एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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53
ब्राह्मण को दान देना चाहिये, यथा योग्य सत्कार भी करें, पर उनका पथ--प्रद कभी नहिं बनना
चाहिये, शूरवीरता उनका धर्म अथवा कर्म कदापि नहिं कहला
इस पर क्षत्रिय को चाहिये अपने धर्म की रक्षा करता हुआ क्षत्रिय धर्म की रक्षा में अपनी
सर्वस्व आहुति देवे और अपनी मर्यादाओं तथा अपने धर्म तथा अपने राष्ट्र की मर्यादाओं, मान मर्यादा
किसी भी न प्रकार का भी धक्का न लगने देवे जिससे क्षत्रिय धर्म का नाम लज्जित हो सके तथा जो
क्षत्रिय हो कर अन्य वर्णवालों वर्ण को अथवा अपने ही कुल-धर्मवालों अर्थात् वैश्यों, वा शूद्रोंको वा
ब्राह्मण अथवा क्षत्रियोंके आधीन क्षत्रिय धर्म को रखे, अथवा जो क्षत्रिय कुल के होकर भी क्षत्रियों
द्वारा रक्षा न पा कर अन्य वर्णवालों की ही आधीन होकर क्षत्रियत्व को कलङ्कित करता हो अथवा जो ऐसो क्षत्रिय,
ब्राह्मण अथवा वैश्य, शूद्रोंके आधीन हो उनपर राज्य करनेकी चेष्टा करे तो क्या वह अपने को
क्षत्रियत्व धर्म पालने वाला वा क्षत्रिय कहलाने योग्य है? कभी नहीं, वरन् वह तो पापी तथा नीच है?
इस प्रकार क्षत्रिय को, क्षत्रिय धर्म की रक्षा का उद्योग करना चाहिये, तथा क्षत्रियों न को
कभी भी अन्य वर्ण पर राज्य करने की चेष्टा कदापि भी नहिं करनी चाहिये, वा अन्य किसी प्रकार अपने
विचार रखने चाहियें, न कि अन्य किसी प्रकार अपने को राज्यके भूखे साबित करके मर्यादाओं को नष्ट
कराकर राजनैतिक वा क्षत्रिय धर्म का विनाश ही कर बैठें॥
इस बात को तो सब सांसारिक मनुष्य भली प्रकार जानते ही हैं कि क्षत्रियों द्वारा
ब्राह्मणों को सदाचरण सम्बन्धी उपदेश ब्राह्मणों को ही तो क्षत्रियोंके आधीन रह कर ही
देना चाहिये जिससे क्षत्रियों द्वारा राष्ट्र की रक्षा तथा वैदिक मर्यादाओं भली प्रकार हो सके न कि,
ब्राह्मण क्षत्रिय धर्मपर आघात कर बैठें और स्वयं राष्ट्र पर राज्य करने लगें अथवा क्षत्रियों को राष्ट्र
की रक्षा का उद्योग नहिं करने देवे जिससे राष्ट्र में, वा संसारमें अशान्ति फैल जावे और
अन्य किसी पर अन्य का राज्य स्थापित होवे? तथापि वैश्यों शूद्र-वर्ग को तो क्षत्रिय धर्म की
मर्यादाओं नष्ट करनेका कभी स्वप्नमें भी विचार मन में भी न लाना चाहिये।
इसलिये क्षत्रियधर्मको ही सबने सदा मान्य तथा श्रेष्ठ धर्म माना है जिसको क्षत्रिय ही
धारण कर के रक्षा, वा राज्य शासन करते हैं, न कि अन्य ब्राह्मण वैश्यादि क्षत्रिय धर्म को
अपना कर, क्षत्रिय कहलाने का अधिकार, क्षत्रिय धर्मके आधीन रहकर ही तो पा सकते हैं?
अर्थात् क्षत्रियत्व की रक्षा ही, हर प्रकार से क्षत्रिय और क्षत्रिय धर्म द्वारा सब
मनुष्यों की हो सकती है, जो कि सब का रक्षक, सब का पोषण कर्ता एवं सबल क्षत्रिय अथवा
राजा कहलाता है? इस हेतु सब वर्णों, का कर्त्तव्य क्षत्रिय धर्मकी हर प्रकार से रक्षा करना तथा
क्षत्रियत्वको सब सदा अक्षुण्ण बनाये रखना, क्षत्रियों को किसी बात और किसी प्रकार का भी कष्ट,
चिन्ता वा शोक कभी नहिं होने देना, क्षत्रियों का मुख्य धर्म है॥
क्षत्रिय धर्म से ही सब वर्ण और धर्म की रक्षा हो सकती है। फिर जो वर्ण वा मनुष्य
किसी न प्रकार क्षत्रिय धर्म को धक्का पहुँचाने की कुचेष्टा करते अथवा करवाते हैं, क्या वे न
क्षत्रिय धर्मके प्रति द्रोह तो नहिं करते? क्या क्षत्रियत्व नष्ट करना न चाहते हैं? क्या धर्म
की हत्या करने वाले अथवा न करने वाले कहे जानेके वे पात्र नहिं बनते? जिस पर
सांसारिक प्रत्येक नर वा नारीका कर्त्तव्य बनता ही कि वे ऐसे लोगों को सख्त शिक्षा प्रदान
करें॥
सो इस प्रकार, क्षत्रियों द्वारा सदा संसारके सर्व मनुष्यों, विद्याभ्यासियों
को, धर्मोपदेशकों, तथा प्रजा-पालकवर्गों, वा सम्पूर्ण देश वासियों की ही
सुखपूर्वक रक्षा की चेष्टा की जाती रही, सो इस क्षत्रिय धर्म की रक्षाकी ही खातिर तो
इन सब को भी चेष्टा करनी चाहिये कि जिस से किसी प्रकार भी क्षत्रिय धर्मके विरुद्ध
कोई भी व्यक्ति न हो सके, वा क्षत्रियों द्वारा किये न जाने वाले किसी धर्म प्रचार
रूप कार्यमें इन सबको कभी नहिं प्रवृत्त होना चाहिये जिसका प्रभाव क्षत्रियत्वकी
मर्यादा गिराने वा क्षत्रिय धर्मके आधीन क्षत्रिय धर्मके विपरीत अन्य क्षत्रियत्व
का निर्माण कराने में सहायक होने का कारण बनता होवे जिससे क्षत्रियत्व तथा क्षत्रियत्व धर्म
लज्जित हो सके तथा ब्राह्मण आदि वर्णों को, अपनी मर्यादा तथा अपने कर्त्तव्य में
स्थिर रहना ही, अपने क्षत्रिय धर्मके प्रति कर्त्तव्य की मुख्यता है; जिससे कि सब ही
वर्णों की मर्यादा सुरक्षित, व स्थिर रह कर संसार परस्पर में सुखका उपभोग करने
समर्थवान् होवे
जिस का मुख्य ध्येय क्षत्रिय धर्म ही को ही सब प्रकार रक्षा का साधन रूप जान
कर, हर प्रकार क्षत्रिय धर्म की रक्षा की जावे जिससे कि सांसारिक सर्व वर्णों को ही इस
प्रकार, क्षत्रिय धर्मका सहारा हो, जो सांसारिक सर्व प्रजा तथा धर्म की ही रक्षा
कर सके वा अन्य वर्ण अपने धर्म का ही पालन कर सकेंगे, पर कभी क्षत्रिय धर्मकी मर्यादाओं
तथा अपने धर्म की सीमाओं का उल्लंघन
करने का पाप, हर एक वर्ण अपने अपने कर्त्तव्य पालन का ही तो नाम होवेगा वा क्षत्रिय
धर्मकी रक्षा ही का नाम होगा जो केवल ही सब सांसारिक सुख प्रदान करने वाली सिद्ध
54
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55
स्वरूप का, यह विचार तो होना सहज रूप से ही प्राप्त अथवा स्थिर रहेगा इसलिए कभी
अशुद्ध कार्य नहीं बन सकता कभी
जब जीव इस का विचार करे, तब जीव सब कुछ त्याग स्वाधीन अवस्था रूप हो कर
मात्र ज्ञान ही का काम ले तो सम्यक्त्व का रस उस वक्त प्रगट होगा ही, संशय इसमें कुछ
नहीं रहा
अब इसमें समाधान ऐसा जानना चाहिये कि विचार करे, विचार तो सहज ज्ञानी
अज्ञानी सब ही जन करते हैं पर वह विचार तो उस का जो विचार का विषय अथवा
जो विचार का लक्ष्य ज्ञान मात्र ही ज्ञान का स्वरूप सो ज्ञान रूपी नेत्र से ज्ञानी जन
देखते हैं जान कर, फिर मन उस तरफ एकाग्र कर ज्ञान रूपी रस पीते जाते
तृप्त होते जाते हैं, सो ज्ञान रूपी अमृत सागर ज्ञान स्वरूप आत्मा का जब स्वाद
ले लिया तो फिर मन कभी अपने स्वरूप से चलायमान नहीं होता जहां
स्वरूप का ज्ञान हुआ वहां मन-मन का ही काम हो जाता है इसलिये निश्चय
ज्ञान का स्वरूप जो आत्मा का स्वरूप सो ज्ञानी को प्रत्यक्ष है अज्ञानी को
प्रत्यक्ष नहीं, ज्ञानी को आत्मा सब से भिन्न है भास, मन से परे केवल ज्ञान ही
केवल ही ज्ञान का नाम आत्मा सो रूप, ज्ञान ही सब कुछ ज्ञान ही सब का
प्रकाशक प्रकाशक को सब कुछ ज्ञान का स्वरूप सो ज्ञान रूपी नेत्र से सब कुछ
जान के विस्तार से भिन्न हो कर स्वरूप रस को एकाग्र चित कर ज्ञान रूपी
अमृत पी रहा, ज्ञान का स्वरूप सम्यक् ज्ञान सो एकाग्र चित कर
सम्यक्त्व ज्ञान सो ही सब भांति से प्रत्यक्ष हो जाता? जब ज्ञान ही सब का
सब भांति त्याग करे? मन को सब से हटाकर ज्ञान केवल ज्ञान का रस पी कर
ज्ञान स्वरूप मन सब का त्याग कर एक ज्ञान ही स्वरूप सो ज्ञान का स्वरूप
जब सो प्रत्यक्ष आत्म स्वरूप है, सो! जब यह जान लिया तो संशय किस बात का
केवल ज्ञान स्वरूप ही सब का सब जान कर सब का सब त्याग कर केवल ज्ञान ही
रस ज्ञान ही सब कुछ रस पी कर एकाग्र स्वरूप रस ज्ञान होकर केवल रहता है?
