पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
११२ पाकदर्पणम्
कफज रोगों को नाश करता है। अर्थात् यह क्षीरपाक सभी प्रकार के रोगों को
नष्ट करता है ।। २२३ ।।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित क्षीरादिपाकनिरूपण नामक दसवाँ प्रकरण समाप्त ।। १० ।।
अथ दधिभेदप्रकरणम्
दधिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अनेकचित्रसंयुक्तः क्षीरभेदश्च दर्शितः ।
दर्श्यते दधिभेदस्तु सुचित्रं विविधं यथा ॥ १ ॥
अर्धावशिष्टधवलं सुपक्वं क्षीरमुत्तमम् ।
सक्षीरखण्डमृद्भाण्डे समादाय शुभे न्यसेत् ॥ २ ॥
सुजातं मातुलुंगस्य फलं स्थूलं समाहरेत् ।
फणाकारसमायुक्तशलाकातीव्रधारया ॥ ३ ॥
वृन्तं मूलं ततस्तस्य किञ्चिच्छित्त्वाऽप्रमाणवित् ।
उद्धरेत्तद्गतान् सर्वान् बीजत्वक्केसरान् बुधः ॥ ४ ॥
एकवारं द्विवारं वा क्षालयेद्वारिणा च तत् ।
कल्केन घनसारादीन् तदन्तं लेपयेद् बुधः ॥ ५ ॥
वासयेद्बहुभिश्चैव जात्यादिकुसुमैः पुनः ।
तत्रत्यानि प्रसूनानि दधिपक्षे समुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं क्षीरं तत्र समण्डकम् ।
पूरयेन्नवनीतं च किञ्चित्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ७ ॥
छेदेनापूर्य छिन्नेन तन्मुखं छादयेत्सुधीः ।
अनेनैव प्रकारेण दधि कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ८ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं सर्वारुचिनिवारणम् ।
बलपुष्टिकरं रम्यं भवेत्कायाग्निदीपनम् ॥ ९ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे दधिभेदनिरूपणं नाम एकादशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥
दही बनाने की विधि तथा गुण इसके पूर्व क्षीरप्रकरण में दूध के भेद
दर्शाये गये। अब अनेक प्रकार के विचित्र दही के भेद बताये जा रहे हैं। अच्छी
तरह पकाया हुआ अर्धावशिष्ट दूध लेकर उत्तम शक्करयुक्त दूध के पात्र में
रखे । इसके बाद बड़ा बिजौरा नींबू का फल ले आये और उसको फणाकार
तेज धार वाली शलाका से साफ कर ले । उसकी भेटी तथा मूल भाग का प्रमाण
को जानने वाला थोड़ा काट दे। पुनः उसके अन्दर के सभी पदार्थों (बीज केशर
आदि) को निकाल दे और उसको एक बार या दो बार जल से प्रक्षालन कर ले।
इसके बाद कर्पूर आदि के कल्क से उसके अन्दर लेप लगा दे। पुनः चमेली
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आदि अनेक सुगन्धित पुष्पों से सुगन्धित कर ले । उसमें के सभी पुष्पों को
दही में छोड़ दे । तदनन्तर उसमें माण्ड सहित थोड़ा गरम दूध १ भर दे और
थोड़ा मक्खन छोड़ दे इस के बाद कटे नींबू के टुकड़े से उसका मुख ढक दे । इस
प्रकार दही बना कर खाने के लिये दे । यह दही रुचिकारक, पथ्य, सभी प्रकार
के अरुचियों को दूर करने वाला बल एवं पुष्टिकारक, मनोहर तथा जाठराग्नि को
प्रदीप्त करने वाला है ॥ १-९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित दधिभेदनिरूपण नामक एकादश प्रकरण समाप्त ॥ ११ ॥
( १ ) आजकल भी यह परम्परा देखी जाती है कि दूकानदार मिट्टी के पुरवे में
अलग-अलग दही जमाकर बेचते हैं। सम्भवतः वही परम्परा आज भी
प्रचलित है । मद्रास में बहुधा अलग-अलग बर्तनों में दही इस प्रकार
बेचा जाता है ।