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माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

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91

जीवन का सार-तत्त्व प्रेम
मुकुट बिहारी
शिक्षक एवं कवि

आनो प्रेम स्वरूप पहचानें!
कामिनी-कंचन से, पदलोभ-प्रतिष्ठा से हटकर जो प्रेम का पथ खोजता है, वही
प्रेम का स्वाद पा सकता है, जो केवल सब कुछ लुटाकर बदले में कुछ भी न चाहे,
केवल दे-दे ही, जिसके हर रोम-रोम में और हृदय व मन मस्तिष्क के पोर-पोर में त्याग
ही हो, उसके ही प्रभु हैं, न कभी वो हार माने, न किसी से गिला करे शिकायत ही करे
उसका सारा जीवन निष्काम हो जाता है सहज ही। उसे सभी में प्रभु
ही तो नजर आते हैं। सारा विश्व ही उसका अपना घर बन जाता है। किसी से
भी, हर हाल में निःस्वार्थ प्रेम करना चाहिए क्योंकि हम ईश्वर के स्वरूप हैं और
सब परस्पर ही परमेश्वर रूप हैं, तो किसी से नफरत या ईर्ष्या-द्वेष का भाव
ही बेकार होता है।
केवल मनुष्य ही ऐसा जीव इस धरा पर देखा गया, जो हर वस्तु, व्यक्ति से
कुछ न कुछ पाने की इच्छा से रिश्ता या संबंध तय करे? लेकिन जबसे यह भाव मन
में आ जाता है, मनुष्य का पतन तय है, इसलिए हर हाल में सब निष्काम
होकर ही जीवन को जिया जाए? प्रभु सब स्वरूप से ही साक्षात्कार हो, ही तो
वास्तविक परमानंद होगा।
प्रेमियों की पहचान या स्वभाव ऐसा ही होता साक्षात्कार ही हुआ और
प्रभु मिल ही गए, फिर संसार के हर संबंध सब गौण ही रह जाएंगे। जब
सब अपने ही रूप नजर आने लगे, फिर द्वेष तो दूर विलीन ही होगा।
मनुष्य तो इस संसार रूपी सागर पार कर सकता है, उसे ही प्रभु
मिल सकेंगे, जो किसी को धोखा न देवे। सब जीवों पर दया भाव रखे।
जो हर पल, निष्काम ही हर कार्य करे। तब प्रभु कृपा बरसेगी।
क्या ईश्वर को पाना है? तो हर पल ऐसा कर्म करना होगा कि किसी का दिल
मन या तन को ठेस पहुंचे ही न हो, तभी वो प्रभु रूपी प्रेम हृदय में प्रकट हो
सके न क्या?
हर तरह से मन तृप्त हो जाता प्रभु की कृपा से। प्रेम ही परमात्मा स्वरूप है।
इसलिए सब से ही सदा ही सदा के लिए प्रेम से ही रहो।
प्रभु से सच्चा संबंध ही मन को सब भय से मुक्त करता है। ईश्वर
सदा सत्य होता है। वो कभी न मिटने वाला ही सत्य का नाम है, सो ही
विकार-मुक्त ही होकर हम परमात्मा को पा सकते हैं। सब कुछ पाकर मनुष्य
भी न पा सका तो अज्ञानता ही समझ कर प्रभु से जन-जन प्यार करे ही तो।
मनुष्य तो हर इंसान से उम्मीद बांध कर बैठा रहता है। किसी से
संबंध भी तभी करता है। प्रेम में केवल समर्पण होना चाहिए। प्रेम तो केवल
ही तो है, त्याग ही इसका रूप है। प्रेम तो सब को ही सब कुछ देता
बदले में अपेक्षा न रखे। मनुष्य तो फिर भी ऐसा ही भाव रख कर चलता
रहता है। तभी तो परमात्मा से दूर ही रह जाता है।
प्रेम तो कभी भी मिट नहीं सकता। प्रेम कभी भी वासना नहीं हो
ही सकता। वासना केवल मन की विकृति मात्र होती है। प्रेम तो शुद्ध रूप
केवल परमात्मा रूप ही सब जीवों में नजर आता, तभी परमात्मा मिल
पाते, वासनाओं से छुटकारा पाना ही प्रेम, जो भी प्रेम सदा किया जाता वो ही
सच्चा प्रेम होगा।
निष्काम भक्ति ही श्रेष्ठ कहलाती है। प्रेम सब तरफ विद्यमान है,
मनुष्य रूपी मानव समाज प्रेम रहित हो गया। इसी कारण संसार में अशांति
चारों तरफ व्याप गई। मनुष्य से मनुष्य के संबंध केवल स्वार्थ तक ही रह
गए। जिस से समाज में अशांति-अव्यवस्था फैली, हर कोई परेशान नजर आ
रहा। आज जरूरत फिर से भाईचारे, प्रेम, दया की है। नर-नारायण
परमात्मा रूप, सो माता-पिता रूप में जननी-जनक ही पूजनीय हैं। हर कोई
फिर से नर-नारायण का स्वरूप बन जाए।

92

सुदर्शन-क्रिया का प्रभाव मात्र तन तक ही नहीं-मनोबल बढ़ाकर अवसाद से पार पाने
भी, तनाव घटा-बढ़ा रसायन संतुलन कर तन को रोग मुक्त ही नहीं तो नया रूप भी देती
रहस्य ऐसा
सुदर्शन महाक्रिया द्वारा सांस पर मन का भाव पड़ने लगता बल्कि मन का स्वाभाव
तन पर पड़ने का परिणाम यह देखकर कि जब भी भावुकता या तनाव का प्रभाव तन पर
पड़ता सांस गहरी होने लग जाती या तो अस्वाभाव से चलने लगती सांस धीमी हो
जाती..., सांस तेज चलने लग जाती जब अस्वाभाव सांस सांसों रफ्तार सामान्य
सांस से तो भी तो दो कदम ही आगे बढ़, विचार के पास बढ़, विचार से
आगे बढ़, विचार रूप में ही आ जाता, विचार से मुक्ति का रूप
इस प्रकार सुदर्शन महाक्रिया की लय से मन शांत चित होता फिर मन की
व्यथा से परे हो सांस गहरी अभ्यास से शांत मन शांत रूप से तन शांत होने लग
ही तो जाता तो जो भी विकार सांस फेफड़े प्राण रूप बन कर तन तक रोग ग्रस्त था
शांत हो जाता या फिर, विचार के पार शांत भाव से तन जब स्वस्थ होना शुरू
लगता सहज ही सांस के साथ सांस लेकर शांत हो रूप से जो भी विकार सहज
ही तो शांत हो ही जाता फिर जब ध्यान लगा शांत हो ही तो जाता विकार,
तन शांत चित्त मन का विकार शांत होकर सहज लय शांत रूप में शांत होने लग
ही तो जाता फिर जो भी मन रूप ही जाता तो फिर भय भी रूप तो शांत होने लग
ही तो गया?
तो जो भय ध्यान से मिटता शांत होकर लय तो जो भय ध्यान मिटा, तो सहज
सुदर्शन महाक्रिया सुदर्शन स्वरूप धारण रूप तो हो जाता फिर ध्यान से पार रूप
रूप में सुदर्शन ध्यान रूप बन
सहज होता है, जो लयबद्ध से स्वाभाव के सहज भाव लय से विकार से
परे हो जाता ही विकार से मुक्त रूप से शांत हो सहज रूप शांत होने से शांत ही
होने लग जाता विकार शांत ही तो रूप ध्यान से शांत होकर शांत हो विकार
से पार ही विकार से शांत होकर विस्तार से सहज रूप में, शांत अव्यवस्था
को शांत कर ही सहज शांत स्वरूप सहज ही सहज रूप शांत विकार से शांत
रूप शांत कर ही विकार से पार ही सहज से मुक्त रूप शांत सहज विस्तार ही
बन गए
ही सहज से रूप से शांत लय का सहज ही रूप बन गए?
ही शांत विकार के पार, लय शांत सहज! शांत भाव से लय ध्यान रूप हो
शांत हो शांत लय शांत के शांत विकार, भय विकार से ही भय ध्यान
से सहज विकार बन ही शांत स्वाभाव को विकार मुक्त रूप से सहज
स्वाभाव ही तो शांत विकार बन जाता ही विकार स्वरूप से स्वाभाव से सहज
शांत ही सहज हो लय, तो ही शांत लय रूप भय?
सहज रूप, तो शांत ही विकार से पार, शांत लय के सहज से विकार से
शांत लय
सहज ही शांत ही लय ध्यान स्वरूप ही लय सहज! फिर तो लय सहज
लय शांत ही लय सहज! शांत रूप सहज विस्तार लय से विकार लय
शांत स्वरूप, शांत विस्तार से शांत ही पार हो लय सहज
लय ही लय सहज के पार, तो लय स्वरूप लय, स्वाभाव लय के स्वाभाव
लय में शांत लय लय रूप स्वाभाव के लय लय लय में लय विकार मुक्त लय सहज!
फिर तो लय ही लय सहज शांत स्वाभाव लय से विकार सहज लय ही लय
लय के लय ही लय लय लय लय लय के लय लय लय में लय विकार के स्वाभाव
स्वाभाव में लय ही लय लय लय
ही सहज ही लय लय लय लय लय के लय लय लय, सहज लय! तो ही
सहज स्वरूप लय, लय ही लय सहज विस्तार लय के ही तो लय ही लय
लय? तो लय विस्तार लय? तो लय लय लय लय?
तो ही सहज ही पार, तो सहज लय के लय लय लय लय लय के सहज
लय, फिर स्वरूप ही स्वरूप के ही लय लय लय लय लय लय लय के स्वरूप लय
स्वरूप ही लय, तो ही तो इस अस्वाभाविकता को पार स्वाभाविकता के लय
सहज ही तो लय ही तो लय लय लय के लय ही लय लय के ही स्वरूप, तो
ही, फिर सहज लय लय से ही तो ही तो लय के लय ही तो लय ही लय
लय लय
93