स्वरूप के स्वरूप प्रत्यक्ष तो केवल ज्ञान प्रकाश सब का त्याग प्रकाश ही
केवल ज्ञान स्वरूप, सब का त्याग सम्यक्त्व है, सम्यक् प्रकाश केवल ज्ञान ही
सब कुछ सब का त्याग जो ज्ञान सो ज्ञान, केवल ज्ञान ही सब ज्ञान सब का न
प्रकाश त्याग सो त्याग सो सब का सो ज्ञान प्रकाश सम्यक्त्व सो सो त्याग ज्ञान
सम्यक्त्व सो त्याग ज्ञान सो सो त्याग सब सम्यक्त्व सो त्याग केवल त्याग सो ज्ञान
है!
जब ऐसी बात है, केवल सो त्याग सब केवल त्याग सो सम्यक्त्व सो ज्ञान?
ज्ञान त्याग सो, केवल त्याग सो त्याग सो ज्ञान सम्यक्त्व सब सो सम्यक्त्व ज्ञान
सब केवल ज्ञान सम्यक्त्व सो त्याग है? त्याग सब सम्यक् स्वरूप! सम्यक्त्व ज्ञान व
ज्ञान सो, केवल सम्यक्त्व ज्ञान सम्यक्त्व सब त्याग स्वरूप सो सो सब ज्ञान सब
ज्ञान त्याग सो सम्यक् सब ज्ञान सब सो सब त्याग सब सम्यक्त्व सब सब त्याग
त्याग सम्यक् सम्यक्त्व सो सब त्याग सो त्याग सब त्याग सम्यक् सो सब त्याग सो
सब सो सब ज्ञान सो त्याग त्याग सो सब त्याग सो त्याग सम्यक्त्व ज्ञान त्याग सो सब
सब त्याग सम्यक्त्व त्याग सो व केवल त्याग सम्यक् त्याग त्याग सम्यक्त्व,
त्याग सम्यक्त्व, त्याग सब, त्याग सब त्याग सो सो, त्याग त्याग सब, त्याग
त्याग सम्यक्, त्याग त्याग त्याग, त्याग त्याग सो सो सो, त्याग सम्यक्त्व सो
त्याग सब, त्याग सम्यक्त्व त्याग--सो सो त्याग सब सो सो त्याग सब सब त्याग
त्याग सो सब त्याग सम्यक्त्व सो सब त्याग सब त्याग सम्यक् सम्यक् सो सब
सब
सम्यक्त्व सो, सब त्याग सो त्याग त्याग सो त्याग सब, सब त्याग सो सो सो
त्याग सो सब सो सम्यक् सो त्याग त्याग सो सब त्याग सब सब सो त्याग सो
त्याग सो सब सम्यक् सो सो सो त्याग सब सो सब सम्यक् सो सम्यक्त्व सब सब
सम्यक्त्व त्याग त्याग सब सो, सो सो त्याग सब सम्यक्त्व सो सम्यक्त्व त्याग सो, सो सो
त्याग त्याग सब सब सो, सो सम्यक् सो सब सम्यक् सब सो सब सब त्याग सो
सब सब सम्यक्त्व सो सब त्याग त्याग सब सब, सो सब त्याग त्याग सब
त्याग, सो सम्यक्त्व त्याग सो व त्याग सब सम्यक्त्व सब त्याग सो त्याग त्याग सो
सब सब सो त्याग सो सो सम्यक्त्व त्याग त्याग सब सो त्याग त्याग सब सम्यक्त्व
सम्यक्त्व सम्यक्त्व
त्याग त्याग त्याग सो त्याग त्याग त्याग त्याग सब सो सो सम्यक्त्व त्याग सो,
सो त्याग सब त्याग त्याग त्याग सब सो सम्यक्त्व त्याग सो, सम्यक्त्व त्याग सो,
56
सम्प्रदाय प्रत्येक का, प्रत्येक अपनी-अपनी बात कहता आया पर बात किसी एक तक सीमित नहीं रहेगी
केवल अमुक सम्प्रदाय का प्रचार तथा साक्षात्कार किया तो उससे क्या सबका उद्धार कल्याणकारी हो
सकेगा केवल समाज का भला बिना सार्वभौमिक न्याय के नहीं होगा न्याय केवल ईश्वर का ही नहीं,
यह न्याय मानव धर्म का पहला कदम माना जाता क्योंकि यह सब कुछ न्याय ईश्वर कृतिक केवल
मानव जाति तक सीमित किया गया, इसलिये वह, सार्वभौमिक न्याय सब तक नहीं पहुंच सका
इसलिये सब का सब अधूरा रहा।
यह विचार सब का सब अधूरा था, अधूरा ज्ञान लेकर चलना कठिन होगा जो केवल
काल्पनिक पर टिका था इसी के बल कुछ समय पहले तो वह सबने अपना विचार प्रस्तुत किया,
सार्वभौमिक विचार, एक विचार, जो ईश्वर, पर चलता केवल उसी का ज्ञान सब को होना था
प्रत्येक जन ईश्वर को आज तक खोज नहीं पाया क्योंकि वह समाज के किसी रीति-रिवाज तक
सीमित था उसे जब सब का पद रूप समाज कहता था, तो समाज ईश्वर, परमात्मा तक
ही रह गया इस से आगे सोच--जो प्राकृतिक विचार था--उसका ज्ञान केवल आत्मिक
विचार तक सीमित माना गया उसी के आधार स्वरूप रहा, न्याय पर विचार करना भूल
गया जो न्याय सब केवल एक विचार के आधार प्राकृतिक व्यवस्था रहा, न्याय का अर्थ
केवल, सब सबका न्याय रूप आत्मा का ही रूप न्याय रूपी प्रकृति के आधार से दिया जा
जा सकता था इसी विचार रूप सब को प्रकृति का विचार माना गया, प्रकृति न्याय रूप
विचार मानव का अधिकार रूप से सामाजिक न्याय रूप दिया गया सब को न्याय का
विचार प्राकृतिक न्याय व्यवस्था रूप स्वीकार किया गया ताकि सब को न्याय मिले, वह भी न्याय
जो न्याय ईश्वर का, प्राकृतिक न्याय जिसे सब स्वीकार करते आये हैं! सब को
अधिकार था सामाजिक न्याय का, सब अधिकारिक रूप सब कुछ मिला था, सब कुछ किया
था, पर न्याय रूप सब कुछ रूप व्यवस्था का न्याय रूप ही सब समूचितरूप से चल सका
सब समूचे रूप में सब का अधिकार था प्रकृति का जो सब अधिकार का ज्ञान रहा
अतः सब का न्याय का ज्ञान, प्रकृति का रूप न्याय रहा! न्याय मिला! प्राकृतिक
का स्वरूप ही न्याय कहा गया, प्रकृति का न्याय ही सब कुछ देखा गया मानव केवल
नाम, आज व्यवस्था समूचरूप से सामाजिक न्याय पद्धति पर टिका था केवल
केवल न्याय रूप मानव समाज दिखा
सब अधिकार मानव के अधिकार का ज्ञान प्रकृति के स्वरूप विचार पर ही सब कुछ
आधार, ज्ञान आज सब रूप का प्रकृति का स्वरूप, सब को सब अधिकार का
आधार, सब को सब अधिकार का अधिकार रूप विधि-विधान दिया जो न्याय व्यवस्था
द्वारा दिया, सब मानव जाति व्यवस्था स्वरूप के आधार पर टिका।
सब कुछ का ही न्याय टिका था, जो न्याय टिका था वह... न केवल ईश्वर कृत
था ना सब न्याय दिया गया था न्याय के आधार पर जो कि सामाजिक का विस्तार किया, जो
सामाजिक रूप से सम्प्रदाय के आधार, पर सब सम्प्रदाय का भेद भाव मिटाकर
किया व्यवस्था के सब रूप विचार आधार पर ही न्याय रूप सब कुछ दिया गया न केवल
दिया गया बल्कि सब विचार को न्याय रूप में सब समूचे न्याय रूप व्यवस्था का सब कुछ
न होकर यह सब न रूप विस्तार रूप से न्याय का आधार सब तक पहुंचाया
समाज केवल न्याय के बल सब कुछ टिका हुआ केवल प्रकृति के ही न्याय स्वरूप
केवल विस्तार पाया जिसका परिणाम, न्याय को रूप हर सब को सब तक पहुंचा गया
रीति-नीति केवल यह थी, कि सब मानव का स्वरूप सब मानव का न्याय का ही
रूप मिलेगा
सामाजिक न्याय रूप, मानव के जीवन का स्वरूप सब सब तक न्याय का
मार्ग खुल रहा व्यवस्था किस रूप न्याय देगी?
