पाकदर्पण (राजा नल प्रणीत - इन्द्रदेव त्रिपाठी माधुरी हिन्दी व्याख्या सहित)
Pakadarpana of Raja Nala with Madhuri Hindi Commentary
राजा नल (टीकाकार: पं. इन्द्रदेव त्रिपाठी) द्वारा
११० पाकदर्पणम्
जल में थोडी देर रखने के बाद चलाकर पुष्पों को फेक दें । इसके बाद
दूध तथा जलको बराबर मिलाकर दूध के पात्र में बुद्धिमान् पाचक पकावे । प्रमाण
को जानने वाला पाचक त्रिनिष्क (तीन ग्राम) प्रमाण के तीन पात्र लेकर उनमें छोड़
दे और धीरे-धीरे शब्द होने तक पकावे । कलछुल से बारबार अच्छी तरह
चलाकर उसको पकावें । इस प्रकार दो-तीन उत्तम पात्र में जल के जलजाने
तक पकावे । जब कलछुल में लगने लगे तब बुद्धिमान् पाचक उनको उतार
कर तथा उनका मुख बन्द कर मन्दाग्नि पर रख दे । उसके थोड़ा ठण्डा हो
जाने पर उचित मात्रा में शक्कर छोड़ दे । इस उत्तम दूधपाक को थोड़ा गरम-
गरम खाने के लिये दे । यह क्षीर पाक वीर्यवर्द्धक, पित्त-कफ-वात आदि दोष-
नाशक, शरीर एवं बलवर्द्धक, थकावट को दूर करने वाला, स्वादिष्ट एवं बुद्धि
तथा इन्द्रियों के बल को बढ़ानेवाला है ॥ १८ ॥
प्रकारान्तरेण क्षीरपाकनिर्माणविधिर्गुणाश्च
विना जलेन तत् क्षीरं क्षीरभाण्डे नियोजयेत् ॥ १०॥
स्थाल्यां पचेन्मृदावग्नौ दवघट्टनपुरःसरम् ।
अर्धावशिष्टमिति तत् लेह्यमाहुश्च कोविदाः ॥ ११ ॥
षड्भागशेषमिति तत् घटिकां प्रवदन्ति हि ।
ब्रुवन्त्यष्टावशिष्टं तत् शर्केरामिति साधकाः ॥ १२ ॥
चतुर्थजमिदं क्षीरं न्यसेद्भाण्डचतुष्टये ।
सम्यग्विश्राम्य तत्क्षीरं मानविद्भाण्डसंस्थितम् ॥ १३ ॥
तेषु क्षीरेषु मानज्ञाः फलपुष्पाणि निक्षिपेत् ।
पानरूपे पुनः क्षीरे पनसस्य फलं क्षिपेत् ॥ १४ ॥
सारामृतं पुनस्तत्र आर्द्रकस्य क्षिपेत्कणान् ।
जात्यादिकुसुमं तत्र पुनः सूदः प्रवेशयेत् ॥ १५ ॥
भूयो लेह्याह्वये दुग्धे खर्जूरफलमाहरेत् ।
फलस्वेदं पुनस्तत्र निक्षिपेदमृतोपमम् ॥ १६ ॥
न्यसेच्च पक्वं पुन्नागकुसुमं तत्र मानवित् ।
भूयश्च घटिकारूपे क्षीरे चूतफलं क्षिपेत् ॥ १७॥
सर्पिश्श्च माक्षिकं तत्र निक्षिपेत्सर्वरोगजित् ।
कुसुमं सत्फलादीनां न्यसेत्तत्र नवीदनम् ॥ १८ ॥
क्षीरे तु शर्कराकारे कृत्स्नरम्भाफलं न्यसेत् ।
पुनश्च शर्कराखण्डं जिह्वाजाड्यहरं शुभम् ॥ १९ ॥
नलविरचितम् १११
कुसुमं विन्यसेत्तत्र पुन्नागे च समुद्भवम् ।
तेषु क्षीरेषु सर्वेषु निक्षिपेत्केतकीफलम् ॥ २० ॥
कर्पूरमृगनाभ्योश्च कल्कं कुंकुमवर्जितम् ।
सूदस्तं पानरूपेषु क्षीरेषु प्रसवं न्यसेत् ॥ २१ ॥
