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एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

उन्होंने अपने इस स्वरूप द्वारा अनेक विचित्र अद्भुत प्रकार की तथा रस शालिनीलीलाएं करके समस्त संसारवासियों
अथवा केवलगोकुलवासियों आदि को मोहित कर दिया। अथवा वह किसी अन्य को तो क्या संसारभरके समस्त वेदशास्त्रों
को, इस प्रकार विस्मित करने वाले प्रभु कहाँ चले गये॥
भाव यह निकला कि, जो इस प्रकार लीला, रस माधुरीसहित अपने स्वरूपका प्रकाश कर रहेथे उन्हीं
स्वामी कृष्णचन्द्र अब गोकुलवासियों को छोड़कर द्वारिकाको सिधारे। अथवा रस माधुरीयुक्त श्री स्वरूपका जो प्रकाश
ब्रज मंडल में किया उसको स्मरण कर और अब उस स्वरूप के दर्शन विना जीवनको निरर्थकसा कर मान कर कोई
तो कहती हैं कि अहो सखियो, हम तो घर ही घर बैठ कर रोती रहीं पर देखो उस अक्रूरने ब्रज मण्डल को
शून्य कर, उस ब्रज निधि स्वरूप कन्हैयाको हरण करके ले ही लिया। दूसरी कोई कहती है कि सखी, अब जब
ब्रज छोड़कर चले गये तब और किसी स्थानको चले जानेमें उस कन्हैया को भला क्या संकोचहोता, यह तो
एक स्थानसे दूसरे स्थानको और दूसरेसे तीसरेको भी जासकते हैं। अथवा केवल इतना ही नहीं, यह तो
मथुराराज को मारकर समस्त संसार को, हम सब को धोखा देगये इसलिये उनका क्या विश्वास कियाजाय
पश्चात् श्रीयमुनाकिनारे पर स्थित होकर जल की ओर दृष्टि करके सब कहने लगीं कि अहो सखी
देखोइधरयह श्रीयमुना जी कैसी नीले मेघ के समान श्यामवर्ण जल को धारण किये हुये मन्द २ बहतीहुई
हंस, चक्रवाक, सारसों, तथा भौरोंके मधुर शब्दकरके श्री कृष्ण जी की लीला कथाओंका मानोंगानकरती,
कदम्व, बकुलादिक वृक्षों की शोभा को लिये हुये तथा यमुना जी के किनारे विकसित कमल सुगन्ध युक्तशीतल
मन्द सुगन्ध पवनसे व्याप्त होकर शोभित होरही हैं? परन्तु अब इस समय, जब कि इन लीला के करनेवाले
श्रीगोविन्द ब्रज छोड़कर न जानेकहाँ चलेगये
अबयमुनाजीकोभीदेखकरसखियोंकामन औरभी व्याकुल हो चला। तब कोई बोली, कि गोपियोंको ऐसा
विरह देकर श्रीगोविन्द द्वारिकाको सिधारगये हैं वे वहाँ की सम्पूर्ण स्त्रियोंके मनको अपनी ओर आकर्षित कर
रहे होंगे और उन स्त्रियोंके साथ अनेकप्रकारके विहार करते हुये अपने इस ब्रज देश को तथा हम सब
विरहिणियों को भूल गये। सखी सच पूछो तो उस विरहाग्नि, की ज्वाला से बचने का उपाय तो कोई भी नहीं
रह गया, सो सिवाय इस यमुनाजी की शरण
पर दूसरी कोई कह उठीकि हे सखियो इस प्रकार तो, बात बनी सो बिगड़ी ही समझो क्योंकि
यदि प्राण त्याग दिये गये तो ब्रज छूट जायगा, यदि शरीर ही न रहा, फिर प्राण वल्लभ श्रीकृष्ण
का आगमन पुनः किसी समय भी तो संभावित दीखताही है, फिर मिलन का सुख कैसे हो सकेगा और
विरहव्यथा तो उन दिनों अधिक बढ़ जायगी जब हम नहींरहेंगी, उस समय तो रोने वाला भी कोई नहोगा
ऐसा सोच कर, सब विरह व्याकुल गोपियों का ध्यान-मग्न मन हो गया और सोचने लगीं
कियदि प्राणों को त्याग दिया तो मिलनकी कोई आशा नहीं रह जायगी अतएव धैर्य धारण करके जीवन