"यह न्याय हर घर अधिकार रूप दिया गया"
न्याय का यह विचार सब जन के अधिकार रूप दिया था, व्यवस्था सब
न्याय पर टिकी
"न्याय मिला, जो न्याय सब का अधिकार रूप मिला था, न्याय का नियम भी स्वरूप
आज का सब तक अधिकार का न्याय रहा"
प्रत्येक समाज को हर स्वरूप समाज के व्यवस्था तक पहुंचाया गया न्याय का रूप
स्वरूप केवल ही सब का अधिकार न्याय रूप सम्प्रदाय माना जाता रहा जो
केवल, न्याय का सम्प्रदाय तक ही सीमित न होकर न्याय का स्वरूप हर सब
व्यवस्था न्याय के रूप आधार माना स्वरूप व्यवस्था आज सब तक ही न्याय
व्यवस्था का रूप मानव स्वरूप सब का न्याय रूप सब का अधिकार सब मानव रूप से
सब को सब स्वरूप रूप सब रूप सब का हर रूप में एक रूप न होकर प्रत्येक
का ही स्वरूप का न्याय सब कुछ मानव स्वरूप सम्प्रदाय सब सब सब को
57
विषयासक्ति का अन्त, मन स्थित होने पर होता, मन का निग्रह रस रूपी ईश्वर
का हो तो, जीव रस रूपी मन पाएगा
इसलिए जीव के स्वरूप परमात्मा के नाम रूपी नौका को ही सार जान
राम-नाम रूपी नौका द्वारा ही संसार के दुख रूपी सिन्धु पार होने का यत्न कर।
विचार करके अपने स्वरूप रूपी दीपक को जला ले ताकि तू भव रूपी तम का अन्त
करने में समर्थ हो सके। जिस तरह तू दीप से तम को नष्ट करके अंधियारे
स्थान में प्रकाश रूप विभूति पाता है, इसी तरह तू भी आत्म ज्ञान द्वारा परमात्मा
रूप निज स्वरूप पहचान कर, जो कि तुम्हारा ही रूप है, जिसे तू जग रूपी भ्रम
के भ्रम भुलाये हुए था, सत-ज्ञान रूप दीपक जला कर ईश्वर के ज्ञान रूपी धन,
सत्य सुख रूपी परमात्मा को पा ले।
सत्य ही सब जग का सार है। इस संसार रूप-रंग में जो सत्य स्वरूप
प्रभु सर्व-व्यापक रूप में बसा हुआ है उसे जान-बूझ कर भी जीव, भ्रम
में पड़ कर उस सत्य स्वरूप प्रभु से विमुख हो कर इस नश्वर जग में रत रहता
है। जिस से यह जीव सुख के स्थान पर दुख रूपी कर्मों का फल भोगने को
विवश होता है।
जीव को यह सब जग व जीव के सब रूप अपने ही परमात्मा स्वरूप का ही
रूप सब ओर दिख रहे हैं। परमात्मा तो सब आत्माओं का, सब जीवों का सार रूप
परम पिता सब का सब कुछ आधार रूप है। फिर भी जीव नश्वर जग के रंग-
रूप भ्रमों द्वारा अपने मन-बुद्धि को भर कर ईश्वर स्वरूप सत्य रूप को नश्वर
समझ के परमात्मा स्वरूप प्रभु आत्मा को छोड़ कर भ्रम रूप में रत, सब ओर
भ्रम ही का रूप देख रहा है। इस ओर ध्यान दो।
जिस तरह गगन रूपी सत्य को जब घटा रूपी जल से भर कर बादलों द्वारा
घिरा देखकर हर कोई यह तो जान ही जाता है कि गगन सर्व रूप में व्यापक
होते हुए घटा-घिरे रूप में कभी-कभी जल बरसा कर शीतलता प्रदान करता
है, न कि गगन सर्वदा वर्षा ही करता रहता है। वैसे ही यह देह भी कर्म
रूपी वासना के अनुसार प्रभु रूपी आत्मा को घटा के समान घेरे हुए है।
जिस तरह घटा अपने समय पर बरस कर समाप्त हो जाती है और फिर गगन
का ही रूप रह जाता है, वैसे ही यह देह भी अपने कर्म रूप वासनाओं को समाप्त
कर अपने देह रूपी घटा को समाप्त करके आत्मा रूपी सत्य में लीन हो
जाती है।
जिस तरह यह गगन सब को अवकाश या सहारा तो देता है पर स्वयं
न तो किसी के सहारे है और न ही किसी से सम्बद्ध है। उसी तरह से यह प्रभु
भी सब का आधार है, पर वह किसी का सहारा नहीं, न किसी रूप में लीन
होता है। जिस रूप में परमात्मा, उसी रूप में वह जीव आत्मा रूप घट में वास
करता है, जो सब को आधार देते हुए भी सर्वदा निर्लेप रहता है।
जिस हेतु कहा--
घट घट में विराजे राम, वो तो जाने सब का हाल।
जो नित्य चेतन आनन्द रूप ही हर एक घट में वास करता हुआ भी
कभी लय को प्राप्त नहीं होता, उस के रूप सत्य रूपी आत्मा को जान
कर, उस में लय होने रूपी सत्य ज्ञान को प्राप्त करके ही जीव, अमर हो जाता
है।
जो आत्मा घट-घट में व्यापक है उसका रूप ही परमात्मा स्वरूप है,
जो व्यापक रूपी आत्मा के स्वरूप को समझ कर जानेगा, वही तो ज्ञानी कहा, न व जीव
कहा, न प्रकृति स्वरूप घट स्वरूप को जान आत्मा स्वरूप ज्ञाता रूप में हो
गया। ईश्वर रूप घट ज्ञान रूप में लीन होना चाहिए।
केवल यह ही जान लेने से कुछ फल नहीं निकलता किंवा केवल ज्ञान,
जो मन का भ्रम मात्र है, यह तो केवल बुद्धि ज्ञान
अनुभव के प्रकाश से, कर्म के प्रभाव द्वारा होता है, जो कि सत्य ज्ञान
है, जिसका फल केवल अनुभव से ही जाना जाता है। इस लिये जीव! तू केवल
शाब्दिक ज्ञान में न रह! इस पर भी विचार कर कि सत-ज्ञान, सत्य ज्ञान
क्या? जिसमें कोई संशय अथवा भ्रम का लेश मात्र न हो, जिसमें सब कुछ
स्पष्ट
दिखाई देता, प्रत्येक समय, प्रत्येक अवस्था में दिखाई देता सत्य ज्ञान
क्या है? उस को जान, उस स्वरूप को प्राप्त करके ही तू अमर सत्य रूप
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59
समाज का जन-बल उनके साथ हो सकता था, राज्य व्यवस्था अत्याचारी शासक
के कारण प्रजाजन संगठित होकर राज्य की व्यवस्था उलट-पुलट कर देते
कंसराज का समय था, जो मथुरा का शासक, जो बड़ा प्रतापी व सौ चार अक्षौणी
सेना का, आठ लाख बावन हजार सौ चौरासी हाथी उस राजा के पास सेनापति थे। सौ चार
सेना का, दो लाख सत्रह हजार सौ बीस प्यादे थे, जो राजा के पास में जन-बल था
सेना बल था, जो अत्याचारी शासक हो गया था, जो अत्याचार कराया करताथा
प्रजाजनों पर अत्याचार कर रहा था।
जब ऐसा था, तो श्री कृष्ण भगवान् सारे समाज संगठन बनाकर संगठित हो गये... तो
कंसराज मारा गया और फिर उसके उपरान्त कंसराज का भाई था, जो कंस का ससुर था वो
सौ चार सेना थी?
उसने हमला किया, "जो मार पड़ा सो तो गया ही, पर उस अत्याचारी के स्थान
पर वो, जरा संध आ गया।"
उसने जरा संघ को भेजा, जो बड़ा पापी व दुष्ट
वो कैसा राजा कहलाया ? हाँ, उसने अट्ठारह सेना युद्ध लड़े और मथुरावासियों
सेनाओं को पराजित तो किया तथा मथुरावासियों को दुःखी कर दिया क्योंकि बार
बार आक्रमण किया और फिर सेना क्षय हुई, नर, नारी, प्रजा, बच्चे, भूख, प्यास
छटपटाने लग गये।
फिर श्री भगवान् वासुदेव विचार करने लग जाते हैं, अपने मनमें कि, प्रजाजन
दुःखी हैं, प्रजाने किस कारण जन्म लिया कि संकट सह सके? सब के सब भूख प्यास
चिन्ता सब संकट भोगते हैं। सब को सौ बार तो जन्म नहीं मिला है, इस वास्ते
इस जगह को त्याग दिया जाय। तब वो सब को साथ ले गये और मथुरा को खाली
कर के द्वारका जा कर के बसाया। सब को साथ ले गये। द्वारका नगरी बसाई, तो वो जो
द्वारका नगरी बस गई उस पर भी जरा संघ ने कई बार चढ़ाई की परन्तु वो पराजित
हुआ।
भगवान् को चिन्ता तो हर दम बनी रही समाज सुधार और राष्ट्रधर्म रक्षा की।
कंसराज को तो मार-कर निष्कंटक राज्य चलाया, पर पाण्डवों अथवा उस समय के
राजा आपस आपसमें, सब लड़कर भस्म हो गये। कौरव, सब आपस में लड़ पड़े
और छल-बल, कपट-बल, छल-कपट नीति से, जो पाण्डव राज्य धर्म अनुरागी तथा धर्म
के ही पक्षपाती? पाण्डव, धर्म पक्षपाती कहलाये, सब पाण्डवों का यश था धर्म व
न्याय, पर दुष्ट कौरवों ने सब राज्य छीन लिया, तो भगवान् वासुदेव दोनों को न्याय
नीति से समझाना चाहा व चाहाकि वो आधा राज पाण्डवों को देदें, तो
पाण्डव अपना राज करलेंगे, पर उन्होंने नहीं दिया।
उस महाभारत संग्राम-स्थल में जब अर्जुन--उसने देखा दोनों ओर अपनी सारी
रिश्ते नातेदारी को व अपनी वंशीयता बन्धुता को और वह सब सम्बन्धी थे पाण्डवों कौर-
वोंके सगे भाई; कोई ताऊ, चाचा, भाई, भतीजा, सब ही थे, अपना गोत्र एक था,
सो सब को मारा, सबको देखकर, अर्जुन ने अपने मनमें बड़ा भारी संशय किया
विचार किया जिससे उसका हृदय जो पिघल गया--अर्जुन, रोनेलगा।
तो यह बात तो भगवान् ने, अर्जुनको समझाते हुए तो कही थी, कि
महा बलशाली महाबली क्षत्रिय तू बन कर आया है! तू रणमें आ कर सब को मार कर
विजय कर, यश लाभ कर व राज्य कर या निष्कंटक राज्य कर!