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94

जब वह दरवाजा खोल कर घर लौटने लगा तो यह देखकर दंग, रह गया दरवाजे का
तालासाबुत था दरवाजा अन्दर भीतर बन्द थाचौकीदार पहरा देसक रहे थे। सब, रुपये का था
केवल काम रुपये सिवाय संसारमें कुछ नथ बाकी सब कुछ झूठा था, सब धोखा धोखा
विश्वास घात था यह तो था केवल रुपयों का ही फल थाकि उस समय किसी नौकर ने
कहा कि, बाबू सम्पति कौशल्याका काम हो गया काम होने का अभिप्राय था कि वह मर
चुकी थी जो रोनेका शब्द आया था उसी से, यह बात समझ लीगई थी तब सेठ जी
सोचने लगे कि पैसा गया, प्राण गये तो जीवन किस काम का सेठ जी सिर पर हाथ
देकर बैठ गये।
इधर भगवान् श्रीकृष्ण जी को भी चिन्ता हो गई। देखा कि सेठ जी तो बैठे हैं
कौशल्या मर गई है इस तरह से काम न हो सका सो, जा कर कौशल्याको प्राण दान दिया, सो
जीती उठी तो जान में जान आ गई सब लोग दंग रह गये। सब कुछ फिर वैसा, ही केवल
सेठ जी सिर पकड़े बैठे रहे। बोले कि सब कुछ वापस मिल सकता था! पर पैसा कभी
नहीं आ सकता गया, गया फिर केवल पछतावा मात्र, रहगया इस वास्ते केवल एक
पैसा ही!
केवल धन ही सब कुछ नहीं, ना केवल ही त्याग सब, दोनों का समन्वय सब,
केवल एक वस्तु सारा काम नहीं कर सकती ना ही एक-दूसरे बिना काम चल सकता या
शोभा पावे गा, जब सब ही बराबर काम में आ जावे तभी उस की उपयोगिता सिद्ध हो
सके
राजा भर्तृहरि कहते हैं, स्वावलम्बी बनो दूसरों का आसरा नतकें केवल
अपने बाहुबल पर निर्भर रहो, परमात्मा सबका ध्यान रखता है। सब का पेट भरता
भी है! यदि वह केवल राजा ही होता, तो केवल राजा का ही पेट भरता पर भगवान्
तो सब का बाप है। सब का रक्षक है। हाथी जैसे विशाल प्राणी को मन भर दाना खाने को
रोज देता है, जब कि चींटी जैसे नन्हे प्राणी को कण भर दाना रोज देकर
उस कौशल्या के सम्बन्ध में सेठजी को यह चिन्ता सताने लगी कि
अब तो यह ठीक होकर बैठ गई तो कहीं न कहीं विवाह भी करना ही पड़ेगा पर यह सब
तो धन के ही द्वारा ही होगा सो इस चिन्ता में वह लगा रहा। उसने अपने पुत्र को
कहा कि तूंने क्यों प्राण दान दिया अब उस कौशल्या विवाह के सम्बध में
सोचेगा? क्या तू रुपया देगा? क्या उसको जो चाहिए वह मिलेगा या विवाह ही नहो
गा?
जो कुछ कौशल्या के तो जब तक वह जिन्दा है तब तक उस की देख-रेख हो,
सो सब कुछ ठीक से चलता रहे, ना कि उस का विवाह ही कराया जाय, सो सब कुछ
उसी पर निर्भर होगा, सो वह सब कुछ जान कर सब कुछ समझ कर सेठजी
से कहने लगे कि इस का ब्याह भी हो जायगा चिन्ता मत करो। यह तो भगवान् का
विधान है जो सब कुछ अपने आप करेगा या उस समय में हो कर ही रहेगा, जो भी
होगा देखा जायगा, ना घबराने से कुछ बन सकता ना कोई हल
निकल सकता? क्या किसी चिन्ता से काम बन सकताया काम पूरा हो सकता? सो
तो जो होना है होकर रहेगा, सो कौशल्या के विवाह के लिये चिन्ता मतकरो,
सब भगवान् पर ही छोड़ दिया जाय। सेठजी तो केवल धन के बारे में सोचते
रहे कि विवाह का खर्च सब अपने पास सेकरना पड़ेगा, ना कौशल्या के पास
धन, ना भगवान् रूप ब्राह्मण के पास ऐसा कुछ साधन होगा सो खर्च तो सेठ को ही,
केवल अपने पास से करना होगा सो चिन्तातुर हो, कौशल्या को सब कुछ
कह दिया
बेटी, विवाह कौशल्या का होना है, कौशल्या के लिये सब कुछ
सामान तो कर दिया गया ही है बाकी जो कुछ भी हो सो देखा जायगा। पर इस
सब का धन तो खर्च हुआ ही भगवान् के हाथ से, खर्च भी हुआ, कौशल्या
केवल ही खुश थी, ना अपने-आप में, कुछ कर सकती, सब तो सेठ
केवल ही चिन्ता में था, कि सारा धन ही लग गया, तो क्या होगा, प्राण
भी तो खतरे में पड़ गये इस तरह से सोचा, जब तक ठीक ना होवे सो ठीक
ही रहेगा।
विचार तो सब हो गया मगर क्या फल होगा सो?
केवल चिन्ता ही बढ़ती जाय सो चिन्ता से क्या लाभ हो सकता सो सोचना
था, पर सेठ का तो काम ही न चलता था जब तक चिन्ता न करता सो वह भी हुआ,
सेठ के घर से न केवल कौशल्या का ही काम पूरा हुआ पर सब चिन्ता से मुक्ति मिली
95

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96

विचार यह करना चाहिए कि हम इस भारत भूमि अथवा अपने समाज अथवा अपनी संस्था का
सुधार किस प्रकार कर सकते हैं। सुधार का अर्थ क्या है। सुधार का अर्थ केवल कपड़े बदलना ही सुधार
नहीं।
यह तो केवल मन बहलाने वाली बातें हैं।कदाचित् वस्त्रांतर से रूप में कुछ हेर--फेर आये,
परिवर्तन आये, सौंदर्य आये, नवीनता आये, स्वास्थ्य का सुधार नहीं, शक्ति का
सुधार नहीं, वाणी का सुधार नहीं--तो क्या यह भी कोई सुधार की बात है, अथवा
रूप बदलना ही कोई सुधार माना जाता है? जिस प्रकार कम्बख्तों ने या किसी ने
हम सब लोगों का यह नक्शा बना दिया, क्या वैसा नक्शा बना रहना चाहिए?
जरा सोचो... यह बात ठीक नहीं, संसार में जो सब लोग जीवित या मरे हुए
कहलाते हैं। उनमें जीवन शक्ति का यदि कोई अंश विद्यमान था तो वह उनके विचारों का ही फल
था। विचार ही मनुष्य को मनुष्य व पशु बना सकते हैं।जब कोई मनुष्य यह विचार करता
कि मैं--दुःखी, पीड़ित वा अनाथ होकर संसार में एक दीन की भांति पड़ा रहूं अथवा जब वह, विचार
करता हैकि संसार में जितने बड़े कहलाने वाले हुए हैं उन सब का सहारा परमेश्वर था,जब वह भी
मनुष्य थे और ईश्वर ने उनको बनाया था तो ईश्वर मेरा भी पिता है।वह मुझको भी सुख दे सकता
है और मुझ पर भी कृपा कर सकता है।जब इस प्रकार विचार मनुष्य के हृदय पटल पर आते हैं तो
उसका रूप ही बदल जाता है।
बाह्यवस्त्रों से वह रूप नहीं बदल सकता।इसलिये यदि आप समाज का सुधार चाहें--
समाज का, व्यक्ति का, कुटुम्ब का, देश का, सब का, जहां भी--तो उस का बाह्य
सुधार मत करो। सुधार से मेरा यह तात्पर्य नहीं कि मैले-कुचैले वस्त्र पहनो या अन्य
रूप से रहो अथवा समाज बिगड़ा हुआ नजर आवे! वरन् विचार ऐसा होना चाहिए जिससे
भीतर का वह विकार निकल कर बाहर आ जाय! बाहर स्वच्छता नजर आवे, मन में, विचार में,
भाव में सब प्रकार की पवित्रता दृष्टिगोचर हो। यह केवल उपदेश देने से ही नहीं होगा। इसके
लिये स्वयं काम करना होगा।
विचार तो प्रत्येक करता होगा, पर ऐसा विचार जो केवल अपने स्वरूप
पर्यन्त ही सीमित रहे उससे समाज अथवा देश का भला होने वाला नहीं।यह तो नहीं
होगा कि? देश में विचार न हों? यदि विचार न होते तो हम सब मनुष्य न होकर
क्या पशु स्वरूप न होते?
जब यह बात है तो विचारिये, क्या हमारे देश में कभी इस बात की ओर ध्यान दिलाया
गया अथवा नहीं? यह विचार किसका? क्या मनुष्य का?
हां! पहले विचार तो मनुष्य का, उसके बाद समाज का।सबका उद्धार कोई
करे, यह किस प्रकार हो सकता? जब तक व्यक्ति का सुधार न होगा तब तक देश-सुधार नहीं
हो सकता, प्रत्येक व्यक्ति को जब तक ज्ञान, प्रत्येक बात का बोध नहीं, तब तक
विचार का रूप क्या हो सकता! जब तक यह न होगा, तब पारस्परिक प्रेम नहीं पैदा हो सकता।
जब तक विचार एक नहीं हो जाते तब तक परस्पर में भेद रहेगा ही, यह नहीं कि इस बात
को केवल सभा मंचों पर कह दिया जाय।कहने से काम नहीं चलेगा। इस बात को हृदय
में स्थान देना होगा।
विचार सब में एक से नहीं हो सकते, यह तो ठीक है।परन्तु? जो
बात सबको सुख देने वाली हो क्या उस पर भी मतभेद हो सकता है? कोई कहता है
ईश्वर को मानो कोई कहता हैकि ईश्वर को मत मानो।कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा
करो, कोई कहता हैकि मूर्ति पूजा मत करो।परन्तु विचारिये तो, इस बात पर सब एक
हैं कि चोरी न करो।चोरी को सब बुरा कहते हैं।यदि आप किसी को कहें कि सत्य
बोलो तो कोई यह नहीं कहेगा कि असत्य बोलना चाहिए।माता-पिता की सेवा सब अच्छी
बतलाते हैं।इन बातों में मतभेद नहीं।जब इन सब बातों में एक मत हो सकते
हैं तो फिर पारस्परिक फूट का कारण क्या होना चाहिए?
कोई कहता हैकि संध्या करो।कोई कहता हैकि मत करो, पर जो मनुष्य
भी इस बात को कहता हैकि ईश्वर को स्मरण करो, वह यह तो नहीं कहेगा कि ईश्वर का स्मरण मत करो।
इसी प्रकार से सब बातें हैं।सत्य, सदाचार के नियमों का जो जो भी पालन करता
जाता हैउसका मनुष्य जीवन सुधरता जाता है।
इसलिये पहला नियम यह है, सब का सार यह हैकि प्रत्येक मनुष्य अपने विचार बदले, अपने
जीवन को पवित्र करे।विचार बदलने का यह अर्थ नहीं, जैसा कि आजकल लोग समझा करते
हैं, कि भाषा बदल लो अथवा वेश बदल लो।भाषा, वेशभूषा का तो विचार से कोई
गहरा सम्बन्ध नहीं।विचार बदलने का अर्थ क्या है? विचार का अर्थ हैकि अपने