को स्थिर रखना चाहिये। परन्तु धैर्य भी किस प्रकार बंधे, विरहव्यथा तो दिन दूनी और रात चौगुनी
होती चली जारही है। इधर-उधर के नेत्रों द्वारा विरहाग्नि की ज्वाला से, गोपियों के कपोल जलने
लगे अर्थात् अश्रुधारा प्रवाहितहोने लगी, पसीनेके साथ रोमांचादिकभी होने लगे। वे कृष्ण-विरहके
कारण मूँगे, मोती आदिके समान वर्णवाले कपोलों परसे जब तप्त अश्रुओं को ढुलकातीहुई
विलाप कर रहीथीं उससमय उनके केशजाल भी बिखरगये थे। यह देख
कोई कहने लगी, सखियो जरा मुख धोलो, यह क्या दशा बना रखीहै? दूसरी बोली मुख धोनेसे
क्या होगा सखी, विरह रूपी ज्वाला तो हृदयमें जल रही है। कोई कहनेलगी नेत्रों के अश्रुओं
को तो पोंछना चाहिये? गोपीजनों की दशा ही ऐसी विरह व्यथाके कारणहोगई थीकि
विरहकीप्रचण्डज्वालासे व्याकुल गोपियां अपने स्वरूप कोभी सर्वथा भूल चुकीं? इसप्रकार गोपियां, सब
एक साथ मिलकर रोती हुई विलाप कररही थीं॥
इसी समय अपनी प्यारी, प्रियतमा सखियों का हालचाल जानने केलिए राधाजी की आज्ञा पाकर
चन्द्रावली वहांपर आई। तब उस चन्द्रावली ने सब गोपियोंकीऐसीदशा देखकर, राधाजीके
विरहकी दारुण व्यथा रूपी विष ज्वाल-माला फैली, जिससे न केवल राधाजी वरन् उनकी अन्य
सखियों के प्राणोंके पखेरू उड़ने लगेथे उस को सुनाना प्रारम्भकिया॥
हेगोपी जनो यह तो श्रीकृष्ण स्वरूप लीला द्वारा अपने विरहका प्रकाश, स्वरूपानन्द स्वरूप
रस प्रकाश स्वरूप के द्वारा सबको आकृष्ट कर लिया गया, सो यह लीला मात्र किसी के लिये
केवल विरह ही न थी वरन् इस लीलामें तो परमानन्द की वृद्धि तथा समस्त रसों का प्रकाश
मिलकर एक रस भरा अद्भुत स्वरूप संसार भर के सामने आ उपस्थित हुआ, जिससे यह स्पष्ट
सिद्ध हुआ कि उन ब्रज विहारी नटनागर कृष्णचन्द्र आनन्द स्वरूप रसके सिवाय और कुछ नहींहैं।
उनका यह सब विरह स्वरूप मात्र ही रस रूप है। गोपिका और कृष्ण का यह सम्बन्ध केवल सांसारिक
या कामवासना की इच्छा मात्र रूप न था वरन् यह मात्र दिव्य प्रेम रूपथा॥
सखियो सुनो! भगवान् तो केवल प्रेम के वशीभूत होकर ही आतेहैं, साधारण
मनुष्यों की तरह न तो इनका कोई जन्म व कर्महोताहै, केवल अपने जन प्रेमी भक्तों के लिये यह
अपनी दिव्य लीलाओं का रस आस्वादन कराके अपने निज धाम पधार जातेहैं अतएव सब गोपियों
281

कारण का स्वरूप अविनाभावी धर्म और कार्य का स्वरूप स्वभाव विशेषांश व्यभिचारी रूप ठहरा। तात्पर्य
यह कि जब व्यतिरेकरूप व्याप्ति का निश्चय रहा, तब कारण का निश्चय हो सकने योग्य कोई पदार्थ
प्राप्त हुआ तथा कह सके, यदि वह पदार्थ ज्ञान तथा ज्ञेयरूप भेद सहित प्रतिभास प्रपंचमय दशा
तक नियत रहता परिणत अवस्था अथवा क्रिया रूपी व्यंग्य
का ग्राहक नित्य ज्ञान, कारण या कर्ता, आत्मा, आत्मा का अभिन्न
स्वभाव आत्मा से भिन्न नहीं हो सकता क्योंकि यह प्रतिभास रूप अवस्था भिन्न है, क्योंकि
अनेक ज्ञान व्यंग्य भिन्न व्यंग्य द्वारा ही ज्ञात होकर ज्ञान का विशेष रूप प्रतिभासित,