भगवान् श्री वासुदेव सब को एक देखना चाहतेथे, प्रजा को एक
बनाना चाहतेथे निष्कंटक तो करना चाहते ही थे कि सब धर्मानुयायी बनें या एक
ही धर्म पर आचरण करें सब सत्य धर्म का पालन करें और फिर, जो अनाचारी
पापाचारी हैं उनका विनाश हो और निष्कंटकराष्ट्र बन जावे ताकि प्रजा धर्मानुसार
अपने मन धर्म और अपने कर्म को करने लग जावे। उस समय श्री वासुदेव भगवान्
को परमपिता परमात्मा रूप माना गया।
भगवान् वासुदेव के जीवन की जो कथा है, सो सदा समाज के लिए सब ही
युग में मार्ग दर्शन का काम कर सकती है। सब के लिए धर्म की ही शरण एक ही
भगवान् का काम है। पाण्डवों के धर्म व राज्य नीति मर्यादा की रक्षा माता-पिता
समान होकर भगवान् श्रीकृष्णने निभाई है। उन्होंने देखा, जब अर्जुन मोह-माया में
ग्रस्त हो गया, जिसने रण में गाण्डीव फेंक व रो पड़ा। तब दयालु रूप व धर्म
स्वरूप बन व मित्र का धर्म निभा कर उपदेश दिया कि, रणमें मोह क्षत्रियों के
योग्य न हो कर रण का धर्म क्षात्र-धर्म ही सब कुछ बतलाता अन्याय विनाश ही सब
कुछ सब धर्म कर्म कर्तव्य जान जीवन का हर कदम उठाना ही धर्म
60
प्रणीता ही यह कथा आज तक परम्परा से सब देश और सब कालके साधक पाते रहे,
इस प्रकार महाराज श्री व्यास और शुक मुनिप्रवर प्रणीत श्री व्यास और शुक
प्रणीता ही यह कथा आज तक परम्परा से सब देश और सब कालके साधक पाते रहे,
पर कलियुग जीवविमर्ष को पाकर, श्री शुक जी महाराज अपनी असीम कृपा और
करुणासे श्री वृन्दावन के निकुञ्ज में श्री राधिका चरणाशरण नित्यविहारी श्री स्वामी
हरिदास जीके रूप में प्रकट होकर प्रेमस्वरूपा प्रिया प्रियतम की अभिन्न रस रूपी इस लीला
रसको जगत्के प्रेम रसिक जीवों को पुनः देने के लिये अवतीर्ण होकर संगीत साहित्य
के साथ गाया।
जिसमें उस लीला का नाम नित्य रसोपासना कहकर, प्रिया प्रियतम नित्य रस रूपमें
विराजते हैं जिनका नाम श्री बिहारी बिहारिनि जी का रूप हुआ, जिसकी यह अष्टयाम
की लीला विशेष प्रसिद्ध हुई? इस उपासना पद्धति का ही आधार पर संगीत के
शास्त्र का वितान इस प्रकार स्थापित हो गया जिसे सब जन आज कल भी जानते हैं।
जिस प्रकार श्री व्यास, शुकदेव और अनन्य रस रूपमें इस ही कथा का गान है, तो
सत्य ज्ञान स्वरूप हुआ।
यहाँ यह जान लेने की बात ध्यान देने योग्य है कि इस कथा में कहीं भी विरह
या संकोच और संशय की बात नहीं कही गई। यहाँ जो स्वरूप है, वह एक व अखंड
ही रस रूप में है जो कि इस बात को सिद्ध करता है। अतः यहाँ श्री--जी स्वरूप स्वामी
हरिदास-जीने इस कथा को जिस रूप में गाया उसे हम कह सकते हैं कि शुद्ध प्रेम,
राग रस, राग-रंगमयी रस, रस-रस रूप, अनन्य रस, जिसमें रस ही रस भरा हुआ है
जिसमें न तो किसी प्रकार की कोई वासना का अंश मात्र भी स्थान पाता है और जिसका
नाम केलिसौभाग्यसुख के नाम से कहा गया है जो सदा सत्य ही सत्य
इस प्रकार भागवत के सब रस रूप तथा अन्य सब कथाओं में भी यह स्वरूप व रस
समझाया जाकर स्पष्ट हो जाता जिसका कारण इसका नित्य रूप रस स्वरूप एक रस है,
कि यह उस रस की बात नहीं जिसे हम और तुम मन से जान वा कहते हैं, इसलिए इस रस
मयी कथा का आदर इस रस को ही जान कर किया गया है कि, जिससे कल्याण ही
सदा रहे।
इस प्रकार ऊपर की कथा को पढकर, समझ कर अपनी श्रद्धा भाव को दृढ करके
श्री जी के रूप को समझ कर, जिसे स्वामी हरिदास जी ने इस रूप में आस्वादन कर
सत्य कथा रूप में जन को दे दिया, जिससे सब जन को इस रस का ज्ञान हो जाय कि
यह कथा केवल श्री युगल रस-स्वरूप की स्वरूप है जो कि अनन्य-शरण में रहने
वालोंको सदा ही रस प्रदान करती, जिससे किसी जीव व भक्त के हृदय में इस प्रकार
का कोई संशय कभी उत्पन्न नहीं हो सकता, जिससे अज्ञानजनित अन्धकार
सदा मिटकर श्री स्वरूप का ज्ञान सदा-सदा रहकर, इस परम पावन रूपका,
जिसमें सब सुख का आधार है वह हृदय में प्रकाश कर देता है।
यद्यपि यह कथा आज काल के इस कलिकाल में विस्तार पा चुकी है तथापि
इस बात का ध्यान सदा रखने की आवश्यकता है कि मन को इस ओर स्थिर रख कर
सदा ही इस बात ध्यान रखना चाहिये कि यह कथा केवल सत्य ज्ञान रूप केवल
ज्ञान रस स्वरूप-ही, सब प्रकार व स्वरूप सहित इसका लाभ ले लेना और अपने
हृदयको इस रस रूप में रख कर, काम-क्रोधादि अन्य विकारों को त्याग देना
जिससे कल्याण का मार्ग सुगम होकर सब प्रकार के आनन्द को देने वाला यह
पावन भाव सब जन स्वीकार कर ही लें यही सब जन का भी धर्म बनता।
अतः इन बातोंको जानकर ही इस बात को जान लेने की चेष्टा सब जनको
करनी ही चाहिए कि जिससे कि मनुष्य जन्म सफल हो जाय क्योंकि यह साधन ही
ऐसाहै, जो साधन से साध्य के रूप में बदलकर सब को इस पार से उस
पार करनेवाला स्वयं व समर्थ है, जो सदा कल्याणकारी ही हो कर सब कल्याण
साधक के समक्ष प्रत्यक्ष रूप इस प्रकार कर देता है कि जिसके द्वारा सब काम सिद्ध
संसारके बन्धनों से छूट कर मनुष्य उस परमेश्वर तथा सर्वेश्वर रूप में मिलकर व
उसका रूप बन कर अमर हो जाता है तथा जिससे संसार में कोई भी वासना व
कामना उसके सम्मुख आ ही नहीं पाती जो कि सब बन्धन को उपस्थित कर देवे। इस
ही विचार को मनमें रखकर, अपने सब कर्मों को निष्काम रूप करनेके लिए सदा
तैयार रह कर सब जन इस पावन कथा श्रवण और पठन कर मनको शुद्ध कर प्रभुके
ही स्वरूप में ही स्थिर करनेका यत्न करते ही रहें जिससे कि यह देह भी सफल हो
सकती है और अन्य साधन इसके लिये व्यर्थ ही हो जाते हैं, काम, क्रोध,
लोभ, मोह, मद, मत्सर, काम भाव, यह सब सदा सदाके लिए मिट कर प्रभु का रूप
मन धारण कर।
61
जीवन का यह क्रम चलता रहा और एक दिन ऐसा आया जब सब लोग घर को लौट आये।
सब लोग तो अपने अपने काम में लग गये परन्तु नन्दू उदास रहने लगा। उसका मन किसी
भी काम में नहीं लगता था। वह दिन रात अपने कमरे में बन्द हो कर या तो रोता रहता
अथवा सो जाया करता; किसी काम की ओर उसका ध्यान नहीं जाता था। घर के
सभी लोग बहुत
चिन्तित हुए पिता, माताजी को, चचेरे भाई, बहनों को, सबको ही चिन्ता व्यापी
कि नन्दू को क्या हो गया है। सब लोग चिन्ता करते थे, दया करते, प्यार करते थे।
सब लोग उसके लिए सब कुछ कर देने को तय्यार थे पर नन्दू की उदासी को कोई न हर
सका, न कोई उसका मन मोड़
सका। सब के ही मन टूट चुके थे। आशा की कोई किरण नहीं दिखाई देती थी
किन्तु नन्दू की बड़ी भाभी शान्ता अपने ही ढंग की औरत थी। उस ने हार न मानी
उसकी समझ में आ गया था। उसने नन्दू के जीवन को एक नया मोड़ देना चाहा-
जीवन की एक नई दिशा में।
वह दिन रात यही सोचती कि कैसे नन्दू को इस हाल से बाहर निकाला जाय।
उसने कहा, 'मैं तो इस नौजवान लड़के को ऐसे नष्ट नहीं होने दूंगी। नन्दू
वास्तविकता जानता नहीं, उस को पता ही तो नहीं चला कि जीवन कितना प्यारा है।'
'लेकिन किया क्या जा सकता है?' यह बात सब सोचते थे। कोई उपाय नहीं सूझ
पड़ता था, पर जब एक दिन, जब नन्दू अपने कमरे में उदास लेटा हुआ था। शान्ता
नन्दू के कमरे में गई और उस ने कहा, 'नन्दू बाबू! जरा उठो तो, बहुत दिन तुम
चिन्ताओं में पड़े रहे, अब इन बातों को छोड़ दो। आज हम बगीचे में सैर करने
चलेंगे। चलो, अपने कपड़े बदल लो।'
नन्दू भाभी की ओर देखने लगा। उसकी समझ में कुछ न आया, 'भाभी यह क्या
कह रही हैं?' नन्दू शान्ता भाभी का बड़ा आदर करता था, वह इनकार न कर सका
और उठ कर बैठ गया। भाभी को उसने कहा, "लेकिन भाभी, मेरा जी तो कहीं नहीं जाता,
मेरा मन किसी काम में नहीं लगता, तुम मुझ पर दया करो।"
पर शान्ता कब सुनने वाली थी। नन्दू को हाथ पकड़ कर जबरदस्ती उसने
उठाया और बाहर ला कर, उस गाड़ी में बिठा दिया जो पहले से ही तय्यार खड़ी थी।