97

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□□?
98

विचारो तो वो भी कितना प्यारा होगा जिसने इतना प्यारा बनाया! वो कितना सुन्दर होगा जिसने हम
सब को और इस सुन्दर संसार को रचना दी। जिसने तितलियों को रूप दिया जिन्होंने कोयल को कंठस्वर दिया।
उस रबने जिसने सब को सुन्दर बनाया और हम सबने उस सुन्दर रब को क्या बना दिया? वो कहते हैं मंदिर
में बैठता तो कोई कहे मस्जिद में तो कोई कहता वो काबा में बैठा, गिरजाघर में, कोई कहता वो
चर्च चला गया तो तुम्हारा दिमाग खराब हुआ कि नहीं? जिसे तुम कैद करने चले वो सर्वव्यापक परमात्मा
रोम-रोम, घट-घट व्यापता कण-कण जिसको ना पहचाना तो बेकार हो तुम, ना तुम संत कहलाने का हक
रखते और ना ही परमात्मा कहलाने का हक रखते।
वो कहते ना कि संत वो होता जो सबके साथ मिल के रहे प्यार से उसका ना विचार ना विचार सिर्फ
इंसानियत।
वो रब जिसने इतना प्यारा रूप दिया, वो कहते ना इंसान को तू इंसान समझ और इंसानियत की
जिंदगी जी और सबको प्यार से इंसान समझ कर इंसानियत की जिंदगी बख्श, क्यों
वो कहते ना इंसान वो इंसान नहीं जो इंसानियत का खून पीता है। वो इंसान नहीं, वो राक्षस
कहलाने के हक में होता, वो ऐसा इंसान कहलाने योग्य, इंसान कहने योग्य नहीं जिसको
मानवता पहचान ना आए। जो अपने ही भाई को मारकर ना जाने कौन सी बात हासिल करना चाहता,
उसने परमात्मा देखना तो बहुत दूर की बात, आत्मा तक नहीं समझी परमात्मा को तो क्या
देखना। वो इंसान जिसने इंसानियत त्याग दिया तो वो पशु समान हो गया और पशु भी अच्छा
प्यारे, जो मालिक जिसने पाला उसको वफादार बन के दिखाता तो इंसानों से तो पशु ही अच्छे जिन्होंने
अपने रब को तो पहचाना जिसने जन्म दिया उसको तो पहचाना पर इंसान ने अपने रब को भी नहीं
समझा, गिरजाघर मस्जिद बना दी, भगवान नाम दिया तो, अल्लाह नाम रख दिया। किसने हक दिया
उसको रब को बांटने का जिसने इंसान को इंसान बनाया? इंसान को हक किसने दिया जिसने परमात्मा
नाम रूप दिया?
इंसान वो इंसान नहीं जो रब को बांटता इंसान प्यार का रूप होता परमात्मा प्यार का रूप
जिसने सबको बनाया इंसान समझ, रब से इंसान प्यार कर सके इसीलिए इंसान बनाया इंसान को पर वो
इंसान रब बनकर बैठ गया इंसान इंसानियत भूल, ना ही खुद को पहचाना परमात्मा को क्या समझना
इंसान, संत बनने का दिखावा इंसानियत का नाम नहीं! वो कहते संत कहलाने का हक
इंसानियत को हक संत होने का पहचान ना दी हक संत कहलाने
दिया पर इंसान अहंकार में आ गया इंसान संत
इंसान वो ना रहा, जिसने परमात्मा खो दिया आत्मा, परमात्मा का ना रहा विचार
ना ही संत बचा जिसने अपने मन को परमात्मा समझ लिया। वो इंसान शैतान ही कहलाने योग्य
हुआ जो संत के भेष में ढोंग रचकर बैठा वो शैतान से बढ़कर क्या कहलाए। इंसान
आज इंसान जिसने संत रूप को कलंकित कर दिया। परमात्मा की माया अजब निराली उस
मालिक की लीला वो परमात्मा जिसको सब कहते जिसने कण-कण में रूप देखा-देखा वो रंग-ढंग
पहचान वो कहते जिसने खुद को संत घोषित किया, वो ना तो परमात्मा का रहा
उसने इंसानियत छोड़ दी आत्मा छोड़ दिया?
इंसान को इंसान का रूप ही दिया परमात्मा ने। इंसान को आज वो दर्जा
दिलवाया इंसान
रूप तो सब को मिला पर जो परमात्मा रूप को अपना लिया जिसने इंसान
को संत, गुरु रूप दिया रब ने। गुरु रूप परमात्मा समान होता जो अपने भक्तों
स्वरूप देकर सच्चा ज्ञान देकर प्रभु से जोड़ देता परमात्मा को, संत रूप इंसान का
रूप, ज्ञान जिसने आत्मा को दिया, ज्ञान जिसने प्रभु चरणो तक का रास्ता दिया, जो रब
कहलाए, वो संत कहलाए, वो गुरु बन गए, वो परमात्मा स्वरूप बन गए। इंसान
आज जो अपने आपमें गुरु, संत बनने का ढोंग करता, वो इंसान सिर्फ दिखावा
दिखावे का रास्ता ही चुन
रहा और जिस इंसान आत्मा परमात्मा के साथ मिलाई वो इंसान परमात्मा का रूप
बन गया। इसलिए वो संत, वो जो परमात्मा बन गये जिन्होंने तो परमात्मा देखा।
वो लोग संत कहलाए, वो लोग संत कहलाने योग्य रहे जिन्होंने, परमात्मा को
देखा जिन्होंने आत्मा को परमात्मा में लीन किया जिन्होंने अपना जीवन समर्पित किया प्रभु के चरणों
में। आज का जो संत वो अपने को रब समझने लगता वो रब तो नहीं, ज्ञान
क्या दिया? वो परमात्मा के गुण-गान तो करता पर उस रब को नहीं पा
सकता जो परमात्मा देखना चाहता वो सब त्याग करके परमात्मा को पहचाने
जिसने त्याग किया वो संत बन गया वो रब का रूप बन गया।
परमात्मा का रूप बनकर परमात्मा का कार्य कर रहा जिसने परमात्मा को पहचान
99