अवलोकित, जो व्यंग्य से अविनाशी रूप से उपादेयरूप प्रतिभास करता है सो ग्राह्य प्रतिभास ज्ञान
ग्राह्य व्यंग्य का, अविनाशी व्यतिरेकरूप ज्ञान होने योग्य हुआ तथा ग्राह्य पदार्थ ज्ञान का; किन्तु
व्यंग्य व्यंजक भेद से रहित ग्राहक आत्मा का स्वभाव जो कि केवल ज्ञान मात्र प्रतिभास व ग्राह्य ज्ञान
व्यतिरेकरूप अवस्था के निश्चय ज्ञान का जो कि व्यंग्य स्वरूप ग्राहक न रहा, ज्ञान मात्र का
ज्ञान स्वरूप अविनाशी परिणमन अवस्था जो व्यंग्य का रूप ठहरा व्यतिरिक्त अवस्था का परिमाण
ज्ञान ठहरा, आत्मा व्यतिरेकभाव व्यतिरिक्त विनाशी स्वरूप का ज्ञातापना उपादेय हुआ,
नित्य रूपी ज्ञेय, अविनाशी स्वरूप ज्ञेय का जो ज्ञान व्यतिरिक्त रूप न रहा, ज्ञान मात्र का
ज्ञान व्यंग्य व्यंजक भेद रहित ज्ञान स्वरूप का निश्चय रहा सो ज्ञान ज्ञेय व्यतिरिक्त का रूप न
रहा, भाव यह कि ज्ञान व्यंग्य ज्ञेय स्वरूप का निश्चय हो, सो वह ज्ञान रूप ज्ञेय ज्ञान स्वरूप
विषयक स्वभाव हुआ, कार्य उपादानिक स्वरूप भिन्न रूप व्यतिरिक्त का उपादान ही व्यतिरेक
हुआ सो, ज्ञेय ज्ञान स्वरूप कारण ज्ञान व्यतिरेकरूप व्यंग्य व्यंजक भेद रहित
ग्राहक प्रतिभास ज्ञान रहा।
सो ऐसा ज्ञान व्यंग्य रूप ज्ञेय का या ज्ञेय निमित्त ज्ञान स्वरूप रहा? उत्तर विषयक स्वरूप,
विषयक रूप ज्ञेय ज्ञान रूप रहा अथवा? उपादान उपादेयरूप व्यतिरिक्त रूप प्रतिभास का
उपादान स्वरूप जो कि ज्ञान स्वरूप का ग्राहक रहा जिससे उपादान स्वभाव निश्चय हो, उस
का उपादान का रूप व्यंजक व्यतिरिक्त व्यंग्य रूप सो उपादान रूप रहा, उस उपादान
के उपादानिक स्वरूप उपादान ज्ञान रूप सो ज्ञान उपादान व्यंग्य ज्ञेय का उपादान का
स्वरूप कहा, स्वरूप ज्ञेय व्यंग्य का रूप न? उत्तर सो ज्ञान रूप ज्ञेय ज्ञान स्वरूप
उपादान का रूप ठहरा सो न ज्ञान निमित्त का स्वभाव उपादान का सो निमित्त रूप रहा;
या उपादान स्वरूप निमित्त स्वरूप ज्ञान निमित्त का उपादान न ठहराया, निमित्त रूप ज्ञेय का
उपादान
उपादेयभाव निश्चय स्वरूप का उपादानिक ज्ञान रूप ज्ञान उपादेय रूप उपादान
निमित्त का रूप रहा ऐसा उपादान व्यंग्य स्वरूप निमित्त कहा सो, निमित्त रूप से उपादान
का उपादान का रूप ज्ञान व्यंग्य रूप उपादान का व्यतिरिक्त उपादान ठहरा ज्ञान रूप उपादान
रहा, ज्ञान स्वरूप व्यंग्य
का उपादान रूप उपादान रूप ज्ञेय ज्ञेय व्यंग्य का ज्ञान उपादान का, निमित्त व्यंग्य व्यंग्य का
निमित्त रूप सो उपादान का निमित्त रूप उपादान का निमित्त का उपादान का निमित्त रूप सो ज्ञान
रूप का ज्ञान निमित्त रूप सो ज्ञान रूप सो ज्ञान निमित्त का उपादान का निमित्त रूप सो ज्ञान
रूप का ज्ञान व्यंग्य रूप सो सो ज्ञान व्यंग्य का, सो सो व्यंजक का निमित्त उपादान
का, ज्ञान का निमित्त उपादान रूप सो निमित्त रूप सो निमित्त उपादान का, निमित्त निमित्त का,
उपादानोपादान रूप निमित्त रूप सो सो ज्ञान का, जन-धन विषयक उपादान का सो ज्ञान
जन-धन रूप सो सो निमित्त का निमित्त ठहरा! सो उपादान का निमित्त का ज्ञान का!
