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सर्वकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

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( १२४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
भूशय्या ब्रह्मचर्य्यञ्च कृशत्वं लघुभोजनम् ।
सेवकस्य यतेर्य्यद्वद्विशेषः पापधर्मजः ॥ २९२ ॥
पृथ्वीमें शय्या ब्रह्मचर्य्य कृशता लघुभोजन सेवकका यतीकी समान होतोहै
अन्तर यह है सेवकका पापके निमित्त है यतिका धर्मके निमित्तहै ॥ २९२ ॥
शीतातपादिकष्टानि सहते यानि सेवकः ।
धनाद्य तानि चाल्पानि यदि धर्मान्न मुच्यते ॥ २९३ ॥
शीत गरमीके कष्ट जो सेवक धनके निमित्त सहन करताहै वह कष्ट अल्प होते
यदि वह धर्मसे न छूटता ॥ २९३ ॥
मृदुनापि सुवृत्तेन सुश्लिष्टेनापि हारिणा ।
मोदकेनाऽपि किं तेन निष्पत्तिर्यस्य सेवया ॥ २९४ ॥"
बडे मधुर गोल मनोहर उस लडडूसे भी क्याहै जो सेवा करनेसे प्राप्त
होताहै ॥ २९४ ॥"
सञ्जीवक आह— “अथ भवान् किं वक्तुमनाः ?” सोऽब्र-
वीत्— “मित्र ! सचिवानां मन्त्रभेदं कर्तुं न युज्यते ।
संजीवक बोला,—“तो तुम क्या कहना चाहते हो?” वह बोला,—“मित्र ! मंत्रि-
योको मंत्रभेद करना मुनासिब नही ।
उक्तञ्च-
कहाहै-
यो मन्त्रं स्वामिनो भिन्द्यात्साचिव्ये सन्नियोजितः ।
स हत्वा नृपकार्यं तत्स्वयञ्च नरकं व्रजेत् ॥ २९५ ॥
जो मन्त्रीकी पदवीमें स्थित मंत्री मंत्रभेद करदे वह राजाके कार्यको
नष्ट करके स्वयं नरकको जाता है ॥ २९५ ॥
येन यस्य कृतो भेदः सचिवेन महीपतेः ।
तेनाशस्त्रवधस्तस्य कृत इत्याह नारदः ॥ २९६॥
जिस मंत्रीने राजाका मंत्रभेद करदिया है उसने राजाका विनाही शस्त्रके वध
किया यह नारदजी कहते हैं ॥ २९६ ॥
तथापि मया तव स्नेहपाशबद्धेन मन्त्रभेदः कृतः । यत-
स्त्वं मम वचनेनात्र राजकुले विश्वस्तः प्रविष्टश्च । उक्तञ्च-