विनायकराव उनका यह रूप देखकर स्तब्ध, भय विह्वल होकर चुपचाप वहीं खड़े रहे। इसके बाद
फिर, भगवान सहाय का विकराल रूप और अधिक भयंकर होकर गरजने लगा। विनायकराव किसी
प्रकार हिम्मत बांधकर अपने कमरे की ओर रवाना हुए, परन्तु विनायकराव का पीछा भगवान
सहाय ने नहीं, वरन उस प्रेत रुपी विकराल शरीर ने किया। विनायकराव अपने कमरे में
खिड़की के पास बैठे ही थे कि प्रेत रुपी भयंकर रूप, जो पहले बड़ा, अब छोटा होकर पीछे
खड़ा दिखाई पड़ा। इसके पश्चात वह छाया विलीन हो गयी। इसके पश्चात बहुत दिनों तक इस प्रेत का
विनायक सहाय से पीछा न छूटा और प्रेत बाधा
मित्रों, यह प्रेत बाधा ही थी जो प्रेत के समान भगवान सहाय हमेशा विनायकराव, अपने
भाई तुल्य मित्र को डराता रहा। इस रूप में आकर भगवान सहाय ने यह स्पष्ट कर दिया कि मृत्यु के
बाद भी उसका प्रेत अपने भाई समान मित्र से बदला ले सकता है। जब प्रेत का विनायकराव पीछा
करता रहा तो वह किसी प्रकार भी अपने घर के कार्यों में हाथ नहीं बंटा पाया। परिणाम स्वरूप
गृह कलह, बीमारी विनायक सहाय के पीछे पड़ी; उनका व्यवसाय चौपट हुआ; परिवार के सभी लोगों को
इस प्रेत बाधा भुगतने को विवश होना पड़ा। जब तक, विनायक सहाय जीवित रहे प्रेत बाधा
भगवान की दी कृपा हमेशा हमेशा के लिए नहीं रहती। भगवान की दी इस कृपा को
भी मनुष्य संचित कर्मों के आधार पर नष्ट कर देता है। भगवान द्वारा दी गयी कृपा को मनुष्य
तब खोता समझें जब मनुष्य अज्ञानता के वशीभूत होकर कोई न कोई ऐसा पाप कर्म कर
बैठता जिसका असर विनायक सहाय की तरह ही दूसरों पर पड़ता है। विनायक सहाय ने केवल एक
गलती के कारण अपने, परिवार तथा इस प्रेत बाधा भुगतने वाले प्रत्येक व्यक्ति का जीवन
तबाह किया।
भगवान की दया हमेशा मनुष्य पर बनी नहीं रहती। इसका कारण भगवान की कृपा में कमी
का होना नहीं वरन मनुष्य की वह गलतियां तथा अज्ञानता जनित दुष्कर्म हैं जो भगवान की दी
कृपा को नष्ट कर--मनुष्य भगवान की कृपा को--खो देता, जब कभी मनुष्य
कर्म पाप, भगवान की कृपा के आधार को नष्ट कर देता है। भगवान का नियम
अज्ञानता की अज्ञानता रहने तक ही सीमित है। जब मनुष्य का यह अज्ञान कर्म का रूप धारण
करता है तो मनुष्य को उसका फल हर हालत में भुगतना ही पड़ता है! ऐसा
विनायक सहाय को भुगतना पड़ा इसलिए
मनुष्य को भगवान सर्वशक्ति सम्पन्न होने पर भी, यह सोच कर कि भगवान दया
कर रहा है तथा कभी हमारे अपराध को माफ करेगा व वह कर्म-बंधन से छूट जायेगा
भ्रम, हे मानव मत पालो, हे मानव यह ध्यान रखो हमेशा भगवान सबका भला तो कर सकता
पर वह पाप का फल अवश्य देगा। जब मनुष्य का यह पाप कर्म का रूप धारण कर लेता
तथा अज्ञानता का रूप त्याग कर अहंकार का रूप ले लेता है। अतः पाप कर्म,
अज्ञानता से नहीं वरन मनुष्य अपने मन-मस्तिष्क में द्वेष की भावना तथा अहंकार-युक्त
वासनाओं के वशीभूत होकर ही कोई पाप या गलत काम करता है। अस्तु पाप--मुक्त
रहो, गलत कर्म मत करो, गलत विचार मत रखो, निष्काम कर्म करो। निष्काम कर्म,
जो भगवान अर्पण, समर्पित होगा, वही मोक्ष का साधन बनेगा। मोक्ष प्राप्ति हेतु
हर हालत विषय-विकार त्याग दो, यह ध्यान रखो न कोई तुम्हारा है, न तुम किसी के हो, न
कोई तुम्हारा था।
जो कुछ तेरा भाग्य था वह प्रभु कृपा से मिला, जो तू प्रभु कृपा द्वारा भुगतेगा
उसका फल ही तो तुझे भोगना पड़ेगा!
भगवान दया का सागर अवश्य रूप से तुम्हारा दाता है! भगवान दया का
ऐसा भंडार है जो सदा खुला रहता है! भगवान दया की ऐसी गंगा है जो
मनुष्य के पापों को धोकर पावन बनाती है! भगवान दया का ऐसा सागर है जो
प्रत्येक का उद्धार करता है!
भगवान से बड़ा दाता और कौन? क्या कोई भगवान की तरह दया
करेगा? क्या कोई भगवान की तरह समझेगा? अतः तुम अपने लिए, प्रभु की शरण
ग्रहण करो। अपने लिए प्रभु से कुछ मांगो? भगवान से बड़ा दाता
संसार में कोई नहीं। जो कुछ वह दे सकता है वह और कोई नहीं दे सकता। जो
कुछ वह तुम्हारा बना सकता है वैसा कोई और नहीं बना सकता। अतः प्रभु
चरणों में विनायक सहाय की तरह नतमस्तक होकर रहो।
प्रेत बाधा, इस विषयक विस्तृत विवेचना कर यह सिद्ध करने का मेरा, यह उद्देश्य
रहा, कि प्रेत योनि, का भोग तब, ही प्राप्त होता है जब वह आचार-विचार से भ्रष्ट
हो कर मन से विकारों का शिकार बन जाय! अतः सदा मन वचन कर्म से प्रभु

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भाग 6 (पृष्ठ 101-120)

कूपमें गिरे? उसको किसने रास्ता दिखाया? मरुस्थलमें वह क्या मरुमरीचिकामात्रके वश पड़ गया
था।
फिर उस साधकका सर्वस्वचोरीमें लुटनेसे बच भी जाय तब भी जीवनके लक्ष्य बिन्दुका
ज्ञान होगा कि यह जीवन किसलिये मिला और इसके मिलनेका फल क्या है? अज्ञानतावश यदि यह इस
पथ पर पैर भी रखना चाहे तब भी पग पग पर पग पग पर पग पग पर ठोकरें खा कर पथभ्रष्ट होकर
अन्तमें नरकका ही भाजन होगा या दुर्गति भोगने को मिलेगी।
इसलिए साधकको इस बातका विचार, सावधान होकर सावधानीके साथ कर लेना चाहिए
जिससे कि लक्ष्य दूर न रहकर प्राप्तिके अनुकूल हो जाय। प्रत्येक जीवको यह सोचना, विचार करना चाहिए
कि हमारे जीवनका क्या फल है? केवल पेट भरना? केवल सन्तानोत्पत्ति ही करना अथवा सब प्रकार
सांसारिक सुख भोगना मात्र ही इसका फल है? कदापि नहीं यह तो सब पशु-पक्षी भी भोग लेते हैं
मनुष्यके इस मानव तनका फल तो कुछ अन्य ही होना चाहिये?
जब तक आत्मा परमात्माके पदको प्राप्त न करले तब तक समझो कि जीव अज्ञानी, अचेत
तथा सब प्रकार अंधकार में विचरता, माया मोहके जालमें फँसकर आवागमनके चक्रमें भटक रहा है।
प्रत्येक आत्माको इस बातका चिन्तन करना आवश्यक है, जिससे उसकी आत्मा जाग्रत होकर,
मोक्षकी ओर अग्रसर हो सके। साधकको चाहिए कि वह अपनी आत्माको जागृत करे एवं परमात्माके पदका
सम्यक् रूपसे दर्शन करे। आत्माके परमात्माके स्वरूपको सम्यक् रूपसे जानकर तथा
पहचानकर मोक्ष प्राप्तिका यत्न करना उचित होगा। इसलिए आवश्यक हैकि पहले साधक, स्वाध्यायके
माध्यमसे तत्त्वका
पूरा बोध कर सत-असत्का, स्व तथा परका सम्यक् अन्तर जाने। जब तक सत क्या है? यह न जाने
तब, क्या असत् से पृथक् रहेगा? जब तक यह जानेगा, कि असत् किसे कहते हैं?
असत्का रूप क्या है? साधकके लिए असत्, हेय वस्तु, त्याज्य वस्तु, सब प्रकार त्याज्य वस्तु
केवल मात्र ही त्याग ही करने की वस्तु है। इस प्रकार जब सत, असत् का भेद भली प्रकार जान
लेगा तब, स्वतः उस असत्का परित्याग कर देगा। वह त्यागके लिए किसी प्रकार यत्न न करेगा
क्योंकि, जब यह ज्ञानके प्रकाशसे जान जायगा कि असत्का तो स्वरूप ही त्याज्य है, वह त्यागनेयोग्य
ही वस्तु है। इसलिए वह स्वयं ही असत्का त्याग न कर देगा, स्वतः त्यागके रूपमें परिणत हो जायगा
फिर उस त्यागको त्याग भी, त्यागके रूपमें ग्रहण नहीं करेगा। तब त्यागका अहंकार भी समाप्त
होकर त्याग भी एक सहज स्वाभाविक रूप धारण कर लेगा। यही बात स्व तथा परके सम्बन्धमें
कही जा सकती है। जब तक आत्माको यह ज्ञान नहीं हो जाता कि आत्मा, जिसको केवल ज्ञान
दर्शन रूप अथवा चैतन्य रूप माना गया है। वह ज्ञान दर्शन स्वरूप आत्मा न किसी अन्यके रूपमें
परिणत हो सकती है। और न ही यह अन्य रूप परिणत हो सकती है। जब आत्माका अन्य किसी रूपमें
किसी प्रकार से परिणमन नहीं--हो सकता, तब यह, यह सोच--समझ कर कि यह अन्य समस्त
संसारी वस्तुएँ आत्मा से भिन्न हैं? अतः इन भिन्न वस्तुओंका आत्माके साथ सम्बन्ध
अस्वाभाविकहै। यह भाव ही अनादिकालसे इस जीवके साथ लगा हुआ है।
इस प्रकार का ज्ञान जब आत्मा को होता है? तब आत्मा स्वाभाविक रूप से, समस्त
वस्तुओंके साथ जो मोह सम्बन्ध है उसको तोड़ देता, समस्त सांसारिक बन्धन टूट जाते
तथा आत्मा जाग्रत होकर उस! परम तत्त्वके स्वरूपको पहचान कर समस्त भय से रहितहोकर
अपनी ही सत्तामें स्थित होकर निर्वाण स्वरूपको प्राप्त कर लेता है। वास्तवमें यह जीव जबतक स्वयं
अज्ञानी, उस अवस्थाको प्राप्त करनेके यत्नसे अपने मुखको मोड़े रहता है तबतक, अपने स्वरूप
लक्ष्य को जानकर उस पद रूप निर्वाण स्वरूपको प्राप्त नहीं कर सकता। अत एव ज्ञानी साधकको
इस पथका दर्शन प्राप्त कर! इस प्रकार अपने स्वरूपको जाग्रत करके उस लक्ष्यको सिद्ध करना
चाहिए।
आत्मा को यह विचार करना होगा, केवल विचार मात्रसे ही कल्याण सम्भव तो नहीं हो
सकता केवल विचार ही, उस आत्माको जाग्रत करके अपने स्वरूपको अवश्य करा सकता, किन्तु उस ज्ञान
को धारण करके ज्ञानके बताए पथ पर जब तक चलेगा नहीं, तबतक उस पदको प्राप्त नहीं, कभी
कर सकता अतः, ज्ञान मात्र साधन मात्र, केवल ज्ञान साधन मात्र, ज्ञान मात्र साधन मात्र ही
साधन मात्र, कल्याणका मार्ग नहीं, कल्याणका मार्ग स्वाध्याय रूप ज्ञानके साथ साथ, उस ज्ञान
को उस पथको भी धारण, करना, उस पथ पर चलनेके लिए सतत प्रयासरत रहना आवश्यक है।
केवल ज्ञान ही सब कुछ कर सकता, यह कहना न्याय संगत नहीं कहला सकता। इसलिए ज्ञानके
साथ साथ उस ज्ञान रूपी दीपकको सम्मुख रखकर उस पथ पर उस मार्ग पर चलना होगा। अतः
ज्ञान, जिसका प्रतिपादन पूर्व शास्त्रमें किया गया, उस ज्ञानको समझ, कर जान...
कर आत्मस्थ करके उस पर ही पग आगे रखना इस जीवका कर्तव्य होगा! तभी यह
स्वाध्यायका फल, आत्मा को प्राप्त हो कर मोक्षका मार्ग प्रशस्त होगा
101