संत्यज्य तानि पुष्पाणि वेष्टयित्वा प्रदापयेत् ।
अन्य प्रकार के क्षीर पाक बनाने की विधि तथा गुण-बिना जल मिला
भैंस का दूध दूध के पात्र में रक्खे और मन्द आँच से दुग्धपात्र में कलछुल से
चलाते हुए पकावे । यह क्षीर पाक का पहला प्रकार है। जब पकाते-पकाते आधा
रह जाय तब वह विद्वानों के पीने योग्य होता है । आधा भाग अवशेष दूध को
विद्वान् लोग "लेह्य" कहते हैं । षष्ठांश अवशिष्ट दूध को घटिका कहते हैं। इन
चारों प्रकार के दूध को चार पात्र में रख कर मात्रा को जाननेवाला पाचक
पात्र में स्थित दूध को थोड़ी देर तक स्थिर होने दे । पुनः उन चार पात्रों में
स्थित दूध में फल एवं पुष्पादि छोड़े। पुनः सारामृत में अदरक के टुकड़ों को
छोड़े। पुनः उसमें पाचक चमेली आदि का फूल रक्खे । पुनः लेह्य संज्ञक दूध
में खजूर का फल छोड़ दे । पुनः उसमें अमृत स्वरूप फलस्वेद (फल का रस)
को छोड़ दे और पके पुन्नाग (श्वेत कमल) का पुष्प छोड़ दे। पुनः घटिका
रूप दूध में आम का फल छोड़ दे । पुन. उसमें घी तथा सभी रोगों को जीतने
वाला मधु छोड़ दे । पुनः सत्फला (अनार) आदि का पुष्प तथा नवीन चावल
का भात छोड़ दे । शर्करा रूप दूध में पूरे केले फल छोड़ दे । पुनः उसमें खाँड
छोड़ दे । यह अच्छी तरह जिह्वा की जड़ता को दूर करता है। पुनः उसमें
पुन्नाग का पुष्प छोड़ दे और कर्पूर तथा कस्तूरी को भी छोड़ दे किन्तु केशर
को न छोड़े । पाचक पानरूप दूध में प्रसव (फूल-फल) छोड़ दे । सभी प्रकार
के दूधों से पुष्पों को निकाल कर और पूगपट्ट में बाँध कर खाने के लिये दे ।
क्षीरपाकस्य गुणाः
वातपित्तकफजानिदं पयो यस्य कुक्षिगतमात्रमामयान् ॥ २२ ॥
हन्ति सर्वसुरलोकदुर्लभं प्रार्थितं सुरगणैर्वृषमुख्यः ।
इति नलकृतपाकदर्पणे क्षीरपाकनिर्माणनिरूपणं नाम दशमं प्रकरणं समाप्तम् ॥
क्षीरपाक के गुण- यह क्षीरपाक इन्द्रप्रमुख देवगणों के द्वारा प्रार्थित
सभी देवलोक में दुर्लभ जो पेट में जाने मात्र से वातज, पित्तज तथा
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कफज रोगों को नाश करता है। अर्थात् यह क्षीरपाक सभी प्रकार के रोगों को
नष्ट करता है ।। २२३ ।।
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित क्षीरादिपाकनिरूपण नामक दसवाँ प्रकरण समाप्त ।। १० ।।
अथ दधिभेदप्रकरणम्
दधिनिर्माणविधिर्गुणाश्च
अनेकचित्रसंयुक्तः क्षीरभेदश्च दर्शितः ।
दर्श्यते दधिभेदस्तु सुचित्रं विविधं यथा ॥ १ ॥
अर्धावशिष्टधवलं सुपक्वं क्षीरमुत्तमम् ।