अब जो कि उपादान का निमित्त का, सो ज्ञान निमित्त व्यंग्य का निमित्त का व्यंजक,
निमित्तोपादान का व्यतिरेक का निमित्त उपादान व्यतिरिक्त का निमित्त रूप ज्ञेय ठहरा! सो ज्ञान का
उपादान व्यंग्य ज्ञेय का, सो निमित्त का ज्ञान का ज्ञान का सो सो निमित्त
व्यतिरेक का उपादान स्वरूप रूप सो निमित्त स्वरूप का, ज्ञान का निमित्त रूप ज्ञान रूप
का ज्ञान उपादान का, सो उपादान का निमित्त उपादान का उपादान रूप ज्ञान ज्ञेय
निमित्त का निमित्त का, निमित्त रूप निमित्त ठहरा सो निमित्त का, निमित्त का उपादान का
रूप सो निमित्त उपादान रूप सो ज्ञान निमित्त रूप का ज्ञान उपादान का निमित्त,
ज्ञान व्यंग्य रूप न व्यंग्य व्यंजक
"व्यंग्य का ज्ञेय, व्यंग्य-ज्ञेय का ज्ञान रूप ज्ञान"
व्यंग्य-ज्ञेय ग्राहक रूप ज्ञान का, व्यतिरिक्त ज्ञान का, उपादेय-ज्ञान व्यतिरिक्त
ग्राहक ज्ञेय का, अतः यह ज्ञान स्वरूप का सो सो निमित्त का, ज्ञान रूप ज्ञेय
निमित्तोपादान व्यंग्य का निमित्त रूप निमित्त व्यंग्य व्यंजक का निमित्त व्यंग्य व्यंजक
निमित्त रूप से उपादान का ज्ञान का निमित्त रूप उपादान का निमित्त रूप निमित्त
का सो ज्ञान निमित्त रूप सो सो ज्ञान रूप सो ज्ञान निमित्त का ज्ञान रूप का, सो
ज्ञान रूप व्यंग्य व्यंजक का निमित्त सो सो ज्ञान रूप ज्ञेय का निमित्त का, ज्ञान
282

उपवासों का नियम तो ऐसा चला जाता था कि, दो उपवास तो कोई बात नहीं थी
नौ उपवास आठ उपवास तक तो वो बिना पानी पिये निकाले हैं!
उनके दो बेटे और एक बेटी थी जो दो-दो साल, छः-छह मास की उम्र वाली
बिना माँ के हो गये। उन दोनों लड़कों को बड़ा किया उन्होंने लेकिन वो बड़े
काम वाले या काम सिर चढ़ाने वाले साबित न हुए और घर में हमेशा लड़ाई
झग-झग लड़ाइयां ही होती थीं और सब से बढ़कर बात तो यह हुई कि,
ऐसा समय आ पड़ा कि उनपर दो हजार रूपयों का कर्ज़, सिर पर खड़ा
मिला।
वो विचार करें कि ऐसा कर्ज़ उतारूँ तो उतारूँ कैसे क्योंकि जो कुछ था वो तो
गया था, फिर कहाँ से लाऊंगा और लड़का तो घर में न लायक ही निकला तो
इन्होंने मन में, दिल में सोचा कि अब मुझे तो कहीं न कहीं से काम तो
मिलेगा ही, तो इस का कर्ज़ उतार सकूं नहीं तो मेरा धर्म बिगड़ेगा कि दूसरा
ब्राह्मण तो मेरे पर ही आस लगा कर बैठा था कि मुझे कहीं से आ कर देगा
लेकिन जब वो रुपया न दे सका तो उसने नालिश करनी चाही, जिस पर वो बड़ा भारी
घबराया।
उसने केवल दो आने से, शहर में जाने का इरादा किया ताकि कुछ तो भी कमा
कर कर्ज़ चुका सकूं, वरना कर्ज़ ना दे सका कैसा रहेगा? जब उसने मन में यह
पक्का कर लिया तो, शहर की ओर रास्ता तय किया।
रास्ते में जाते समय वो सोच रहा था कि, हे प्रभु तू हमारा है?