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102

स्वरूप है आत्मा, यह उस समय प्रत्यक्ष भासने पर ही संभवित, प्रमाण का विषयभूत, प्रमाणका फल
होगा, प्रमाणताका फल दूसरा तो नहींहोगा॥
स्वभावका पर रूप होकर परिणमना स्वरूपके नाश बिना कदापि संभवित नहींहोगा क्योंकि
स्वभाव परिणाम स्वभावका अभाव होता नहीं।और जो ज्ञेय वस्तुका रूप आत्मा परिणम गया तो ज्ञेय रूप
केवल ज्ञानादि रूपमें परिणमे ऐसी बात घटती नहीं।अथवा आत्मा ज्ञेयका रूप हुआ, तदाकार
रूप स्वयं हुआ, ज्ञेयका रूप आत्मा हुआ ऐसा मानने पर आत्माका नाश सिद्ध होगा, इसलिये आत्मा ज्ञेय
रूप नहींहोता।अथवा ज्ञेय रूप हुआ तो ज्ञेयका अभाव हुआ।कारण कि जो वस्तुका स्वभाव है उसका नाश
होनेपर वस्तुका स्वभाव नष्ट होनेपर नष्ट हुआ ही कहा जायगा, उस समय आत्माका स्वरूप नष्ट हो जायगा
कि जो आत्मा चैतन्यरूप ज्ञायक स्वभाववान्‌ वस्तु है।सो ऐसे ज्ञेय रूप आत्मा हुआ ऐसा माननेपर ज्ञेयका
नाश और आत्माका स्वरूप नाश होगा? सो आत्मा नित्य है सो ज्ञेय रूप ज्ञान परिणमे तब ज्ञेयका
सद्भाव, ज्ञेयके जाननहार आत्माका सद्भाव प्रत्यक्ष अपने ज्ञान द्वारा सिद्ध है।इस प्रकार
केवल ज्ञान स्वभाव स्वरूपके नाश बिना ज्ञेयका ज्ञान सिद्ध होगा, सोई बात इस
सिद्धान्त ग्रन्थमें कही है, तथा समन्तभद्र स्वामीने आप्तमीमांसा-ग्रंथके मध्यमें इस बातको सिद्ध
की कि स्व पर प्रकाशक जो ज्ञान सो सम्यक्, ज्ञान का ज्ञान और ज्ञेयका
ज्ञान ऐसे दोनो प्रकारका ज्ञान सम्यक् ज्ञानीके ज्ञानमें इस प्रकार भासता सोई सम्यक् ज्ञान
ज्ञानीके ज्ञानमें भासता कि नहींभासता?जो सम्यक् ज्ञानीके ज्ञानमें स्व पर प्रकाशकपनेका ज्ञान नहींहोगा
प्रमाणका फल सम्यक् ज्ञान होगा ऐसा घटता नहींसो प्रमाणताका फल सम्यक् ज्ञान जानना, जो
सम्यक् ज्ञान सो केवल ज्ञान ही घटता और केवल ज्ञान सो सम्यक् ज्ञान प्रमाणका फल घटता नहीं।
तब तो केवल ज्ञान प्रमाण ही घटता, सो प्रमाणका फल सम्यक् ज्ञान सो भी घटता? सो तो मिथ्या
ही बात घट जायगी।परंतु ज्ञान और ज्ञेयका स्वभाव भिन्न परिणमता सो प्रमाणका फल सम्यक् ज्ञान
कहिये।इस प्रकार ज्ञानीके ज्ञानमें घटता सो ज्ञान घटता, ज्ञेय घटता नहीं,परंतु सम्यक् ज्ञानीके
ज्ञानमें, सम्यक्‌पना ज्ञान और ज्ञेयका भिन्नपना सो ही ज्ञान हुआ सो प्रमाणका फल सिद्ध हो
सकता सो सम्यक् ज्ञानमें सम्यक् ज्ञानी? सम्यक्‌पना यह नाम जो है सो ज्ञानका ही नाम है।परंतु
यह नाम ज्ञेयका
तो नहींहोता।इसलिये जो, सम्यक्‌पना नाम ज्ञानीके ज्ञानका सो ज्ञानीके ज्ञानको ही
सम्यक् ज्ञान नाम घटता ज्ञानीका सो ज्ञान ज्ञेयके भिन्नपनेका नाम घटता, ज्ञेयका ज्ञान भिन्न
स्वरूप कहियेगा, ज्ञेयका ज्ञान भिन्न स्वरूप नहींघटता।परंतु जो ज्ञेय पदार्थ है वह तो अपने
रूप ज्ञेयमें घटता और ज्ञानीका ज्ञान ज्ञानीके रूपमें घटता ऐसा ज्ञान और ज्ञेय भिन्नपना ज्ञानीके
ज्ञानमें घटा सो सम्यक् ज्ञान घट गया, सम्यक् ज्ञान सो ज्ञान, अज्ञानीके घट गया नहीं।सम्यक् ज्ञान
जो, ज्ञानीके घट गया! इससे सिद्ध हुआ सो सम्यक् ज्ञान जो है, सम्यक्‌पना घट गया सोई सम्यक्
ज्ञान अपने रूप ज्ञानीके ज्ञानमें घटा॥
सो बात यह, कि सम्यक्‌पना जो, सो ज्ञानका ही, सो ही ज्ञानीके ज्ञान का, ज्ञानीका ही
सम्यक् ज्ञान सो, ज्ञानीके ज्ञानमें घट गया।सम्यक् ज्ञान सो ज्ञेय पदार्थके ज्ञानमें नहींघटता सो,
अज्ञानीके घट, सम्यक् ज्ञान ज्ञेयके ज्ञानमें सो ही ज्ञेयके ज्ञान में, ज्ञेयके ज्ञान सम्यक् ज्ञान सो
ही घटता इस प्रकार जो, सम्यक्‌पना नाम सो ज्ञेयके सो ज्ञानमें अज्ञानी घट गया सो ज्ञान सिद्ध
हुआ? इससे क्या सिद्ध?
ज्ञानीके स्व पर का ज्ञान हुआ सो ही केवल ज्ञानावरण क्षय-उपशमका सम्यग्ज्ञान
सम्यक् ज्ञान रूप घटता, ज्ञानी के सम्यग्ज्ञान केवल ज्ञानावरण के क्षयका सम्यग्ज्ञान सो
ज्ञानी के ज्ञान का क्षयो-पशम केवल ज्ञान केवल ज्ञानावरण क्षय सम्यग्ज्ञान सो सम्यक् ज्ञानका
ही ज्ञान हुआ फल सम्यक् ज्ञान सोई सम्यक् ज्ञान सम्यक् ज्ञानीका फल, सम्यक् ज्ञानका क्षयो-पशम
सम्यक् ज्ञानी सम्यक् ज्ञान ज्ञानका फल सम्यक् ज्ञान ज्ञानके ज्ञानका फल सम्यक् ज्ञान ज्ञानी
सम्यग्ज्ञान सम्यक् ज्ञानी सम्यक् ज्ञान सो, सम्यक् ज्ञान सो ज्ञान ज्ञानी का ज्ञेयका सो
ज्ञेयका सम्यक् ज्ञान सो नहींहोता, ज्ञेयके, ज्ञानके, सम्यक्‌पना न होता, सो ज्ञेय स्वरूप घटा सो
ऐसा पर का ज्ञान
सम्यग्ज्ञान ज्ञानी ज्ञान सो पर ज्ञेय ज्ञानी के ज्ञानका सो सम्यक्, सो ऐसा ज्ञान सो
ज्ञानका सम्यक्, सो ज्ञेय का ज्ञेय सम्यक् सो ज्ञेयके सो ज्ञेयके सम्यक् स्वरूप सम्यक् सो ज्ञेयके,
ऐसा सम्यक् सम्यक् ज्ञेय सम्यक् सम्यक् सो ज्ञेय स्वरूप, सम्यक् स्वरूप ऐसा ज्ञेयका सम्यक्
सो सो स्वरूप ज्ञेय सम्यक् स्वरूप ज्ञेय स्वरूप न घटता ऐसा सो ज्ञेय स्वरूप सम्यक् सो ज्ञेय
ज्ञेय का ज्ञेय सम्यक् सम्यक् घटता, ज्ञेय स्वरूप ऐसा सम्यक् ज्ञेय सम्यक् स्वरूप सम्यक् सो ज्ञेय
का ज्ञेय सम्यक् सम्यक् सो ज्ञेय, ज्ञेय स्वरूप ज्ञेय सम्यक् सो सो ज्ञेय सम्यक् सम्यक् सो ज्ञेय
सो ज्ञेय, ज्ञेय सो ज्ञेय ज्ञेय सो ज्ञेय सम्यक् ज्ञेय सो ज्ञेय, ज्ञेयका सो सम्यक्,
ज्ञेयका सो सम्यक्, ज्ञेयका सो सम्यक्, ज्ञेय सम्यक् सो ज्ञेय सम्यक् सम्यक् सो ज्ञेय ज्ञेय
ज्ञेय ज्ञान सम्यक्‌पना, ज्ञेय ज्ञान सो, ज्ञेय ज्ञान सम्यक् न ज्ञेय ज्ञान ज्ञेय सम्यक्
103