दोनों जन बगीचे में पहुंच गये। शान्ता नन्दू को हर प्रकार से खुश करने लगी।
शान्ता ने कहा, 'आज तो हम दोनों इस बगीचे में एक खेल खेलेंगे, जिसमें जो जीतेगा
उसको जो वह चाहेगा दिया जायगा। मैं तो जीतूंगी और हारोगे तुम, क्योंकि तुम तो
पहले से ही हिम्मत हार चुके हो।'
नन्दू के मुंह पर हल्की-सी हंसी आ गई। उस ने कहा, 'भाभी मुझे तो इस खेल का
कुछ भी पता नहीं है।' नन्दू शान्ता के व्यवहार को देख कर हैरान हो रहा था।
शान्ता ने उस की हंसी को देखा तो उसे बहुत सन्तोष हुआ। उस ने नन्दू के हाथ में
एक रैकेट थमाया और अपने हाथ में रैकेट ले कर बैडमिण्टन खेलना शुरू कर
दिया। खेल में नन्दू की
रुचि नहीं थी, लेकिन भाभी का आग्रह था। थोड़ी ही देर में नन्दू खेलने में मस्त हो गया।
खेल समाप्त होने पर शान्ता जीत गई। शान्ता खुश थी और नन्दू भी प्रसन्न था।
शान्ता बोली, "नन्दू तुम हार गये, अब मेरी शर्त पूरी करो। तुम्हें मुझ
को पार्टी देनी पड़ेगी।"
नन्दू ने कहा, 'पार्टी तो मैं दे दूंगा पर किस प्रकार की?' फिर दोनों एक अच्छे
से होटल में गये। दोनों ने मिल कर चाय पी, वहां शान्ता नन्दू को बहलाने
का पूरा प्रयत्न करती रही और इस में वह सफल भी हुई; नन्दू के मुख पर एक मधुर
मुस्कराहट खिल गई। दोनों देर तक होटल में बैठे रहे। शान्ता नन्दू के मन को
तरह-तरह से बहलाने में लगी रही। नन्दू को ऐसा लगा मानों वह जीवन की एक नई
राह पर आ गया है। नन्दू ने शान्ता से कहा, 'भाभी! आज मुझे बहुत दिन बाद
ऐसा लगा है कि जीवन में कुछ रस बाकी है।'
"यदि तुम चाहो तो जीवन में बहुत कुछ रस है, लेकिन जीवन को समझना पड़ता
है। जीवन को रो-रो कर नहीं काटा जाता। यह जीवन ईश्वर की अमूल्य देन है, इसका सदुपयोग
होना चाहिए। तुम एक अच्छे गायक हो। मैं यह चाहती हूं कि तुम अपनी गायकी
को चमकाओ। संगीत की साधना करो। इस से तुम्हारा समय भी कटेगा और मन भी प्रसन्न
रहेगा।"
शान्ता की बातें नन्दू को बहुत अच्छी लगीं।
62
साधक स्वभाव अनुसार आत्मीयता बढ़ाते हुए उस दिव्य मण्डल
पहुँचते समय स्वाभाविक रीति धारण करता हुआ भगवान्
की दिव्य सेवा में लीन व मुग्ध हो जाता है।
किसी समय भक्त यह भी अनुभव करने लगता हैकि 'हाय, भगवन् का दर्शन
मिलेगा भी; भगवन् का साक्षात् तो दुर्लभ है, दर्शन असम्भवप्राय लगता है, दर्शन की बात
छोड़ ही दो, केवल सन्तोष ही हो, केवल चिन्तन का रस मिलता रहेगा क्या,
आश्वासन भरा जीवन होगा, कब आश्वासन मिटेगा कि, 'शाम तक तेरा साक्षात्कार
कराऊँगा ही, शाम तक तेरा भाव साकार स्वरूप बना कर दे दूंगा, पर शाम कब तक होगी पता
नहीं। जीवन बीतने पर अथवा सौ जन्मों बाद होगी, कुछ निश्चय नहीं हो रहा, केवल
सांत्वना ही मिलती जा रही है, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह, कब यह
आशा और भय से त्रस्त हुआ भक्त, यह भी सोचता है, उस प्रभु शरणम् के दर्शन क्या
होंगे, दर्शन होंगे भी नहीं, वह प्रभु भी इस भाव दशा को
देखता होगा क्या? सुनता होगा क्या?
इस भाव पर वह परमात्मा क्या विचार करता होगा? जिसे पुकारते हैं,
जिसे नमन करते हैं, जिसके प्रति वंदन करते हैं—क्या वह कभी सुनेगा? क्या उसके
पास समय होगा क्या, उस तक शब्द, क्या यह कभी पहुँच भी रहे हैं या नहीं?
भक्त का भाव जब कभी इस प्रकार से नीचे गिरता जाता, नीचे ही गिरता,
भाव हीनता तक कभी कभी पहुँचते पहुँचते वह यह भी सोचता है, कि जब विचार शून्य
स्थिति आएगी तब क्या होगा? इस प्रकार की परिस्थिति के पश्चात् साधक यह सोचता
रहता, उस पर क्या कहें, उस पर बात करने वाले बहुत कम ही इस तथ्य को जानते
हैं। कभी कभी वह नीचे गिरता हुआ आंसुओं से भर जाता है, कभी वह रोते रोते
लोट पोट हो जाता है, जब उसे कुछ बोध
उस भाव को साधक जब तक नहीं अनुभव करता तब तक वह साधना
को, उस समय आने वाली बाधा को नहीं समझ सकता। कभी कभी वह रोता है,
कभी वह खिलखिला कर हँसने लगता है। उस समय उस पर हँसने वालों की भी कमी
नहीं होती। कभी वह एकांत में बैठा हुआ अपने ही भावों में मग्न रहता है।
उसे, ऐसा लगता रहता है?
इस स्थिति में भी उस पर कृपा निरंतर हो रही है। वह न जाने
कब, कहाँ से उस पर कृपा बरसाने लग जाते हैं। कभी कभी, वह
भाव विभोर! हो ही उठ ता, रो ही पड़ता कि हे प्रभु, तू ही सब
कुछ देने वाला और स्वयं को भी दे देने को तत्पर है; कभी
कभी, उस स्थिति में उस पर वह, दया-भाव से, उस पर कृपा भी कर
बैठता, तो वह सोचता, उस पर क्या कहें? उस प्रकार के रस का पान करने
वाला ही उस आनन्द को जान सकता है। उस क्षण, वह साधक केवल रो
ही सकता है।
इस स्थिति में उस, का कोई अन्य भी क्या सहारा बनता होगा? कभी नहीं,
क्यों? क्यों उस अवस्था में कोई भी क्या सहारा बन सकेगा?
इसलिए साधक को ऐसी स्थिति में जब वह रो रहा हो तो उसका क्या
कोई आधार है? उस परिस्थिति में क्या परमात्मा उस पर ध्यान दे रहे हैं?
साधक, उस समय पर, ईश्वर के उस स्वभाव स्वरूप को तो जान ही जाता है
कि ईश्वर दया के सागर, कृपालु, दया के उस रूप को साधक जान ही
लेता है। जब कभी साधक को इस प्रकार रोते देखा जाता है तब उस
समय लोग, तो उस पर दया भाव लाते ही हैं परन्तु ईश्वर उस पर? वह
ईश्वर तो उसे इस प्रकार रोते देखकर भीतर ही भीतर प्रसन्न होता रहता,
उस भाव पर वह भक्त पर उस प्रकार का प्रभाव नहीं डालता जैसा लोग
करते हैं, ईश्वर तो उस, के रो ने पर आनन्दित व इस प्रकार का भाव भरता
रहा, जो उस पर दयावान् हो? कैसा यह, कैसा यह, कैसा यह कैसा भाव इस प्रकार
ईश्वर का देखा।
ईश्वर का यह भाव देखकर साधक भी और अधिक आन्दोलित
होता हुआ अपने भावों को रोक नहीं पाता। कभी कभी तो वह
अपने शरीर का भी भान भूल जाता, कि वह कहाँ बैठा है। ईश्वर
साधक को ऐसी दशा में देखकर, उस स्थिति को और भी आगे बढ़ाता
चला जाता, वह और अधिक व्याकुलता अनुभव करता
63
विचारशीलता विचार करने की क्रियाशीलता का दूसरा नाम या पर्याय है, जिसने मानव
जीवन दिया।
विचार सबसे तीव्र गति से कार्य कर रहे हैं। भौतिक दृष्टि से प्रकाश को सबसे
तीव्रगामी माना, सूर्य की गति को माना गया या ध्वनि तरंगों को पर जो गति तथा प्रभाव
मन तथा विचार का, वाणी का देखा गया वैसा तीव्र वेग या प्रभाव किसी भी अन्य उपकरण
का नहीं।
यह प्रभाव व्यापक या गहरा दोनों स्तरों पर होता है। विचारशीलता जहां होगी, वहीं
सृजन होगा अथवा विनाश विचारशीलता क्रिया-रूप में परिणत होकर जहां होगी, वहां दोनों
तरफ प्रवृत्तियां पैदा होंगी।
जब भी विचारशीलता का रुख सत्य विचार होगा, तब मानव जीवन श्रेष्ठ कार्य में तत्पर
रहेगा, अपने आप स्वयं के प्रति एवं दूसरों के प्रति जागरूक रहेगा तथा उसके व्यवहार में भी
वह बात दिखाई देगी। इसलिए कहा भी गया है... 'मन में सोचे तो सब कुछ पर जब बात मुख
तक आए
मुख से जब शब्द रूप में निकले, वाणी का वह आचरण श्रेष्ठ स्वरूप बने।' जब
श्रेष्ठ कार्य की बात हो, व्यवहार को सुधारने की बात कही जाती है? तब मन हमेशा
उस ओर बढ़ जाता है। यहां पर एक बात कही गई जिस दिशा में चलना है, उस ओर विचार
को मोड़ देना ही उस ओर कदम बढ़ाना कहा जा सकता है। विचार एक दीपक के समान है।
वह जब तक जला रहता है, जीवन के व्यवहार को दिशा देता रहता है। दीपक को बुझा देने
पर या उसका प्रकाश मंद हो जाने पर मनुष्य का कदम भटकेगा, वह राह भूल जाएगा।
इसलिए कहा गया, जब तक ज्ञान रूपी दीपक जल रहा, तब तक विचारशीलता का प्रकाश
दिखाई पड़ेगा। मनुष्य को सद्मार्ग की ओर ले जाना ही दीपक का उद्देश्य है। दीपक के
स्वरूप को समझना होगा, उस ओर ज्ञान रूपी दीपक को जला कर के प्रकाश युक्त बनाना
होगा। जिससे मनुष्य कभी अपने जीवन पथ पर अंधेरा न पाए। भटकन न आए! व्यवहार में न आए!