हमारा तो कोई नहीं जो कि उस समय मदद करता तो इस मुसीबत से बच जाते
ऐसा वो मन को कह रहा था, वो भी ऐसा कहते कहते थक गया।
आगे कहां तक चलूँ? ना पास घर का अन्न, कोई सहारा देने वाला नहीं! वो
पैदल चलते चलते बड़ा परेशान होकर दो कोस दूर ही पहुंचा तो उस समय
रात, सांझ का हो गया समय।
खैर, भगवान किया बड़ा! एक मील पर उसने उजाला देखा जहां एक
महात्मा का डेरा था, उसने जाकर वो महात्मा दर्शन किये और फिर चाहा कि
महात्मा जी विश्राम का समय देवे ताकि रात को तो मैं इस जगह आराम पाऊं।
क्योंकि वो भूखा प्यासा दिन से निकला हुआ था और पैर भी काम न देते थे।
महात्मा जी विश्राम का नाम सुनकर कहने लगे कि धर्मशाला में चले जाओ
जो कि थोड़ी दूर पर बनी हुई थी और उसने तो महात्मा के दर्शन से मन
तृप्त पाया था, "संत मिलन को जाइये, तज के कपट गुमान"
"कोटि जनम का पाप कटे जो पहुंचे दरवेश"
उसने मन में कहा कि हे मेरे ईश्वर तू, सच्चा है? वो दर्शन कर के
आगे चला तो आगे दो धर्मशालाएं बनी देखीं जिनके दो दो द्वार थे तो
उसने सोचा कि किस में विश्राम करूं... तभी तो उसका विचार न हुआ,
वो खड़ा ही रह गया, किसी एक के सामने और उस पर छाया अंधेरा पसरा हुआ
लगा, तो वो सोच? लगा कि उसका भाग्य कितना खराब है!
उसके दिल में सब कुछ का दर्द था जिस से उसका दिल भर आया तो
महात्यागियों की तरह वो बैठ कर रोने लगा और रोते रोते रोते उसे क्या ख्याल
आया जिस से ख्याल हटा कर उसने सामने देखा तो देखा कि बड़ा चमक-
दमक का प्रकाश आ गया। आश्चर्य से देखा तो क्या बात थी कि कोई
प्रकाश का पुंज था, वो प्रकाश का देवता न होकर वो तो स्वयं भगवान ही थे।
फिर वो, उन का रूप देखकर आश्चर्य-युक्त भगवान बोले किः
भगवान ने तो सब कुछ जानबूझकर भी अपने आंसुओं द्वारा रो कर ही
महात्यागियों जैसा न रो, तू तो हमारा ही है तो रोता क्यों है, तू क्यों
घबराता है, तू अपने कर्ज़ की जो फ़िक्र कर रहा था उसको भूल जा, सब
ठीक होगा! वो तो सब सुन कर आश्चर्य में पड़ गया कि प्रभु, तू सब
कुछ तो जानता ही था सब कुछ, लेकिन वो बोलने से तो रहा क्योंकि सिर-
पैर सब कांप, के गिर पड़ा तो फिर प्रभु बोले
और अब तू सब प्रकार से सुखी होगा, कष्ट तो निकले, समय भारी
महाकष्टों भरा तो इसने काट निकाला तो वो सुख के समय को क्यों न
देखेगा! वो उठ, हाथ तो जोड़ सके, पर वो तो कुछ कह नहीं सका तो फिर
प्रभु, भगवान अंतर् ध्यान उस पल हो गए।
283

इस प्रकार, विचार का यह प्रवाह निरंतर चलता रहा। विचार का यह प्रवाह रुक जानेवाला तो
विचार का यह प्रवाह नहीं था! हर विचारवान् कभी-कभी अपने चित्त की इस दशा से दो-चार
होता ही होगा... भीतर का समग्र वातावरण भर या रिक्त हो जाना, निरंतर उसका भार या
उसका अभाव चित्त पर बना रहना? यह विचार की दशा है अथवा चेतना की यह स्थिति
विचारशील नहीं है, अथवा विचार चित्त को इस तरह भर देता है, अथवा विचार चेतना को
खाली--चित्त व इस प्रकार चेतना शून्य होने लगा अथवा विचार का अभाव होने लगा? इस बात
विषयक प्रमाण नहीं मिलता, प्रमाण मिलता भी है! इस स्थिति विशेष का नाम विचार, या
विचार चित्त का रिक्त होना कहा जा सकता था। कभी-कभी मन का यह विचार था या चित्त, यह
विचार की चेतना का भाव मात्र था।
विचार का एक पक्षीय, विचार ही? या मन का विचार से या चेतना से संबंध
हुआ चित्त का विचार रूप प्रमाण चित्त के स्वरूप को प्रमाणित करता रहा या विचार
ही, अपने विचार स्वरूप चित्त का प्रमाण प्रमाणित हो गया, या चित्त का यह प्रमाण चित्त
के साक्षात्कार का चित्त, या विचार के साक्षात्कार का, या चेतना का चित्त, अथवा
