पद्मावत (मलिक मोहम्मद जायसी - सटीक ऐतिहासिक महाकाव्य)
Padmavat with Hindi Commentary
मलिक मोहम्मद जायसी / पं. रामचन्द्र शुक्ल द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें[Page Header]
पद्मावत । २१३
हौं वह सों वह मोसों राताँ । तिमिरैं बिलाय होत परभाताँ ॥
कमल के हिरदर्ये महँ जोगटा । हरियरै हार कीन्ह का घटा ॥
जाकर दिवसँ तेही पै आवा । कार रयैनि कित देखै पावा ॥
तुइउडुम्बर जेहि भीतर माँखी । चाहहिं उठहिं मरनकी पाँखी ॥
दो० धूप न देखी बिषभरी, अमृत सो सर पाव ।
जेहि नागिन डस सोमरे, लहर सूर्य्यकी आव ॥
फूलहिं कमल भानु के उये । पानी मैल होय जड़ छुये ॥
फिरहिं भँवर जिम तो नयनाहाँ । नील बिषायँध सब तो पाहाँ ॥
मच्छ कच्छ दादुर तोहिं आंसा । बकें औ पंख बसहिं तोहिं पासा ॥
जे जे पंख बास तोहिं लये । पानी महँ सो बिषायँध भये ॥
जो उजियार चांद होय उई । बदनैं कलंक डोम लै छुई ॥
औ मोहिं तोहिं निशिँ दिनकर बीचू । राहुके हाथ चांद की मीचूँ ॥
सहसँ बार जो धोवै कोई । तौहू बिषायँध जाय न धोई ॥
दो० काह कहूं वह पियसों, मोहिं शिर धरेसि अँगार ।
तेहि के खेल भरोसें, तू जीती मैं हार ॥
तोर अकेल का जीत्यौं हारू । मैं जीता जग केर शँगारू ॥
बदन जित्यों जो शशि उजियारी । बेनी जित्यों भुवंगिनिकारी ॥
औ मैं जीते मृग के नैना । कण्ठ जित्यों कोकिल के बैना ॥
भौंह जित्यों अर्जुन धनुकारी । ग्रीवैं जित्यों तमचोर पुछारी ॥
नासिका जित्यों पुहुप तिल सुवा । शूकै जित्यों बेसर होय उवा ॥
[Footnotes]
१ खुश १ अँधियारी २ भोरे ३ दिल ४ हरे कमलगट्टा का हार पहिने से
क्या नुक़सान ५ दिन ६ रात ७-१४ गूलर ८ सूर्य्य ६ हिलाने से पानी
मैला होता १० मेढक ११ बगुला १२ चांद में सियाही १३ मौत १५
हज़ार १६ चांद १७ नागिन १८ गर्दन १६ मुर्ग-मोर २० नाक २१ फूल २२
नाम नक्षत्र २३ ॥