"जो भी मन शुद्ध विचारधारा युक्त होगा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ कहेगा"
इसका अर्थ यह भी, व्यवहार ज्ञान विचारशीलता पर टिका हुआ होकर मनुष्य आगे
बढ़कर उस विचारशीलता के अनुरूप स्वरूप सामने रखता है। जब मन में विचार ही ठीक
न--होगा जहां अज्ञान रूपी अंधकार का बोलबाला होगा या रहेगा, तो वह शब्द अथवा उस
विचारशीलता का जो फल बाहर रूप में आएगा, उसकी वाणी द्वारा प्रकट होकर जो कर्म रूप में,
उस रूप में नजर आने लगेगा, उस समय मनुष्य क्या कहे और क्या बोलेगा, उसका व्यवहार
किस तरफ जाएगा इसका कोई अंदाजा लगाना बड़ा कठिन होगा।
जब भी विचार मनुष्य, मन से सोचेगा, उस को कार्य रूप आ--कार-रूप-देने
रूप तक पहुंचाने हेतु वाणी का उपयोग कर उस बात को मुख से कहेगा, तो उस
विचारशीलता रूपी वृक्ष रूपी शाखाएं फलती हैं, उनका स्वरूप सब को उस विचारशीलता रूपी
वृक्ष पर नजर आने लगेगा कि फल कैसे निकले हैं।
"जो विचार मन को पूर्ण ज्ञान द्वारा सोचेगा, वह ही वाणी द्वारा श्रेष्ठ
कहेगा"
यह तो विचारशीलता का स्वरूप हुआ, मन का हुआ, पर जो विचार मन तक आया ज्ञान
द्वारा, सो मुख वाणी से भी ज्ञान द्वारा ही प्रकट होगा।
"विचार कैसा ज्ञान रूप में विचारशीलता को दिशा देता ज्ञान होगा, उस विचारशीलता का रुख
उस ओर मुड़ कर वाणी के स्वरूप को श्रेष्ठ बनाएगा या उस दिशा में ले जाएगा"
ज्ञान का यह सारा असर मन की क्रियाशीलता पर और मन की क्रियाशीलता का असर वाणी
रूप मुख पर या वाणी द्वारा जो मुख से निकलता हुआ शब्द रूप में आएगा, उस विचार को
एक विचारवान व्यक्ति ही जान या समझ पाएगा, उस विचार को पहचान पाएगा, जो विचार
ज्ञान से आ रहा होगा, वह विचारशीलता का जो प्रभाव मन पर ज्ञान द्वारा डाला जा रहा
होगा, उस बात को समझेगा।
जब ज्ञान द्वारा श्रेष्ठ विचार का प्रभाव मनुष्य के मन पर पड़ता है, सद्ज्ञान
विचारशीलता की दिशा में ले जाता है, व्यवहार विचारवान बनकर जब बाहर आता है, तो
विचारवान मनुष्य उस बात द्वारा प्रसन्न होगा कि! वह विचारशीलता श्रेष्ठ दिशा का ज्ञान कराती
है। ज्ञान रूपी मन ज्ञान द्वारा प्रकाशित हुआ दीपक ही सब दिशाओं में श्रेष्ठ प्रकाश
फैलाता विचारशीलता रूपी एक ऐसा दीपक होगा, जो दीपक जल कर न केवल विचारशीलता
प्रकाश को फैला रहा होगा, उस ज्ञान द्वारा उस विचारशीलता दीपक प्रकाश द्वारा हर एक
मनुष्य का जीवन प्रकाशित होगा।
विचार ही मनुष्य विचारवान को पहचानता हुआ उस पथ पर ले जाएगा, जिसके वह योग्य
होकर अपने जीवन स्वरूप को सार्थक करने का प्रयास कर सकेगा, जो वह मानव जीवन श्रेष्ठ
64
द-ि-य-ा ग-य-ा ह-ै क-ि म-ा-त-ा-प-ि-त-ा न-े स-न-्-त-ा-न क-े
Line 51:
पालन-पोषण में जो कष्ट सहन किये, उनका बदला सन्तान कभी नहीं चुका सकती। माता-पिता
प-ा-ल-न-प-ो-ष-ण म-े-ं ज-ो क-ष-्-ट स-ह-न क-ि-य-े, उ-न-क-ा ब-द-ल-ा स-न-्-त-ा-न क-भ-ी न-ह-ी-ं च-ु-क-ा स-क-त-ी। म-ा-त-ा-प-ि-त-ा
Line 52:
ने सन्तान को केवल जन्म ही नहीं दिया, बल्कि उसे अच्छा नागरिक भी बनाया।
न-े स-न-्-त-ा-न क-ो क-े-व-ल ज-न-्-म ह-ी न-ह-ी-ं द-ि-य-ा, ब-ल-्-क-ि उ-स-े अ-च-्-छ-ा न-ा-ग-र-ि-क भ-ी ब-न-ा-य-
□□□□ □□ □□□□□□ □□ □□□ □□ □□□ □□? □□□□ □□□, □□ □□□□□□ □□ □□□ □□--□□□`
Wait, let's look at Line 38 (which is line 40 in my previous count, let's recount carefully):
Let's count lines from the top of the second block:
□□□ □□ □□□...(Line 19)□□□□ □□□□...(Line 20)□□, □□ □□□...(Line 21)□□□□□□ □□...(Line 22)□□□□□□□ □□...(Line 23)□□ □□□ □□□...(Line 24)□□ □□ □□ □□...(Line 25)□□□□□□□□...(Line 26)□□□□ □□□ □□□□...(Line 27)□□□ □□□ □□□(Line 28)□□□ □□ □□□ □□...(Line 29)
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68
विचारो करो, उस परमेश्वरने संसार उपकारार्थही बनाया? कि यह संसारका सब पदार्थ वा सारा
संसार व्यर्थ, वा इसके बनाने का फल, कुछ तो उस परमेश्वरको प्राप्त होवे नहीं वा
सकेगा।
क्योंकि सब जगत् को बनाने कि शक्ति ईश्वर-ही विषयमें सदा विद्यमान और विचार भी
उसका विचार-ही विषयमें सदा अथवा सब जगत् के विचार सहित ही विचार सकता है।
जगत् सब सब काल में ईश्वर को विदित अथवा सब काल में विदित है? सब काल वर्तमान
रूप ही वा सब काल जगत् को सदा रूप काल हैं? इस लिये जगत् का भूत भविष्यत् रूप
काल हो सब जगत् सदा है? जो सब जगत् को विचार वा वर्तमान परमेश्वर सदा करता
है तो जगत् को बना सकता ही, न बनावे सो, न परमेश्वर उस जगत्को
बनावेगा, जगत्कर्ता नाम ही न जगत्का हो, सदा काल ही जगत् को जगत्
सिद्ध रहा॥
सो सब काल में जगत्के दो रूप हैं, एक सूक्ष्म सब जगत् का कारण
सो सदा सिद्ध है! जो कोई जगत्के दो रूप को सत्य सब काल में न माने अथवा
ही; जगत्का जो कार्य स्थूल रूप, सदा बने, बिगड़ता रहता है उसको भी नित्य
माने; जगत् के कारण रूप को जो सत्य न माने, सो तो सर्वथा ही अज्ञानी
वा पापी है; इन दो प्रकार के सब बातों को विचार के सब को, कार्य-रूप
जगत् को सब कोई; कर्त्ता सब जगत् का विचार कर सिद्ध करें।
सो सब जगत् का रूप, जो सब काल सत्य है, उस एक--ही ईश्वर कह
सकें ही; जब सब जगत् सिद्ध है, तो सब जगत् ईश्वर--ही सिद्ध सब काल सिद्ध
ही रहा, उस को जो कोई कहे, कुछ हानि नहीं होती; इस विषय और प्रकार भी, जो
जगत् को कार्य-कारण रूप, सत्य--सिद्ध मानें, सब जगत् सब जगत् रूप सब
का सब रूप सब काल में जगत् को ईश्वर को ईश्वर ही सब जगत् कह ही ले,
वा परमेश्वर सबही जगत् हो, तो सब जगत् ईश्वर सिद्ध भया; यथा वेदान्त;
कार्य रूप जगत् को जो सत्य वा असत्य सर्वथा कह भी देवें सो सब जगत् को
काल ही का नाम जगत् सदा ही का कहना सब रहा, उस में; जो विचार कर न देखे, सो
मूढ़॥
सब जगत् सदा ही हो वा न, तो सब जगत् को सब जगत् ही कहना सब को
सो सिद्ध सत्य होता है; ईश्वर को विचार ही क्या; जगत् को ईश्वर ही है; जो
जगत् को ईश्वर का ही रूप सब काल सिद्ध हो गया! सब जगत् सब मिथ्या?