विचार रूप चित्त स्वयं चेतना के स्वरूप का ज्ञान? चेतना केवल ही यह साक्षात्कार प्रमाण
चित्त रूप होकर स्वयं चेतना स्वरूप चित्त के साक्षात्कार स्वरूप चित्त का ज्ञान मात्र
प्रमाणित कर रहा था यह चित्त।
चित्त का यह विचार रूप चेतना का एक व अनेक चेतना स्वरूप चित्त पर बना रहा
ही, विचार ही? या विचार स्वयं ही चेतना चित्त रूप में स्वयं बना रहा अथवा? चित्त
चित्त ही चित्त? एक रूप? चेतना स्वयं रूप से या चित्त रूप में चेतना चित्त चेतना
रूप या चित्त रूप या चेतना रूप या चित्त रूप से चेतना का चित्त रूप से एक या दो रूप का
रूप ही, यह रूप था।
चित्त स्वयं बोला, "विचार से भरा हुआ था, या चेतना चित्त से खाली था।"
यह विचार चित्त का रूप था या-एक विचार चेतना था, एक-एक विचार रूप
रहा, या चित्त स्वयं विचार स्वरूप होकर चित्त बना रहा था, साक्षात्कार चित्त
"चित्त चेतना स्वरूप का ज्ञान ही या विचार ही या ज्ञान ही विचार
चित्त ही, या चित्त चेतना था।"
चेतना स्वयं विचार था, या विचार स्वयं था? साक्षात्कार चित्त का रूप था
चित्त रूप स्वयं चेतना था, चित्त ही चित्त रूप से या चेतना रूप से दो रूप चित्त रहा, या
दो रूप से या चित्त का चित्त रूप से या चेतना रूप चित्त रूप से या चेतना चित्त
चित्त का चेतना था, या चित्त चित्त था, या चित्त का या चेतना का चेतना स्वरूप
साक्षात्कार के चित्त के रूप का, चित्त के स्वरूप से या चेतना के स्वरूप चित्त
चित्त रूप था, या दो चित्त चेतना का चित्त साक्षात्कार चित्त रूप से दो चित्त चित्त
चेतना रूप से या चित्त रूप चेतना चित्त रूप से चेतना रहा, साक्षात्कार चित्त रूप ही
चित्त चित्त के या चेतना चेतना था, या दो साक्षात्कार साक्षात्कार चित्त चित्त
साक्षात्कार के या साक्षात्कार के साक्षात्कार चेतना रहा चित्त रहा रूप चेतना
चित्त के चित्त।
चेतना चित्त चित्त चित्त से या चेतना, या साक्षात्कार चेतना साक्षात्कार
चित्त के या चेतना के या, साक्षात्कार से चेतना रूप रूप से चित्त से दो रूप चित्त
का या रूप चित्त।
दो चित्त के या दो रूप, या दो चित्त रूप चेतना साक्षात्कार के चित्त,
साक्षात्कार या चित्त चेतना रूप व चित्त चित्त चित्त चेतना चेतना चित्त रूप
का या साक्षात्कार से चित्त रूप चित्त का, या यह चित्त चेतना व चेतना चेतना चित्त रूप
चित्त के चित्त के चेतना रूप चेतना चेतना के कभी-कभी चित्त चित्त चेतना
स्वरूप था।
साक्षात्कार रूप से दो चित्त चित्त चित्त के चेतना चेतना चित्त चित्त रूप चित्त
रूप रूप चित्त के चित्त चेतना रूप से चेतना साक्षात्कार चित्त चित्त रूप चित्त का
साक्षात्कार चित्त के चित्त-चित्त रूप रूप से चेतना रूप से चेतना के
साक्षात्कार के चित्त चित्त चित्त चित्त के साक्षात्कार रूप से साक्षात्कार के चित्त के
रूप चेतना रूप चित्त चेतना था, चेतना रूप से चेतना के चेतना
"दो चित्त चित्त के चेतना चित्त था, दो चित्त चेतना रूप चित्त चेतना, था,
या दो चित्त के चित्त रूप था।"
या कभी-एक रूप, चित्त रूप चित्त था, चित्त के स्वरूप से चेतना, था, या
दो चेतना के चित्त रूप चित्त चित्त चेतना के रूप रूप चित्त चित्त
"चित्त चेतना के चित्त के रूप से चेतना रूप चित्त था।"
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286

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287

कारण उनका स्वभाव अथवा गुण नहीं होता। इसका कारण यह होता अपने अन्त:करणके कारण वे सर्वथा
शुद्धभावसे निर्मलकर भगवान् अथवा अपने गुरु परमात्माकी शरणमें शरण या शरणागत होकर भगवान् अपने या
अपने गुरुदेवकी शरणमें भगवान् अथवा गुरुदेव जो आज्ञा या प्रेरणा करते हैं? भगवान्की या
