पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 258, कुल 726 में से
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परोक्षज्ञानतो नश्येदसत्वावृतिहेतुता ।
अपरोक्षज्ञाननाश्या ह्यभानावृतिहेतुता ॥४५॥
['कूटस्थ है' ऐसा] परोक्षज्ञान जब हो जाता है, तब
अज्ञान की असत्वावरण शक्ति नष्ट हो जाती है [फिर वह
साधक 'ब्रह्म नहीं है' ऐसा कभी नहीं कहता] जब तो [मैं ही
कूटस्थ हूँ' ऐसा] प्रत्यक्ष ज्ञान हो जाता है फिर [कूटस्थ की
प्रतीति मुझे नहीं होती ऐसा] अभानावरण भी भाग जाता है ।
[असत्वावरण अनुभवीगुरु के समझाने से जाता है,अभानावरण
अपने प्रयत्न से साक्षात् होने पर हटाया जाता है ] ।
अभानावर्णे नष्टे जीवत्वारोपसंक्षयात् ।
कर्तृत्वाद्यखिलः शोकः संसाराख्यो निवर्तते ॥४६॥
[पिछली दोनों अवस्थायें ज्ञान का फल हैं । अब उन में
से पहली शोकनिवृत्ति नाम की अवस्था को कहा जाता है कि]
अभानावरण जब निवृत्त हो जाता है तब भ्रान्ति से प्रतीत
होने वाला जीवत्व भी नहीं रहता और फिर तो [जीव भाव
के कारण बना हुआ] कर्ता भोक्ता रूपी संसार नाम का सभी
शोक भाग जाता है ।
निवृत्ते सर्वसंसारे नित्यमुक्तत्वभासनात् ।
निरङ्कुशा भवेत् तृप्तिः पुनः शोकासमुद्भवात् ॥४७॥
जब [कर्तृत्व आदि रूप वाला] सब संसार नहीं रहता
तब [मेघों के हट जाने से सूर्य का भास जैसे हो जाता है उसी
तरह] आत्मा के नित्यमुक्तपने का भास होने लगता है । फिर
तो निर्मर्याद तृप्ति हो जाती है । क्योंकि फिर कभी शोक की
उत्पत्ति ही नहीं हो सकती ।