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पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( १२५)
तोभी मैंने तुम्हारे स्नेहके पाशबद्ध होनेके कारण मंत्रभेद किया है, क्योंकि
तुम मेरे वचनसे इस राजकुलमें प्रविष्ट हुए हो । कहा है-
विश्रम्भाद्यस्य यो मृत्युमवाप्नोति कथञ्चन ।
तस्य हत्या तदुत्था सा प्राहैदं वचनं मनुः ॥ २९७ ॥
जिसके विश्वाससे जो कोई मृत्युको किसीप्रकार प्राप्त होताहै उसकी हत्या
उसीको लगतीहै, यह वचन मनुजीने कहा है ॥ २९७ ॥
तत् तवोपरि पिङ्गलकोऽयं दुष्टबुद्धिः । कथितं च अद्य
अनेन मत्पुरतश्चतुष्कर्णतया “यत्प्रभाते सञ्जीवकं हत्वा सम-
स्तम्गपरिवारं चिरात् तृप्तिं नेष्यामि” । ततः स मयोक्तः-
“स्वामिन् ! न युक्तमिदं यन्मित्रद्रोहेण जीवनं क्रियते ।
उक्तञ्च-
सो तुम्हारे ऊपर यह पिंगलक दुष्टबुद्धि है आज इसने मेरे आगे चारकर्णसे
कहाथा (अर्थात् मैं और वह) कि, “प्रभात सञ्जीवकको मारकर समस्त
मृगपरिवारको चिरकालतक तृप्त करूंगा” तब उससे मैंने कहा-“स्वामिन् !
यह युक्त नहीं कि, जो मित्रद्रोहसे जीवन किया जाय । कहाहै-
अपि ब्रह्मवधं कृत्वा प्रायश्चित्तेन शुध्यति ।
तदर्हेण विचीर्णेन न कथञ्चित्सुहृद्द्रुहः ॥ २९८ ॥
ब्रह्मवधकर उसके योग्य विशेष अनुष्ठानका प्रायश्चित्त करनेसे शुद्ध होजाता
पर मित्रद्रोही शुद्ध नहीं होता ॥ २९८॥
ततस्तेनाहं सामर्षेणोक्तः-“भो दुष्टबुद्धे ! सञ्जीवकस्तावत्
शष्पभोजी, वयं मांसाशिनस्तदस्माकं स्वाभाविकं वैरमिति
कथं रिपुरुपेक्ष्यते । तस्मात् सामादिभिरुपायैर्हन्यते । न च
हते तस्मिन् दोषः स्यात् । उक्तञ्च-
तब उसने मुझसे क्रोधकर कहा,-“भो दुष्टबुद्धे ! सञ्जीवक तो घासखाने-
वालाहै, हम मास खानेवाले सो हमारा उससे स्वभाविक वैरहै क्यो रिपुकी उपेक्षा
करें । इस कारण सामादि उपायोंसे मारतेहैं, इसके मारनेमें दोष नहीं । कहाहै-
दत्त्वापि कन्यकां वैरी निहन्तव्यो विपश्चिता ।
अन्योपायैरशक्यो यो हते दोषो न विद्यते ॥ २९९ ॥

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