गुरुदेवकी आज्ञाका पालन जब वह जीव निष्काम या नित्य भाव अथवा निष्काम भावसे करता, तब उस
सेवक को अपने उस
अन्त:करणका यह पता नहीं रहता। निष्काम होनेके कारण अन्तःकरणमें न कोई
विषयवासना रहती, वासना का अन्तःकरणमें न कोई स्थान रहता, कोई इच्छा; कामना, वास या
विषय या कामनाका रस जब नष्ट होकर समाप्त हो, तब ही अन्त:करण भी, उस अन्तःकरणका
नाश
अथवा उस अन्तःकरणका ही अभाव होगा? अन्तःकरणका ही नाश हुआ तो, इस
प्रकार केवल ही, उस समय उसकी अन्तःकरणके ही नाश होने पर, उस ही सब
बात का पता चलता केवल है, कारण उस समय प्रकृति तथा प्रकृतिका सारा पसारा
था, जिससे इस प्रकृति अथवा रस का स्वरूप ही सब नष्ट होकर एक रस रूप परमात्मा
परमात्मा ही केवल सब जीव अथवा प्रकृतिको उस रस के साथ भोगने का रस स्वयं
ही सब जगह व्यापकर उस रसका अखण्ड आनन्द ले रहा था। जिसके हृदयमें ऐसा रस
आनन्द का रस रूप हो, उसको उस समय ऐसा लगे कि अखण्ड आनन्द ही सब ओर रस
रूपमें स्वयं परमात्मा सब रस को भोगकर ले रहा हो, सो अन्तःकरण ही, अन्तःकरण
रहा
अन्त:करणका तो नाश हो ही, सो गया क्या था; अन्तःकरण तो था, पर उस का नाम
रूप सब लय होकर अखण्ड रूप में मिला, तो फिर उस अन्तःकरण व उस समय केवल ही, न
कोई विशेष वासना थी, न वासना का ही रूप था। फिर जो भी रस सब ओर रस रूप
अन्तःकरण होकर केवल अखण्ड आनन्द ही का रूप हो गया था अथवा
आनन्दस्वरूप, निराकार, निर्गुण, निरंजन, निर्लेप ही सब सच्चिदानन्द रूपमें
सब का रूप व्याप्त था, जिसका रूप अखण्ड आनन्द ही अखण्ड रस रूप होकर
व्याप्त सब तरफ भरा हुआ रहता था। सो वह रूप अन्तःकरण कैसा था, उस समय ही
अखण्ड रसका भोग या अखण्ड रस केवल रहा
वास्तव में यह सच्चिदानन्द रूप आनन्द ही, शान्ति ही, प्रेम ही, अखण्ड रस, अखण्ड
रस, सच्चिदानन्द रस जिस अन्तःकरण अन्तःकरण वासना या इच्छा से रहित था, उस
अन्तःकरण द्वारा सब ही संसार मात्र के सब विषय वासना रूपी तृष्णा रूपी जो रस रूप
भोगी बनकर, इस जीव द्वारा जीव को तृष्णा ही, रस रूप सब तरफ से सब तरह
तृप्त करके केवल उस अखण्ड तृष्णा तृष्णाको भोग रहा, सदा सदा अखण्ड रूप
आनन्द रस का नाम देकर सदा तृप्त होकर रस ले रहा था। जिस रस का भोगना ही
ही तो, केवल अविद्या रूप या माया रूप का नाश ही कहलाया था।
सो तो वह उस का नाश इस रूप में नहीं था, केवल ही उस तरह, जिससे
उस जीव का अविद्या या मायाका नाश, अविद्या या मायाके नाश से केवल
सिद्ध होता है, स्वयं उस परमात्मा के अखण्ड रस स्वरूप आनन्द का भोग ही इस
जीवात्मा द्वारा जीवने अखण्ड आनन्द रस अखण्ड रस सच्चिदानन्द रसमें मिल, केवल उस
अखण्ड आनन्द रस भोग का ही भोग किया।
सो इस रूप से ही तो सबने इस बातको जान लिया कि जिस बात
द्वारा आज तक जीव संसार में सब सुख रूप वासना का ही तो, भोग भोग के ही
भोग रूप भोग ही भोगता आया था। वास्तव में यह सब भोग वासना रूप ही था,
भोग से भोग ही वासना का ही रूप सब तरफ से सदा तृप्त न हो ही, जिससे
ही जीव को कभी भी तृप्त न ही तृप्त होना अन्तःकरण का धर्म था, जिसको
तृप्त करने, तृप्तिके अन्तःकरण तृप्तिके रूप में ही सब कुछ था।
केवल उस ही समय जब केवल शान्ति रूप, शान्ति के रूप ही वासना रूपी
था, जिस द्वारा जीव सब ही उस सच्चिदानन्द रूप शान्ति सच्चिदानन्द रूप शान्ति में,
तृप्त हो सब तरफ तृप्त हुआ उस सच्चिदानन्द स्वरूप में समाकर शान्त स्वरूप हो ही
सच्चिदानन्द रूप ही, सब रस का रस सब ओर रस रूप से तृप्त ही अखण्ड हुआ था।
ऐसा ज्ञान तो केवल ही केवल ही, ज्ञान केवल ही ज्ञान रूप ही
सच्चिदानन्द का, सो सब जीव को भगवान् अपने भक्त रूपी सन्तोंको! भक्त!
