्र तथा आश्रित होनेसे स्वामी इसको न मारेगा । अथवा
बुद्धिके प्रभावसे स्वामीको समझाकर ऐसा करूंगा जैसे वह मारडाले । कहाहै—
अवध्यं चाथवागम्यमकृत्यं नास्ति किंचन ।
लोके बुद्धिमतां बुद्धेस्तस्मात्तां विनियोजयेत् ॥ ४०० ॥”
इस संसारमें बुद्धिमानोंको कोई अवध्य, अगम्य और अकृत्य नहीं है इस
कारण बुद्धिको कार्यमें लगावे ॥ ४०० ॥
एव विचिन्त्य शंकुकर्णमिदमाह, –"भोः शंकुकर्ण ! स्वा-
मी तावत्पथ्यं विना क्षुधया परिपीडयते स्वाम्यभावा-
दस्माकमपि ध्रुवं विनाश एव । ततो वाक्यं किंचित् स्वा-
म्यर्थे वदिष्यामि । तत् श्रूयताम्” । शंकुकर्ण आह—"भोः !
शीघ्र निवेद्यतां येन ते वचनं शीघ्रं निर्विकल्पं करोमि ।
अपरं स्वामिनो हिते कृते मया सुकृतशतं कृतं भविष्यति” ।
अथ चतुरक आह—"भो भद्र ! आत्मशरीरं द्विगुणलाभेन