के भाव से सब को शांत करने वाला जानना योग्य है। जिस तरह सब जीव, अपनी अपनी देह
लिए फिर, तो उस देहके साथ सब का वैर छोड़ देवे
सो ही श्लोक अर्थांतर से कहते हैं, जन्म-मरण दुःखित को तो यों विचार करे,
जन्म-मरण दुःखित तो सब ही हैं। कोई तो नरक में दुःख भोगत हैं। कोई तिर्यंच
में तिर्यंच सब दुःखी हैं, देवताओं सहित नर, देवताओं सब दुःखी जहां तहां
जीव ही जीवों के संकट को संकट रूप जानके दया प्रवृत्त हो, इस लिये शांत भावक
ऐसा जाने कि, जो इस जीव पर दया न करे तो कौन करे।
इसमें सब जीवों से समता परिणामी हो तो सब से वैर न रहे। सब कोई
जो जैसा है सो सो, सब कर्म उदय करके व्याकुल भया है, सब कर्मवश, सब
परवश, सब मिथ्यादर्शनकषाय करी व्याकुल परिणामी सो सब दया योग्य ही
जानि शांत भाव धारे। क्रोध न करे। तब सब शांत हो।
अध्यात्म में शांत भावक को क्रोध, रागदिक तो उदय प्रमाण ही होगा, सो
बहुत मंद होगा; किसी के ऊपर तो दया का परिणाम ही आवेगा कि यह दुःखी
ही भया, इसपर से वैर क्या, दया करे; किसी के तो यह जाने कि सदा काल सब
जीव ही का स्वभाव तो सब लोका लोक को जानन हार सर्वज्ञ का स्वभाव
है? सो स्वभाव तो सब ही का एक ज्ञान ही ज्ञान भाव सो तो समै ही समै ही
जानि शांत ही का अभ्यास
फिर भावक को शांत प्रभाव का फल, नमस्कार रूप से कहते हैं। कर्म
क्षपण [ ] का उपाय तो यही शांत परिणाम ही उपजावे, सो यह जीव ही सब को
शांत करि सकै। वा शांत ही को सब पद से श्रेष्ट वा समस्त ही शांत भाव ही
नमस्कार वा वंद्य स्वरूप है, तिस को नमस्कार शांत ही का नमने योग्य
भाव
शांत परिणाम से सब जगत व्यापे का अर्थ, शांत परिणामादिकों से जो सब भाव
शांत भया, तिस शांत परिणाम से सब जगत शांत हो, ऐसा भावक
नमस्कार करै।
104

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105

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106

उनका स्वभाव प्रमाण का, ज्ञेयाभासका नाम ही प्रमाणतदाकारका कि उस पर ज्ञान का रूप होगा
उसे उस समय ज्ञान का तो रूप कहो, फिर कैसा संशय होगा ?
ऐसा कहो, सम्यग् ज्ञान को तो ज्ञान कहो ही मत और कहो, सम्यक् ज्ञान नाम कोई
वस्तु नहीं ऐसा तुम कहो सो नहीं बनता क्योंकि ज्ञान रूप तो तुम अपने ज्ञानको जानते
बिना नहीं, फिर यह सब व्यर्थ वाक्य कहते हुए ज्ञान के लक्षण करने का तो तुम को काम
नहीं कि जो एक पर ज्ञान होता भया सो किसी के ज्ञानका तो लक्षण रूप नहीं, केवल
रूपका ज्ञान ऐसा लक्षण किया सो बन सके, केवल ज्ञान को तुम रूप कहते हो और
उस ज्ञानका रूप लक्षण किया सो बन सके, जो उस रूप ज्ञान लक्षणको प्रमाण कहो, सो
फिर इस रूप को सम्यग् ज्ञानमें भी कहो कहोगे कि नहीं कहो, जो कहो सम्यक् ज्ञान
मिथ्यात् ज्ञान सो, जो ज्ञान का लक्षण सो, सो मिथ्यात् ज्ञान रूपी ज्ञान नहीं ऐसा कह
सके, जिससे ज्ञान रूप तो सम, ज्ञान रूप तो दोनो ही हैं और एक रूप ज्ञान रूप सो
केवलज्ञानका ही कहो, रूप जो केवल ज्ञान पर्याय सो तो ज्ञान सम्यक् ज्ञानका भी रूप
सो जो ज्ञानका लक्षण कहोगे सो तो ज्ञान मात्र रूपका प्रमाण कहोगे सो तो ऐसा प्रमाण
ज्ञान सब जीव सो सब एक रूप भया
सो सब को प्रमाण, सो सब को केवलज्ञान भया तब प्रमाण का लक्षण सो कहना
व्यर्थ
सो ऐसा मत कहो सर्व जीव सो एक नहीं, सब को केवलज्ञान भया सो
मिथ्याज्ञान सो सम्यक्, सम्यक् सो सब प्रत्यक्ष ही प्रमाण का लक्षण जो कहे प्रमाण
सो, उस का रूप ज्ञान सब को एक रूप सो ज्ञान का ज्ञान, सो ज्ञान का सो ज्ञान, सो
ज्ञान मिथ्या, सम्यक्--केवल सो सब हो या नहीं? प्रत्यक्ष ही प्रमाण का रूप
कहो, केवल प्रमाणका सो, तब सम्यक् को कहो, ज्ञान रूप सो--ज्ञान का तो रूप
कह सके?
जो सब एक ज्ञान रूप प्रमाण हुआ पर्याय रूप सब एक रूप भया, तो सब
केवल ही हो गए सो सर्व मिथ्या मिथ्यात्व, सम्यक् अज्ञान सो सब प्रत्यक्ष
केवल प्रत्यक्ष के प्रमाण रूप भया सो प्रमाण तो सब भया, सो तो प्रमाण रूप
सब एक प्रमाण रूप ही भया सो, केवल ज्ञान को प्रमाण कहो सो सब प्रमाण
सो, केवल का प्रमाण लक्षण सो सब का भया तब पर्याय रूप सो सब प्रमाण
प्रमाण रूप ही प्रमाण भया सो, पर्याय के पर्याय भया सो, पर्याय सब को एक
ही प्रमाण भया सो सब प्रमाण सर्वथा भया? सो ऐसा कथन सब ही प्रमाण
प्रमाण भया कहो? सो सब सर्वथा ज्ञान सब का प्रमाण प्रमाण भया कहो?
प्रमाण का ज्ञान प्रमाण सब का एक भया कहो, पर्याय भया कहो, जो भया कहो,
ऐसा सो तो ज्ञान का रूप, सब प्रमाण स्वरूप
ऐसा प्रमाण का स्वरूप सो, सब प्रमाण के प्रमाण स्वरूप प्रमाण
स्वरूप ही भया, सो इस स्वरूप ज्ञान का होता है? सब को प्रमाण ही
प्रमाण सो, तब प्रमाणका ज्ञान स्वरूप प्रमाण रूप ही भया सो प्रमाण, सो
ज्ञान स्वरूप ज्ञान का भया सो? सो तो ज्ञान सर्व प्रमाण भया तब सो सब
केवलज्ञान स्वरूप भया सो, सो सब ज्ञान भया, सो सब ज्ञान सो ही, सो सब ज्ञान
भया, सो सब ज्ञान ही भया
स्वरूप तो ज्ञान सो सो ही स्वरूप सो प्रमाण रूप सो प्रमाण ज्ञान का ज्ञान
सब प्रमाण का रूप भया, प्रमाण स्वरूप सब का प्रमाण सो सब रूप सो प्रमाण
ज्ञान का स्वरूप सो प्रमाण रूप भया, सो तो सब रूप सो प्रमाण का ही स्वरूप
प्रमाण सो प्रमाण रूप सब ज्ञान रूप स्वरूप सब सब रूप सब रूप सो सब ही भया
सो ज्ञान सर्व प्रमाण सो ज्ञान स्वरूप सो सो रूप सब सो ज्ञान प्रमाण स्वरूप सो
सो सो सो स्वरूप प्रमाण सो, पर्याय सब सो सो प्रमाण सब ज्ञान रूप प्रमाण
सो सो रूप ज्ञान ज्ञान रूप प्रमाण सो सो रूप सो ज्ञान ज्ञान सो सो रूप सब ।
प्रमाण रूप का ज्ञान ज्ञान रूप सो प्रमाण प्रमाण सो सो ज्ञान सो ज्ञान सब
प्रमाण ज्ञान सब ज्ञान ज्ञान-रूप ज्ञान का ज्ञान
प्रमाण सो सब ज्ञान प्रमाण रूप सो प्रमाण प्रमाण सो सब ज्ञान प्रमाण
सब प्रमाण प्रमाण ज्ञान सो ज्ञान रूप
सो तो यह प्रमाण का स्वरूप सो प्रमाण ज्ञान प्रमाणका सो प्रमाण सो ज्ञान
सब ज्ञान का रूप भया? कहो जी, प्रमाण सो, प्रमाण सो, सो सब ज्ञान रूप ज्ञान रूप
प्रमाण ज्ञान सब प्रमाण का सब ज्ञान सो ज्ञान है? प्रमाण प्रमाण सो ज्ञान सो

