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सर्वकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 726 में से

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पृष्ठ 74

५६ पञ्चदशी
माया नाम की जो शक्ति, सद्वस्तु में आकाश की कल्पना
कर लेती है, वही शक्ति यह भी करती है कि पहले सत् तथा
आकाश के अभेद की कल्पना करके फिर उनके धर्मधर्मिभाव
को भी उलट-पुलट कर देती है। [यही कारण है कि 'सत् का
आकाश' ऐसी प्रतीति के स्थान पर 'आकाश की सत्ता' ऐसी
उलटी प्रतीति लोगों को होने लगी है]।
सतो व्योमत्वमापन्नं व्योम्नः सत्तां तु लौकिकाः ।
तार्किकाश्चावगच्छन्ति मायाया उचितं हि तत् ॥६४॥
सत् का ही आकाशभाव होगया है। परन्तु लौकिक और
तार्किक लोग उसको 'आकाश की सत्ता' ऐसा उलटा समझ बैठे
हैं। यह विपरीत भाव कर देना माया के लिये कोई बड़ी बात
नहीं है।
वस्तु तत्व का विचार करने पर ज्ञात होता है, कि जैसे
मिट्टी घटरूपी होगई है इसी प्रकार सत् ही आकाशभाव को
प्राप्त हो गया है। परन्तु लौकिक प्राणी तथा तर्कशास्त्री लोग
उसके कितना विरुद्ध समझ बैठे हैं कि वे सत्ता को आकाश का
धर्म ही मानने लगे हैं। ऐसा विपरीत दर्शन करा देना माया
के लिये उचित ही है। माया से और आशा ही क्या की जा
सकती थी ?
यद् यथा वर्तते तस्य तथात्वं भाति मानतः ।
अन्यथात्वं भ्रमेणेति न्यायोऽयं सार्वलौकिकः ॥६५॥
जो [रस्सी आदि] जैसा [रस्सी आदि रूप में] है उसका
वैसापन तो प्रमाण से प्रकट हुआ करता है। परन्तु उस [रस्सी]
का अन्यथाभाव [सर्परूपता] भ्रान्ति से प्रतीत हुआ करता है।