पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 215, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंचित्रदीपप्रकरणम् १९५
ब्रह्मविद्या के अतिरिक्त और विद्याओं के कारण यदि उनमें
ऊँच नीच भाव होता हो तो हुआ करो । ऐसे उत्तमाधम भाव
से मुमुक्षु लोगों को लाभ ही क्या ? देखते नहीं हो कि सपने
में राज्य करने से और सपने में भीख माँगने से, जागे हुए
आदमी का कुछ भी घटता बढ़ता नहीं है ।
तस्मान्मुमुक्षुभि नैव मतिर्जीवेशवादयोः ।
कार्या, किन्तु ब्रह्मतत्वं विचार्यं बुध्यतां च तत् ॥२१९॥
इस कारण हमारा तो यही कहना है कि—जो लोग मुक्ति
चाहते हों, वे 'जीववाद' और 'ईश्वरवाद' के झगड़े में कभी
भी न पड़ें । उन्हें तो चाहिये कि वे सदा ब्रह्मतत्व का ही विचार
करें और विचार कर उस ब्रह्मतत्व को पहचान जाँय ।
पूर्वपक्षतया तौ चेत् तत्वनिश्चयहेतुताम् ।
प्राप्नुतोऽस्तु निमज्जस्व तयो नैतावताऽवशः ॥२२०॥
यदि तो वे जीववाद और ईश्वरवाद पूर्वपक्ष रूप से तत्व
का निश्चय करने में सहायक होते हों तो हमें कुछ कहना नहीं
है । हम तो केवल यही कहते हैं कि—इतने मात्र से तुम इन
दोनों के विचार में ही बेबस होकर डूबे न रह जाओ [अपने
विवेकज्ञान को हाथ से खो मत बैठो ] ।
असङ्गचिद्विभुर्जीवः सांख्योक्तस्तादृगीश्वरः ।
योगोक्तस्तत्वमोरर्थौ शुद्धौ ताविति चेच्छृणु ॥२२१॥
न तत्वमोरभावार्था वसत्सिद्धान्ततां गतौ ।
अद्वैतवोधनायैव सा कक्षा काचिदिष्यते ॥२२२॥
सांख्य ने जीव को असङ्ग चेतन और व्यापक बताया है ।