107

करो, उनका उद्धार करिये। मैं आपके शरण होऊँ या अन्य किसी अन्यका आश्रय लूँ? प्रभु सब कुछ
देखते हुएभी मौनभाव को क्यों भज रहे हैं?
दीनको शरण देनेमें समर्थ प्रभु तो केवल आप ही हो, कृपामयके सिवा,
दूसरा या और कौन दूसरा ऐसा समर्थवान् दयालु हो सकता है? हे दयानिधे दयाकरके
अपने इस अकिंचन सेवकपर दया, कृपा कीजिये। अथवा आपके स्वभावके प्रतिकूल सेवक अकृतज्ञ
अपराधी जानकर त्यागे या त्यागा भी जा सके। सेवकके गुण-दोषको प्रभु अपने मनमें नहीं विचारते।
प्रभु तो दीन-बन्धु हैं! आप ऐसा नहीं विचारते कि मैं अमुक गुणवाला हूँ। इसलिए प्रभु दया-
दृष्टि करो ही, या फिर यह समझ लो प्रभु कि मैं आपका ही हूँ। मुझे प्रभु तारो, या न तारो
पर शरण त्यागी तो, पर हे नाथ प्रभु तो अपने भक्तको त्याग नहीं करते। ऐसा जानकर
अपराधको क्षमाकर प्रभु शरणमें आए हुएको तो पार ही करते हैं। अब मेरा अपराध
तो क्षम्य हो गया, पश्चात्ताप मुझे हुआ! दोनों हाथोंको प्रभु शरणमें उठा दिया, अब कैसा
संशय? इसके आगे प्रभुके प्रति समर्पण का, जिसके आगे प्रभु भी भक्तके वशीभूत
होते। भाव यहकि जिस बातको प्रभुने दृढ़ कर लिया कि प्रभु अपने भक्तको बचाएँगे, चाहे
भक्त कहे प्रभु न बचाओ, भक्त चाहे प्रभुके प्रति ऐसा भाव भी करे, पर भक्तका
उद्धार प्रभु जरूर कर देंगे।
प्रभुको यह स्मरण दिला दिया गयाकि प्रभु तो किसीके भी अवगुण नहीं देखते, जिस प्रकार
पिता अपने पुत्रके दुर्गुणों अथवा अवगुणोंपर ध्यान न देकर सदा प्रेमही करता है, उसका ही
कल्याण चाहता हुआ हितके साधन करता है। प्रभु, पिता भी हैं और माता भी। प्रभु तो
सर्वस्व सबके हैं। इसलिए प्रभुका यह काम अर्थात् भक्तको तारनेका ही हुआ, जिसके विषयमें
कहा गया कि प्रभु, न तारनेपर भी प्रभु शरणागत भक्तके दुर्गुणों पर ध्यान नहीं देंगे, सब प्रभु
क्षमा करते हुए, प्रभु अपने स्वभावके अनुसार भक्तको सब संकटोंसे मुक्त कर देंगे। प्रभुने
वैसा किया भी था, जिसके कई उदाहरण, प्रभुने गिद्धके देह छोड़ देनेपर उसे सद्गति दी,
जिसके लिए प्रभुने यह भी नहीं कहा, प्रभु तो विश्वामित्र-महामुनिको फल ही देते, जिन्होंने
प्रभुकी सेवा की। प्रभुका स्वभाव है दयालु, कृपा करना। वे ऐसा विचार कभी नहीं करते कि जिसने
मेरी शरण ली उसका क्या पूर्व इतिहास था। प्रभु तो भक्तके गुण देखते हैं। भक्त चाहे प्रभुसे
मुँह भी फेरना चाहे किन्तु प्रभु भक्तको शरणमें लिए हुएका त्याग नहीं कर सकते। प्रभु शरणार्थीको
तो तारते, जिसके लिए प्रभुने ही घोषणा की कि शरणागत प्रभुको सब संकटोंसे मुक्त करा
देते हैं, चाहे किसीका भी कैसा स्वभाव हो।
भक्तको उद्धार प्रभु ही शरणागत पाकर, भक्तको यह कह कर प्रभु सन्मुख कर लिया
कि प्रभु अब भक्तका गुण अथवा अवगुण नहीं विचारते। प्रभु तो सब प्रकारसे अपने शरणार्थीका
काम करते हुए सदा सर्वदा उसका रक्षण करते हैं। वह सब प्रकारसे भक्तको मुक्त कराते
हुए उसे शांति देते, जिसके कारण प्रभुकी भक्ति करनेवाला भक्त प्रभुको ही स्मरण
करता है। इसलिए कहा कि भक्तको प्रभु पार नहीं करेंगे? यह प्रश्न स्वाभाविक, ही
भक्त विचारता।
प्रभु तो भक्त को शरणागत देखकर न पार करें यह कैसे संभव होसकता है?
भक्त सब कुछ प्रभु पर छोड़ दे! प्रभुने उसका जिम्मा लिया! तो फिर भक्त चिंता
क्योंकरेगा?
भक्त ऐसा सोचते हुए, स्वाभाविक प्रभु, गुण वर्णन कर प्रभु सन्मुख अपना भाव
रखता हुआ, प्रभुके सम्मुख होकर अपने अंतरके भावको प्रभु पर ही छोड़ता हुआ कहता
कि प्रभु तो सब प्रकारसे प्रभुकी महिमा गाकर प्रभुको शरणमें प्रभु दयाकी प्रार्थना करता
है। भक्तका स्वभाव प्रभु सम्मुख होकर प्रभुके यशके गीत गाकर ही अपने दिन
बीत रहे हैं, प्रभुकी ही शरणमें सब संकटों से मुक्त करनेके लिए, शरणागत भक्त विनीतभाव
से प्रार्थना प्रभुसे करता हुआ स्वयंको भूलकर प्रभु चरणोंमें बैठ जाता है, जिसके लिए प्रभु
स्वयं चिंता करेंगे। भक्तके लिए प्रभुने ऐसा कब नहीं किया? प्रभु सब कुछ, सब समय
करते ही रहतेहैं। भक्त शरणार्थीका यह भाव देखकर प्रभु बहुत प्रसन्न होते और भक्तका
सब प्रकारसे कल्याण करते हुए भक्तको अपनी भक्ति प्रदान करके प्रभु स्वयं
प्रसन्न होते हैं। ऐसा विचारकर प्रभुके भक्त प्रभुकी शरणमें जाकर दीन-हीन होकर
प्रभुसे उद्धारकी प्रार्थना करते हैं। भक्तको इस प्रकार प्रभुपर पूर्ण निष्ठा हो, प्रभु दयानिधान
अपने भक्तकी पुकार सुनकर स्वयं भक्तके सन्मुख पहुँचकर उसका उद्धार करते हैं।
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क्या आपने विचार किया कि किस प्रकार यह संभव हुआ कि हम सब का जन्म किसी विशेष देशके किसी
भी भाग या स्थान विशेष रूपमें हुआ या किसी विशेष कुल या जाति तथा किसी विशेष परिवार या कुटुम्ब
तथा किसी निश्चित माता-पिताके यहाँ या इस प्रकार किसी युग विशेष में हुआ है?
यह तो तय ही रहा होगा कि इन सब बातोंके सम्बन्ध में हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना
किसी तिल-मात्र रूपमें काम नहीं आई, सिर्फ हमारी अपनी इच्छा अथवा योजना का इतना प्रभाव तो ज़रूर
पड़ सका होगा जिसके आधार पर सब का अपना जीवन चला होगा या, जो कुछ हमने चाहा होगा
मिलेगा।
हम जो कुछ पाना चाहें उसके दो पहलू हैं, एक पहलू तो यह होगा जिसे हम चाहने
लगे अधिकार के तौर पर, जो स्वाभाविक ही प्राप्त हो सकता था जिसके लिये प्रयत्न व्यर्थ
अथवा कम ही या नहीं करना पड़ता था, अधिकार तो हम सब का ही रहेगा।
दूसरा जो पहलू, जिसे हम अपना अधिकार या अधिकार, या जो भी हम अधिकार
समझें उसके लिये हमें सब कुछ ही दाव पर लगा देना पड़ता है। इस प्रकार अधिकार जताने
अथवा पा लेने भर ही से तो सफलता निःसंदेह प्राप्त तिल-मात्र तक नहीं होगी यदि
हमें सर्वथा त्याग ही करना पड़े। तिल-मात्र प्राप्त करने के लिये जीवन पर्यन्त जो चेष्टा
करनी पड़ सकती है, उसके दो पहलू सदा सर्वदा बने ही रहते हैं। दूसरा पहलू
प्रत्येक का इस बात पर निर्भर हो सकता था कि प्रत्येक रूपमें सदा सर्वदा जीवन की ही
लीला चलती रहना संभव था।
हमारा अधिकार सम्पूर्ण संसार पर सदा सर्वदा का तो संभव ही नहीं किया जा
सकता रहा हो, पर संसार का इतना बड़ा प्रभाव तो प्रत्येक रूप में तो बना ही रहा
कि इच्छा, मर्यादा के पार, अधिकार को उस दशा पर्यन्त पहुँचाया जा सकता था
जिसकी हम चेष्टा करें, जो तिल-मात्र ही, क्षणिक-क्षणिक का विषय सदा ही बनकर
रह गया हो या फिर हो तो सकता था तिल-मात्र रूप तक उस दशा विशेष पर्यन्त
ही बना रहे।
हम सब का यह यत्न सदा ही तो रहा कि संसार का तो तिल-मात्र ही रूप या
दिशा में बदल ही तो रहा था, जिसे देखकर हम सब को भी! यह तो अधिकार ही
बना रहता था, जिसे पाने का विचार ही सब कुछ पाकर सदा सर्वदा के रूप में
सदा मिलता रहा।
इस स्थिति द्वारा देखना या सब का पा जाना ही सदा ही तो संभव रहा, जिसे