सक्षीरखण्डमृद्भाण्डे समादाय शुभे न्यसेत् ॥ २ ॥
सुजातं मातुलुंगस्य फलं स्थूलं समाहरेत् ।
फणाकारसमायुक्तशलाकातीव्रधारया ॥ ३ ॥
वृन्तं मूलं ततस्तस्य किञ्चिच्छित्त्वाऽप्रमाणवित् ।
उद्धरेत्तद्गतान् सर्वान् बीजत्वक्केसरान् बुधः ॥ ४ ॥
एकवारं द्विवारं वा क्षालयेद्वारिणा च तत् ।
कल्केन घनसारादीन् तदन्तं लेपयेद् बुधः ॥ ५ ॥
वासयेद्बहुभिश्चैव जात्यादिकुसुमैः पुनः ।
तत्रत्यानि प्रसूनानि दधिपक्षे समुत्सृजेत् ॥ ६ ॥
ईषदुष्णेन संयुक्तं क्षीरं तत्र समण्डकम् ।
पूरयेन्नवनीतं च किञ्चित्तत्र विनिक्षिपेत् ॥ ७ ॥
छेदेनापूर्य छिन्नेन तन्मुखं छादयेत्सुधीः ।
अनेनैव प्रकारेण दधि कृत्वा प्रदापयेत् ॥ ८ ॥
इदं रुचिकरं पथ्यं सर्वारुचिनिवारणम् ।
बलपुष्टिकरं रम्यं भवेत्कायाग्निदीपनम् ॥ ९ ॥
इति नलकृतपाकदर्पणे दधिभेदनिरूपणं नाम एकादशप्रकरणं समाप्तम् ॥ ११ ॥
दही बनाने की विधि तथा गुण इसके पूर्व क्षीरप्रकरण में दूध के भेद
दर्शाये गये। अब अनेक प्रकार के विचित्र दही के भेद बताये जा रहे हैं। अच्छी
तरह पकाया हुआ अर्धावशिष्ट दूध लेकर उत्तम शक्करयुक्त दूध के पात्र में
रखे । इसके बाद बड़ा बिजौरा नींबू का फल ले आये और उसको फणाकार
तेज धार वाली शलाका से साफ कर ले । उसकी भेटी तथा मूल भाग का प्रमाण
को जानने वाला थोड़ा काट दे। पुनः उसके अन्दर के सभी पदार्थों (बीज केशर
आदि) को निकाल दे और उसको एक बार या दो बार जल से प्रक्षालन कर ले।
इसके बाद कर्पूर आदि के कल्क से उसके अन्दर लेप लगा दे। पुनः चमेली
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आदि अनेक सुगन्धित पुष्पों से सुगन्धित कर ले । उसमें के सभी पुष्पों को
दही में छोड़ दे । तदनन्तर उसमें माण्ड सहित थोड़ा गरम दूध १ भर दे और
थोड़ा मक्खन छोड़ दे इस के बाद कटे नींबू के टुकड़े से उसका मुख ढक दे । इस
प्रकार दही बना कर खाने के लिये दे । यह दही रुचिकारक, पथ्य, सभी प्रकार
के अरुचियों को दूर करने वाला बल एवं पुष्टिकारक, मनोहर तथा जाठराग्नि को
प्रदीप्त करने वाला है ॥ १-९ ॥
इति नलकृत पाकदर्पण का डा० इन्द्रदेव त्रिपाठीकृत माधुरी हिन्दी व्याख्या
सहित दधिभेदनिरूपण नामक एकादश प्रकरण समाप्त ॥ ११ ॥
( १ ) आजकल भी यह परम्परा देखी जाती है कि दूकानदार मिट्टी के पुरवे में
अलग-अलग दही जमाकर बेचते हैं। सम्भवतः वही परम्परा आज भी
प्रचलित है । मद्रास में बहुधा अलग-अलग बर्तनों में दही इस प्रकार
बेचा जाता है ।