जगत् को बना ही सकता, अहो, जगत् के सब सत्य जगत् को रूप ही
जगत्को सदा सत्य जगत्के ही सब काल जगत् जगत्के सदा ईश्वरका,
जगत्का जगत्कर्ता, जगत्कर्ता जगत्का सब कुछ जगत् को सब जगत् को न कह
सकेंगे वा जो जगत्को वा जगत्के ही विचार सिद्ध हो, सो जगत्को सदा ही
कार्यजगत् जगत् का सिद्ध ही सब रहा सो, जो दो प्रकारका जगत्
जगत्के लिये सदा सिद्ध ही था तो जगत्के जगत्कर्ताओं सब जगत् जगत्
जगत् के स्वरूप सदा ही सब सब जगत्कर्ताओं जगत् जगत्॥
इसके सब जगत् का हो वा सब जगत्, सो तो सब जगत्कर्ताओं सब जगत् रहा,
जिसके सब ही जगत् सदा ही सब ही सब जगत् को ही सब जगत् जगत्कर्ता
सब ही सो सब जगत् जगत्का सदा ही काल है, सो जगत् का विचार॥
सब ही उस जगत् को ही जगत्का सब ही सब जगत्का रहा, जगत्कर्ता को
जगत् सब ही जगत्का जगत् को जगत् जगत् जगत्का जगत् सब जगत् जगत्
जगत् सब ही सब जगत् सब ही सब ही सब जगत् जगत् है; जगत् कर्ता भी
ही जगत् जगत्कर्ता के सब सब जगत् जगत् ही सदा जगत् जगत् सदा ही
सब जगत् सब जगत् जगत्का ही सदा जगत् जगत् के सदा जगत् ही रहा, न
ही, सदा! जगत् के सदा सब ही, सब ही सब जगत् के सब ही जगत् के सब जगत्
ही जगत् के ही सब जगत् सदा! जगत् के सब ही जगत् जगत् जगत् ही
सब ही जगत् के--जगत् जगत् जगत् सदा ही जगत् जगत् सदा जगत् सदा
जगत्--जगत् जगत् के जगत्के सब जगत् सदा सदा, सो ही ही जगत्
जगत् के सदा ही हो! सो ही सो सदा सदा ही, सो ही सदा॥
सदा जगत् सब सब जगत् जगत् सदा सब जगत् जगत् जगत् सदा सब सब
सदा सदा रहा, सदा ही सदा सब सब सदा न सदा सब सदा सदा है?
जगत् के ही सब सब का, सदा सब सब सदा जगत् जगत्, सदा जगत्
सब सदा सदा सदा ही सदा सदा ही; सदा ही सब सदा सब सदा जगत्॥
69
कषाय-भाव सदा ही सब ओर बाधा रूप ही रहे ऐसा नहीं है, किसी समय यह भाव किसी आत्मा
को मोक्ष मार्गका भी साधन बनता ही देखागया
एक व्यक्ति किसी कार्य वश निकला था, उसको अपने ग्राम वापिस लौटने में रात होने
लगी और मार्ग में घनघोर अंधकार छा गया, वह आगे न जा सका; सो वह एक वृक्षके नीचे विश्राम करने लगा, वह
वृक्ष फल युक्त लदा था; अकस्मात ही वायुके तीव्रवेग प्रवाहसे जो, दो चार फल नीचे गिरे
उन्हेंउसने खा, तृप्तिके साथ उस वृक्ष नीचे रात्रि व्यतीत करने लगा और उस वृक्ष का
उपकार मानने लगा कि इस वृक्ष ने मुझे फल दिये; लेकिन यदि फल-वृष्टिसे या, पवन द्वारा वायुके
से उस वृक्ष की एक डाल उसके ऊपर गिर जाती तो क्या वह इसका आभार मानता? नहीं, कभी भी
नहीं मान सकता था, कारण कि उपकारीका उपकार सर्वदा माना ही जाता लेकिन जो किसी को
हानिकारक हो उसके प्रति तो न केवल उपेक्षाका भाव रहता अपितु मनमें द्वेष रहता है।
परिणाम तो परिणामों द्वारा उत्पन्न होता रहता हैऔर यह परिणाम सब जीवों को सुख और दुःख
देता
सो इस प्रकार अज्ञानी जो, जो कुछ करता उसे भला मान बैठता है। इस कारण से, जो
बात वस्तुस्वरूपके सत्य स्वरूप से; विरुद्ध फल देती है उस ओर यह मन क्यों ले जाता है।
सो इस बात बिना जाने ही सब जीव अज्ञान दशा में ही सब कुछ कर रहे हैंऔरमिथ्यात्वके उदय
से ऐसा सोच रहेहैं कि हम बहुत अच्छा कार्य अपने लिए कर रहे हैं। ऐसा सोच कर ही वे इस
बात को नहीं समझ पा रहेहैं कि वेवास्तव में कर क्या रहेहैं
जब यह अज्ञानभाव को छोड़ देगा, तब उसके मनमें ऐसा विचार उठने लगेगा
कि इस बात से संसार बढ़ता है, सो इसमें भी अज्ञानियों द्वारा जो किया गया उस पर
कोई भी यह नहीं सोचता कि अज्ञानियों द्वारा जो कुछ किया गया वैसा कभी भी नहीं, कभी
भी नहीं किया जा सकता था क्योंकि उस समय तो, उनका जो राग भाव था वह न तो, मोक्ष
मार्ग रूप में परिणत हो, वरन् ऐसा विचार करने वाले पुरुष के भीतर न राग-का अंश
न-द्वेष रूप भाव रहेगा!
सो इस अज्ञानदशा में उस जीव को राग ही के वशीभूत होकर ही
प्रवृत्तियाँ हुआ करती... मानो अज्ञानवश ही, राग परिणाम को वह ही कल्याण का ही
मार्ग मानके प्रवृत्त होता है। अज्ञानियों द्वारा किया गया हर एक कार्य अज्ञान, कष्ट,
क्लेश, दुःख दायक, भय कारक होगा, इनके द्वारा किया गया सब राग अज्ञान युक्तही
सो यह बात अज्ञानके ही वश होकर होती है। इस से सिद्ध हुआ, राग भावों-कर्मों
द्वारा कभी! मुक्ति का मार्ग मिल नहीं सकता न होग! ऐसा जो सोच रहे हैंवे भूल रहे हैं
और वे इस बात से सर्वथा अनभिज्ञ ही सिद्ध होतेहैं
पंडित जीका मत, "संसार का जो कारण, सो, मोक्ष का कारण कैसे होगा
अर्थात् राग तो संसारका बीज हैऔर संसार का कारण ही है, मोक्ष का नहीं, इस
प्रकार मिथ्या रूप से भावित कषायों द्वारा मुक्ति रूपी सुख होना, संभव ही नहीं
क्योंकि यह मिथ्या कषाय जीव को संसार में ही भटकाने का मूल कारण बनेंगी"
निर्विकल्प निज स्वरूपमें एकाग्र होवे जीव जब।
मिथ्या भाव मिटे निश्चयसे प्रगटे सम्यग् ज्ञान तब॥
स्वाधीन सहज सुख प्रगटावे दर्शन मोह मिटे जब ही, निश्चय।
कषाय भाव जीव को संसार में ही फंसायेगा, कभी, मुक्ति का कारण न होगा
कभी! यह विचार तो हर किसी को करना ही होगा! जो विचार ही न करेगा, सो,
अज्ञान ही में रहेगा! कषाय का तो फलही संसार परिभ्रमण होगा! मोक्षप्राप्ति कदापि
नहीं होगी
जब यह आत्मोन्मुख होगा तब कषायों मन्दता का परिणाम सहज ही आ
गया, स्वभाव रूपसे ही कषायों मन्द हो गई न क्रिया की दृष्टि से कषायों
मन्दता की ओर जीवका लक्ष्य गया, इस प्रकार का राग स्वाभाविक परिणमन रूप
ही परिणत हो जाता है, कषायों का नाश उस समय सहजही अनायास होने लगता है,
तब कषायों के प्रति अनासक्ति का भाव जाग पड़ता हैऔर जीव, राग से
विमुख होने लग पड़ता है, वह जीव यह भी जान जाता हैकिराग से मेरा कोई
नाता नहीं और राग मुझमें न तो किसी प्रकार सुख रूप फल देने वाला होता और न ही
इस जीव काराग-भाव से कभी भी कल्याण सम्भव हो सकता बल्कि आत्माका
अकल्याण ही है, सो इस रूप जानकर वह अपने को कषायों रहित करने का ही
सतत प्रयास करता रहता है।
इस रूप से जो कषायों मन्द होना कहा हैवह जीव को मोक्ष मार्ग का कारण
कहा जा रहा हैक्योंकि रागका मन्द होना जीव को उस ओर मोड़ने में समर्थ होता
देखा गया सो यह व्यवहृत है; ऐसा केवल मोक्ष प्राप्ति का उपाय समझना ही,
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विचारशीलता हो; यदि यह विश्वास न जगा सकें और ज्ञान व्यर्थ हो, तो ज्ञान छोड़ो, उस
विवेकहीन को पहले मिटो
ऐसा ही पाप इन दस सिर वाले दस भावों का हो रहा था, जो कि राम
विमुख थे, जो कि ज्ञान प्राप्त कर काम रूपी हो गये थे। काम रूपी ज्ञान को ही राम
मारे
दस इन्द्रियों न ज्ञान का विषय तो किया स्वीकार पर ज्ञान को, कर्तव्य
रूप में तो रस न था, रस तो इन दस मुखों को केवल भोगवादी वासनाओं में
था, भोग प्रधान काम बन
काम की लीला--वह जो ज्ञान राम द्वारा न मिला हो काम का स्वरूप ले
लेता, जो ज्ञान प्रभु द्वारा प्राप्त होकर राम रूपी वैराग्य का रूप धारण करता वह
ही ज्ञान केवल रस को रस का रूप न देकर वासना का रस बना देता! सो ही काम
बना! सो ही ज्ञान के दस सिर काम रूपी रावण के--दसों इन्द्रियों के रूप में वासना
से भरे रस को ही अपना भोग्य बनाते रहे, रस में, रूप में, गंध में, स्पर्श
में तथा शब्द में रस लेकर न केवल, उस परमात्मा रूपी रावण
की पूजा करते रहे अपितु उसे भी काम का रूप देकर वासना का भोग
स्वीकार किया जो कि राम की सीता रूप में पराशक्ति का रूप थी। सीता रूप
का भोग कभी कोई रस के रूप में नहीं कर सकता। सीता तो भक्ति का रूप
थी, सो भक्ति का, तो केवल ज्ञान से संबंध हो सकता
दस सिरों से दस मुखों से जो केवल भोगवादी वासना तृप्त हो रही थी
सो तो केवल भोग का रूप न देकर ही केवल रस स्वरूप थी, भक्ति तो ज्ञान
थी, ज्ञान का आवरण ओढ़ कर कोई भक्ति का हरण कैसे कर सकता था
जिसके दस सिर केवल काम के विकार भोग रहे थे। सो ज्ञान रूपी दस--दस
सिरों, जो केवल--एक ही रस, रस-रूप का भोग मात्र कर रहे थे, ऐसे ही दस
सिरों को केवल ज्ञान रूप ही देकर, या ज्ञान द्वारा ऐसा योग देकर जिसने केवल
ज्ञान रूपी प्रभु रस रूपी भक्ति स्वरूप माना होवे, उसी दस सिरों को
दस ही रस का रूप न देकर, जो केवल उस ईश्वर के चरण लीन हुए!