पा सके थे! दशा तो सब की एक जैसी, प्रभाव अपना अपना ही प्रत्येक रूप अपना
प्रभाव तो सब को दे ही सका था।
यह दशा ही स्वाभाविक रूप से सब को क्षणिक-क्षणिक ही, पर पूर्ण
अधिकार, सब दशा पर्यन्त, सदा सर्वदा पर्यन्त, सब दशा पर्यन्त ही
मिला करेगी? जिसका स्वरूप भी क्षणिक-क्षणिक-रूप में सब को इस
प्रकार का।
उस दशा का विचार ही सदा रहता ही तो रहता ही रहा कि चेष्टा का रूप
प्रत्येक दशा में इस दशा को बनाए ही तो रखने का ही बनता ही रहा कि हम तो चेष्टा
को बनाए रखकर सदा सर्वदा ही पाना चाहते सदा ही रहना चाहते बना रहे,
जो कुछ हम चाहते थे, वह यत्न प्रत्येक दशा पर्यन्त तिल-मात्र ही बन
कर रह गया था, जो दशा विशेष रूप में सदा पर्यन्त तिल-मात्र दशा रही।
उस सब दशा का ही नाम तो चेष्टा रहा होगा; जिससे कि हम स्वयं चेष्टा
का नाम रूप बदल भी लें, फिर सब चेष्टा न सही, प्रयास व प्रयत्न समझना
पड़ेगा या समझना ही पड़ा ही होगा भी, फिर चेष्टा, यत्न या फिर दोनों दशा यही
चेष्टा व यत्न, यत्न व चेष्टा।
यद्यपि चेष्टा अथवा प्रयत्न दोनों दशा सब चेष्टा दशा रूप किसी बात अथवा
चेष्टा का परिणाम हैं? इस या उस दशा का यत्न ही सही, जिस पर विचार कर ही कोई
यत्न रूप ही सदा बनाए रखने का यत्न तो किया ही जाता रहा, यह स्वाभाविक ही
रूप में होता, जिस पर चेष्टा व प्रयास सदा ही बना रहता व रहता, जब चेष्टा
का अधिकार सदा व प्रयास, यत्न का यत्न ही बना रहा।
इस दशा का तो रूप इस प्रकार घट--बढ़ सदा ही होता रहा, इस दशा को
प्रत्येक का यत्न, सदा ही रहा होगा जिस दशा का यत्न न होकर व चेष्टा,
सो सब दशा सब चेष्टा के यत्न का रूप रहा ही? पर सब चेष्टा रूप ही सदा
बनाकर रूप सदा का यत्न व चेष्टा का ही रूप व चेष्टा।
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इस पर वह बोला कि क्या प्रभु यीशु मसीह हम लोगों जैसा मनुष्य था या उसने केवल मनुष्य का वेषमात्र
धारण कर लिया था? मसीही मत के अनुसार प्रभु यीशु मनुष्य रूप धारण कर इस पृथ्वी पर आया और उसने दुख
क्लेश भी उठाये, पर वह सर्वथा निष्पाप तथा सब तरह परिपूर्ण था, इसके सिवाय अधिकांश ईसाई उसके
ईश्वर होने तथा त्रित्ववादी सिद्धान्त विश्वास रखते हैं। जब मनुष्य का शरीर धारण किया मसीह ईश्वरस्वरूप भी
था अथवा केवल एक नर था? मसीह के ईश होने का तो क्या कहना! वह तो केवल नबी, ना ही पूरा नबी
वरन परमेश्वर का सन्तान था। जैसा कि इंजील मत्ती १३:५५ में लिखा है, कि जब ईसा नासरत में गया तो
लोग कहने लगे कि क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं! इस बात सुनकर वह मसीही रोने लगा, रोते-रोते उसका
हिचकी बंध गया और उसके पश्चात उसने कहा कि इन लोगों की आँखें फूट गयीं थीं जिन्होंने मसीह को केवल एक
बढ़ई का बेटा जाना था। इंजील में यीशु को ईश्वर का बेटा कहा गया है! मसीह को जो लोग केवल एक साधारण
मनुष्य समझते हैं वह इस बात को भी जान लेंवे कि मसीह को मरियम कुँवारी का बेटा माना जाता है, इस
बात को केवल ईसाई ही नहीं मानते किन्तु कुरआन शरीफ में भी ईसा को मसीह इबने मरियम करके
सम्बोधित किया गया है।
स्वामी जी ने कहा- हम यह मानते हैं कि ईसा एक पवित्र पुरुष था। वह बड़ा दयालु था, उसने
लोगों को अच्छे रास्ते पर चलने का उपदेश दिया। उसने कोई किताब नहीं लिखी, वरन जो कुछ भी लिखा गया
वह उसके शिष्यों द्वारा लिखा गया है। इसका भाव यह है कि मसीह, जिसको तुम ईश्वर, नबी, फरिश्ता मानते
हो, हम उसे इन तीनों में कुछ भी नहीं मानते। जब ईसा ने यहूदी मत की त्रुटियों को देखा, उसके सुधार का
प्रयत्न किया तो वह यहूदी लोग उसके विरोधी हो गये और उस समय के रोमन हाकिम से मिलकर उस बेचारे को
सूली पर लटका दिया। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं।
स्वामी जी की बात का उस पादरी पर कोई प्रभाव न पड़ा। वह हठधर्मी करता रहा कि ईसा ईश्वर का बेटा
था। स्वामी जी ने समझाया कि यहूदी मत के अनुसार जो व्यक्ति व्यभिचार करता था उसे पत्थरों से मारा जाता
था। क्या ईसा के पास कोई ऐसा प्रमाण था कि वह ईश्वर का बेटा था। यदि मरियम के चरित्र पर कोई सन्देह
करता तो उस समय के कानून के अनुसार उसे पत्थरों से मार दिया जाता। तब ईसा ने अपने को ईश्वर का बेटा
कहा? यदि ईसा ईश्वर का बेटा था तो केवल उसी पर ईश्वर का क्या ठेका था? क्या और
मनुष्य उसके बेटे नहीं थे? क्या हम लोग उसके बेटे नहीं हैं? यदि तुम ईश्वर को एकदेशी और शरीरी मानते
हो तो उसका बेटा भी सिद्ध कर सकते हो। यदि उसे सर्वव्यापक मानते हो तो सब जीव उसी के बेटे हैं।
ईसा ईश्वर का कोई खास बेटा नहीं था।
पादरी कुछ देर तक तो चुप रहा--तत्पश्चात्, वह बोला, हम मानते हैं, या स्वीकारते हैं कि
जीव सब प्रभु द्वारा पैदा-किये गये हैं। किन्तु ईसा मसीह में कुछ विशेषता थी।
स्वामी जी ने कहा, विशेषता कैसी? क्या वह कुछ खा-पी नहीं सकता था, या कोई और बात थी? जब
उसने कोई बात ऐसी नहीं कही जो संसार के कल्याण के लिये उपयोगी नहीं थी। उसने अपने
को यहूदी धर्म की त्रुटियों को दूर करने के लिये अपने विचार प्रकट किये। ईसा ने अपने
समय में यहूदी धर्म की बुराइयों को दूर करने के लिये ही विचार प्रकट किये और वह उसी
कारण यहूदी लोगों द्वारा मार डाला गया।
जब वह जाने लगा तो उसने स्वामी जी से पूछा कि यदि संसार में महापुरुषों का आना बन्द हो
जाए और वेद ही केवल सब कुछ माना जाए तो संसार का कल्याण कैसे हो सकता है? स्वामी जी
ने कहा, हे पादरी! क्या वेद केवल किसी एक देश के लिये हैं? नहीं, वेद तो संसार के कल्याण
के लिये हैं; किसी देश विशेष के लिये नहीं; वेद केवल किसी जाति विशेष के लिये नहीं हैं।
वे तो केवल संसार के कल्याण के लिये हैं।
इस पर पादरी बहुत लज्जित हुआ। स्वामी जी ने कहा, सत्य को ग्रहण करो और असत्य को छोड़ो।
संसार के सब मत-मतान्तरों में कुछ न कुछ सत्य तो है ही, परन्तु साथ ही असत्य
भी बहुत है। इसलिये सत्य को ग्रहण करना और असत्य को छोड़ना ही चाहिये। यदि तुम
सत्य को ग्रहण नहीं करोगे तो तुम्हारा जीवन व्यर्थ हो जायेगा। स्वामी जी की बातों का
पादरी पर गहरा प्रभाव पड़ा। उसने कहा, मैं आपकी बातों पर अवश्य विचार करूँगा।
स्वामी जी ने कहा, यदि आप ऐसा करेंगे तो आपका कल्याण होगा।
स्वामी जी के विचार इतने सुन्दर और युक्तिसंगत होते थे कि सुनने वाले दंग रह जाते थे।
अनेक विद्वान लोग स्वामी जी के व्याख्यानों को सुनकर अपने मत की त्रुटियों को समझ लेते थे।
पादरी जब जाने लगा तो हाथ जोड़कर बोला, स्वामी जी! आप का ज्ञान अथाह है। मैं
आप से बहुत प्रभावित हुआ हूँ। स्वामी जी ने कहा, हम तो केवल सत्य का प्रचार करते हैं।
सत्य ही संसार का कल्याण कर सकता है। जब तक संसार में अज्ञान और अन्धविश्वास रहेगा
तब तक संसार का कल्याण नहीं हो सकता।

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