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पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)

Padmavat with Hindi Commentary

मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा

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पृष्ठ 238

| पद्मावत । २३७
हनुमतसरसें भारें जें कांधा । राघवँ सम समुंद्र जें बांधा ॥
बिक्रमें सरस कीन्ह जें शाका । सिंहलदीप लीन्ह जो ताका॥
जो अस लिखा भयो नहिं ओछा । जियत सिंहकी गहि को मोछा॥
दो० द्रब्यलेइ तो मानौं, सेवक करौं गहि पांव ।
चाहै नारी पद्मिनी, सिंहलदीपहि जांव ॥
बोलन राजा आप जनौई । लीन्ह उदयगिरि और छितौई ॥
सप्तद्बीपे राजा शिर नावहिं । सेना चली पद्मिनी आवहिं ॥
जाकर सेव करै संसारा । सिंहलदीप लेत कित बारा ॥
जनि जाने सियह गांढ़ तोपाहीं । ताकर सबै तोर कुछ नाहीं ॥
जेहि दिन आय गढ़ीको छैकी । सरबसै लेइ हाथ को टेकी ॥
शीशें भार खेहैं के लागे । सो शिरफार होय दुख आगे ॥
सेवाकर जु जियन तोहिं भाई । नाहित फेर माखें होय जाई ॥
दो० जाकर जीव दीन्ह पै, अगमर्न शीशँ जोहारि ।
तेहि करेंगे सब जानै, काह पुरुष का नारि ॥
तुरुकें जायकहि मरै न धाई । हो ये इसकन्दरँ की नाई ॥
सुन अमृत कजैलिवन धावा । हाथ न चढ़ा रहा पछतावा ॥
औ तेहि दीप पतंगें होय परा । अगनी भाड़ पांव दै जरा ॥
धर्ती लोह स्वर्ग भा तांबा । जीवदीन्ह पहुँचत करै लांबा ॥
यह चितौरगढ़ सोइ पहारू । मूरै उठै होय दहक अँगारू ॥
जैबर इसकन्दरें सरकीन्हीं । समुद्र लियो धसजसवेलीन्हीं ॥
: बराबर १ बोझ २ श्रीरामचन्द्रजी ३ राजा विक्रमादित्य ४ अपनी ता-
रीफ़ ५ नाममुल्क ६-७ सातों मुल्क ८ फ़ौज ९ क़िलाको घेरे १० सब
११ रोकना १२ शिर १३-१७ धूल १४ गुस्सांदिली १५ पहिले १६ किया
हुआ १८ बादशाह १६ नाम बादशाह २० जहां अमृत है २१ पांखी २२
आसमान २३ हाथ २४ सूर्य २५ जैसे सिकन्दर ने दुःख पाया २६ ॥