रावण तो केवल ज्ञान रूप न था इसलिए वह तो राम रूप में न होकर
राम का शत्रु, उस राम का दास न बन कर वासना का ही सेवक हो जाता रहा।
सो ऐसे ज्ञान, ऐसे दस सिर वाले रावण के दस सिरों को राम द्वारा
पहले ही मारा जाना चाहिए था जो उस ज्ञान को केवल अहंकार का रूप
दे रहे थे। सो मारा! रावण तो दस सिरों वाला ही न था, उसके
बीस हाथ भी थे। दस ज्ञान की तो दस कर्म की इन्द्रियां थीं, जो कि केवल
वासना के ही विकार को भोगने वाली थीं। कोई सेवा भाव न था; कोई भी
ऐसा काम, जो केवल ईश्वर स्वरूप सत्य के लिए ही किया जाता, कर्म भी दस
हाथ केवल अपने स्वार्थ के लिए ही किए जाते थे। रावण के कर्म हाथ
दस सिरों, ज्ञान सिरों के भोग वासना के लिए ही काम कर रहे थे। ऐसा ही
दस हाथ वाला; दस ही रस को काम-भोग द्वारा भोगता तो दस कर्म,
हाथ रस लेते; दस ही कर्मों द्वारा भी; दस ही ज्ञान द्वारा वासना
स्वरूप बनकर न तो केवल अपने ईश्वर को पा सका, न ही प्रभु का सेवक
बन सका।
राम रूपी सत्य को, "सत्य ही तो धर्म, जप, तप के द्वारा पाया
जाना चाहिए सो ज्ञान के द्वारा पाया जाना चाहिए सो तो नहीं, तप, पूजा भी
सब काम"
ज्ञान स्वरूप रावण के तो दस सिर केवल थे काम के, कर्म स्वरूप
रावण के तो दस हाथ थे तो केवल काम के, जो केवल भोग रस को ही
रस, जो केवल उस भोग रस को दस सिरों द्वारा भोगने का रूप देकर दस
कर्म हाथों द्वारा उसी को पूर्ण कर
"केवल रस को विकार स्वरूप बना रहा था"
सो ही तो मारा जाना था, ज्ञान भी! अहंकार रूपी ज्ञान
तो अहंकार रूप ही रह कर दस-दस के भोग को भोग कर समाप्त होता
केवल अपने भोग के अहंकार में ही रह कर इस रूप वासना, अहंकार
स्वरूप, न तो रस का कारण, केवल ही ईश्वर का रूप कहलाया, सो
इसलिए अहंकार स्वरूप, जो कि ज्ञान का अहंकार रूप रहा, सो ज्ञान
का रूप तो दस सिर के रूप में तो अहंकार द्वारा ज्ञान स्वरूप केवल तो
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यह स्वाभाविकता इसलिए समाप्त हो गई क्योंकि स्वावलम्बनशीलता समाप्त हो गई इसलिए
जब समस्या का हल खोजना पड़ेगा तब
तीसरी शक्ति प्रवेश करेगी, "तुम्हारा तो हर मसला सुलझा हुआ चाहिए क्योंकि
उसके बाद, समस्या का तो हल होगा नहीं तुम्हारा शोषण जरूर हो जाएगा यह बात बड़े रूप
में भी लागू होती है।"
व्यक्ति स्तर पर बात को सही रूपमें व्यवस्थित करने का पहला प्रयास होना चाहिए
स्वतः; दूसरा प्रयास दो या तीन लोगों द्वारा या उनके द्वारा एकत्रित होकर; तीसरा प्रयास
बाहर निकल--कर किसी मध्यस्थता का।
पहले जब तक अपने मन को यह बात समझ नहीं आ गई कि समस्या हमारी ही मन
की ही उपज होकर हमारे वश की बात ही नहीं रही तो समस्या बाहर की, पर उसका प्रभाव
मन पर यह बात जब तक समझ में नहीं आ!
हर व्यक्ति के जीवन का बड़ा भाग मन का ही काम करता चला जाता इसी को
जीवन! इसमें मन, प्रकृति का काम, दो या तीन का प्रभाव! इन दो बातों तक कोई
तीसरा नहीं आता या तो मन से काम चला, प्रकृति से काम चल रहा अथवा परिवार तक
ही या दो मित्रों तक ही समस्या सुलझती हो तो इस बात का बड़ा भारी महत्व नहीं था,
पर जब समस्या बाहर निकल पड़ी तब
क्या यह संभव है, बिना स्वावलम्बन और आत्म-निर्भरता कोई रह सके? हर बात
बाहर से ही सीखनी पड़ेगी या बाहर से सहायता ही ली जा सकती, जहां तक समाज में
हर व्यवस्था का रूप था, वहां पर जीवन का निर्वाह करना कठिन बात नहीं थी, प्रकृति
का रूप था, स्वाभाव रूप से सब काम चलता ही रहा था मन का, पर मनुष्य का जीवन
जब से बाहर मुखी हुआ, तब से अपने स्वरूप को भूल कर स्वावलम्बन को, प्रकृति
के स्वरूप को समझना छोड़ दिया और उसका प्रभाव विवशता बन गई, व्यक्ति का
जीवन जो हर प्रकार सुखों भरा होना चाहिए था विवश हो गया हर समस्या बाहर
निकलती गई, समाधान का आधार भी समझना पड़ा व्यवस्थाओं की ओर देखना पड़ा
था, प्रकृति व्यवस्था को तो समाप्त ही समझना शुरू कर दिया या ऐसा कहो, प्रकृति
का कोई भी अस्तित्व अपने लिए नहीं समझा या भुला ही दिया गया
बात जब इतनी समाप्त नहीं हुई, इसके दो रूप आए हैं, हर बात उस प्रकृति
व्यवस्था व व्यक्ति कार्य-शैली तक बंद नहीं रही जिसका प्रभाव व्यक्ति से सब ओर
फैला हुआ समझा जाता; इसमें जो नया रूप आया जिसने आज व्यक्ति विशेष तक
सीमित होने वाले रूप को एक अलग ही दिशा में मोड़ दिया उसका नाम स्वाभाव
प्रभाव कहा जाने लगा, जो तो था, प्रकृति रूप से जीवन का वह स्वरूप सब ओर से
अलग था, प्रकृति का प्रभाव था, प्रकृति की बात थी, व्यवस्था की बात थी, जिसे हर
व्यक्ति ने स्वयं रूप समझ लिया था! व्यवस्था की बात समाप्त नहीं, केवल
यह प्रभाव खड़ा हो कर सब व्यवस्थाओं और व्यक्ति विशेष विचार दोनों को विवशता
में ला पटकने का ही काम कर सका। दूसरा परिणाम आया, जिसे हर व्यक्ति
अनुभव करता जा रहा केवल उसी रूप को नहीं समझ पाया कि हर बात केवल प्रकृति
से ही नहीं जुड़ी मानी जा सकती! जिसे अज्ञानता, विद्या अभाव कहा जा रहा है!
केवल विद्या अभाव शब्द तक ही नहीं, अज्ञानता शब्द केवल ज्ञान का अभाव ही
स्वरूप समझ लिया गया इसके प्रभाव को और आगे समझना होगा कि आज व्यक्ति का
जीवन कैसा हो चला जिस को विद्या प्रभाव या ज्ञान अभाव का परिणाम कहा जा सकता
और उसके हल की दिशा समझी जा सकती
जिस समय मनुष्य के जीवन का स्वरूप ही बदल जाता गया, विद्या के सब
आयामों को जो भी नाम दे दिया गया उसका परिणाम केवल यही निकला कि आज
एक प्रकार का प्रभाव मन पर प्रभाव डाल गया स्वाभाविकता का जो रूप था समाप्त हो गया;
अस्वाभाविकता आकर जीवन को ही समाप्त अव्यवस्थित स्वरूप दे गई? व्यक्ति सब कुछ
भी सोचे? कुछ भी सोचे वह सब, सब के कल्याण और सुख-शान्ति का
स्वाभाविकता के अन्तर्गत नहीं आता था तो उसका नतीजा क्या निकलता? आत्म-ज्ञान
की बात तो बहुत पीछे, मात्र रीति-नीति चली गई, पर जीवन तो संकट भरा बना रहा।
सब कुछ का लेन-देन का अभाव समाप्त हो गया था रूप भी समाप्त भरा था।
व्यवस्था के अंतर्गत लेन-देन हो सकता था, पर साधन तो आज समाप्त रूप हो चुके;
केवल भ्रम शेष था या बना रहा
विद्या का स्वरूप प्रभाव हो रहा है? अविद्या प्रभाव है? नहीं! केवल भ्रम
फैलाकर मनुष्य समस्त व्यवस्था समाप्त कर बैठा केवल अविद्या रूप में ही सब कुछ
चल या चलाया जा सकता समझ कर, उस पर भी भ्रम शेष फैला हुआ था जिससे
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