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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम् । (१३९)

अथवा साधु चेदमुच्यते-
अथवा सत्य कहाहै-
पादाहतोऽपि दृढदण्डसमाहतोऽपि
यं दंष्ट्रया स्पृशति तं किल हन्ति सर्पः ।
कोऽप्येष एव पिशुनोऽयममनुष्यधर्मः
कर्णे परं स्पृशति हन्ति परं समूलम् ॥ ३२८ ॥
चरणसे हत और दृढ दंडसे ताडित सर्प जिसे दष्ट्रासे काटता है वही
मरता है और यह मनुष्य धर्मकी चुगली इस प्रकारकी है कि, मनुष्यको समूल
नष्ट करतीहै ॥ ३२८ ॥
तथाच-
औरभी-
अहो ! खलभुजङ्गस्य विपरीतो वधक्रमः ।
कर्णे लगति चैकस्य प्राणैरन्यो वियुज्यते ॥ ३२९ ॥
अहो दुष्ट और सर्पके वध करनेका धर्म विपरीत है कि, वह कानमें किसीके
लगताहै और प्राणोंसे कोई ( नष्ट ) पृथक् होता है ॥ ३२९ ॥
तदेवं गतेऽपि किं कर्त्तव्यमिति अहं त्वां सुहृद्भावात्,पृच्छा-
मि" । दमनक आह-"तद्देशान्तरगमनं युज्यते न एवं विध-
स्य कुस्वामिनः सेवां विधातुम् । उक्तञ्च-
सो ऐसा होनेपरभी क्या करना चाहिये मैं तुझसे सुहृद्भावसे पूछता हू"
दमनक बोला,-"आप अन्यस्थानमे चले जाइये इस प्रकारके कुस्वामीकी सेवा
करनी उचित नहीं कहा है-
गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्य्याकार्य्यमजानतः ।
उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते ॥ ३३० ॥"
उद्धत कार्य अकार्यके न जाननेवाले उन्मार्गमें प्राप्त गुरुजनका भी त्याग
कर देना चाहिये ॥ ३३० ॥"
सञ्जीवक आह-"अस्माकमुपरि स्वामिनि कुपिते गन्तुं
न शक्यते न च अन्यत्र गतानामपि निर्वृत्तिर्भवति । उक्तञ्च-