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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( १६६ ) पञ्चतन्त्रम् ।

यदि साधु अपने स्थानमें दुर्जनका प्रवेश करादेताहै सो वह उस पदकी
स्वयं इच्छा करता हुआ उसके नाशके लिये यत्न करता है इसकारण बुद्धि-
मानोंको चाहिये कि, अधमोंको प्रवेश न दे यह सुना जाता है कि, जारभी
गृहपति होता है ॥ ३९७ ॥
तेन मया तस्योपरि वधोपाय एष विरच्यते। देशत्यागाय
वा भविष्यति । तच्च त्वां मुक्त्वा अन्यो न ज्ञास्यति, तद्यु-
क्तमेतत् स्वार्थार्थानुष्ठितम् । उक्तञ्च यतः-
इस कारण मैने उसके ऊपर यह वधका उपाय रचा है । अथवा देशत्याग
होगा । सो यह तुम्हारे सिवाय और कोई न जानेगा सो युक्तहीहै और यहभी
स्वार्थके निमित्तही अनुष्ठान कियाहै । जो कि कहाहै-
निस्त्रिंशं हृदयं कृत्वा वाणीं क्षुरसमोपमाम् ।
विकल्पोऽत्र न कर्त्तव्यो हन्यात्तत्रापकारिणम् ॥ ३९८ ॥
हृदयको खड्ग सरीखा और वाणीको क्षुरकी समान करके बिना विचारे
अपकारीको मारना चाहिये ॥ ३९८ ॥
अपरं मृतोऽपि अस्माकं भोज्यो भविष्यति, तदेकं ताव-
द्वैरसाधनम् । अपरं साचिव्यञ्च भविष्यति तृप्तिश्चेति । तद्-
गुणत्रयेऽस्मिन् उपस्थिते कस्मान्मां दूषयसि त्वं जाड्य-
भावात् । उक्तञ्च-
और मरकरभी वह हमारा भोज्य होगा । सो एक तो बैर साधन होगा
और मंत्रिपद तथा तृप्ति होगी । सो तीन गुणोंको उपस्थित होनेमें मूर्खतासे तू
क्यों मुझको दूषित करता है । कहा है-
परस्य पीडनं कुर्वन्स्वार्थसिद्धिं च पण्डितः ।
मूढबुद्धिर्न भक्षेत वने चतुरको यथा ॥ ३९९ ॥"
पंडितजन पराई पीडा करकेभी स्वार्थसिद्धि करते हैं मूढबुद्धि तो भोगको
समर्थ नहीं होता जैसे वनमें चतुरक ॥ ३९९ ॥"
करटक आह- "कथमेतत् ?" स आह-
करटक बोला-"यह कैसे ?" वह बोला-