सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

( १३८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
तद्भद्र ! क्षुद्रपरिवारोऽयं ते राजा मया सम्यग् ज्ञातः
सतामसेव्यश्च । उक्तञ्च-
सो हे भद्र ! यह तुम्हारा राजा क्षुद्रपरिवारवाला है यह मैंने भलीप्रकार
जानलिया इससे सत्पुरुषोंको असेव्यहै। कहाभीहै-
अशुद्धप्रकृतौ राज्ञि जनता नानुरज्यते ।
यथा गृध्रसमासन्नः कलहंसः समाचरेत् ॥ ३२४ ॥
अशुद्ध प्रकृतिवाले राजामें प्रजा ( प्रसन्न ) आनन्द नहीं होती जैसे गृध्रोंसे
युक्त कलहंस श्रेष्ठ आचरण नहीं करसकता ॥ ३२४ ॥
तथाच-
ओर देखो-
गृध्राकारोऽपि सेव्यः स्याद्धंसाकारैः सभासदैः ।
हंसाकारोऽपि सन्त्याज्यो गृध्राकारैः स तैर्नृपः ॥ ३२५ ॥
गृध्रकेसे आकारवाले राजाका हंसाकारवाले सभासद सेवन करसकतेहैं और
हंसाकार राजा गृध्राकारवाले सभासदोंसे युक्त हो तो त्यागना चाहिये ॥३२५॥
तन्नूनं ममोपरि केनचित् दुर्जनेन अयं प्रकोपितः । तेनैवं
वदति । अथवा भवति एतत् । उक्तञ्च-
सो निश्चय मेरे ऊपर किसी दुर्जनने इसको क्रोधित करादिया इसीसे ऐसा
कहताहै । अथवा यह होताहीहै, कहाहै-
मृदुना सलिलेन खन्यमाना-
न्यवधृष्यन्ति गिरेरपि स्थलानि ।
उपजापविदां च कर्णजापैः
किमु चेतांसि मृदूनि मानवानाम् ॥ ३२६ ॥
कोमल जलसे घिसे हुए पर्वतके स्थलभी घिस जाते हैं फिर भेदमें कुशल
मनुष्योंके कान भरनेसे कोमल मनुष्योंके चित्तोंकी कौन कहे ॥ ३२६ ॥
कर्णविषेण च भग्नः किं किं न करोति बालिशो लोकः ।
क्षपणकतामपि धत्ते पिबति सुरां नरकपालेन ॥ ३२७ ॥
कान भरनेके विषसे भग्न हुआ मूर्ख लोग क्या क्या नहीं करताहै बहुत क्या
संन्यासीभी होता है तथा मनुष्यकी खोपडीमें सुरापान भी करता है ॥३२७