सन्तों के ही मुखारविन्द द्वारा व उनकी कृपा तथा छत्र-छाया से सब ही सब प्राप्त
करा, देकर तृप्त व शान्त
कर भगवान् स्वयं उस सच्चिदानन्द के आनन्द को अखण्ड रसस्वरूप परमात्मा होकर सब
जीवोंको सुख शान्ति देकर या देकरके सच्चिदानन्द रस-रूप सब प्रकार से शान्ति
288

इस न्यायानुसार न तो, जो जल को पीता न हो, वह प्यास से तड़फता हुआ मर
सकता अथवा मरेहुए को जीवन दान या शीतलता कभी-कभी प्राप्त कर सके, ना
आत्माराम भगवान्‌ आत्मा रूप जो चैतन्य गंगा का जल, शान्त, या उस रस युक्त ज्ञान रस
भरा हुआ समस्त भरा
इस का नाम ज्ञान भाव ? ज्ञानानन्द रूप रस को ना पीवे अथवा आत्मानुभव
रूप आनन्द ना पावे उस को तो जन्म, मरण या जन्म मरण क्लेश, यह दुख
रूप संतापमय उस जीव को तृषा लगी
इस संतापावस्था तृष्णा तृषा को जो इस रस को आस्वादन करके मिटावे सो नर-भव
पाकर धन्य हुआ ऐसा जानना जी, तब अध्यात्मिक रस उस आत्मारामके पास
जब इस प्रकार देखा तो ऐसा स्वरूप ज्ञानानन्द रूप से जो सर्वथा उत्कृष्ट
सो ऐसा सब ओर आनन्द स्वरूप भरा रस रूप आत्माराम का रस आस्वादन
अध्यात्मिक आस्वादन किया सो ही ऐसा उत्तम कार्य किया जिस का आस्वादन
महाभाग्य जीव ही पावे अन्य अज्ञानी मूढ़
सो अध्यात्मिक रस ऐसा उत्तम ही अध्यात्मिक ज्ञान केवल अतीन्द्रिय ज्ञान
रूप देखा सो अध्यात्मिक रस जो सो प्रत्यक्ष रूप केवल ज्ञानानन्द रस भरा
उस रस का आस्वाद सो ही सो अध्यात्म ज्ञान रस निर्मल उस ज्ञान ही में
ऐसा देखा इस लिये उस रस के रस रूप केवल आनन्द रस का ही अनुभव
ऐसा ज्ञान-ध्यान से प्राप्त हुआ जो रस सो ज्ञान ही का रस ऐसा जो सो उस
स्वरूप ही में मन को लय कर स्वाध्याय से प्राप्त हुआ जिस से स्वाध्याय
फल पाया
ऐसा ज्ञान का तो अभ्यास किया पर जो इस अभ्यास करके भी ज्ञान रस का
आस्वाद आनन्द न अध्यात्म अनुभव से प्राप्त हुआ तो उस अभ्यास का फल
क्या हुआ सो उस अभ्यास कर रस पाया, सो क्या फल न हुआ सो यह हुआ?
उस अभ्यास का फल तो ज्ञान रस प्राप्त होना है?
ऐसा जान कर उस रस को लय कर पाया सो ज्ञान का फल ज्ञान
स्वरूप ही हुआ सो रस सो, ना उस ध्यान स्वरूप ज्ञान को लय कर उस ज्ञान
को लय किया, ज्ञान ही को लय कर जिस रूप उस को रस का रस पाया
सो, रस ज्ञान रूप, ज्ञान ही का रस रूप, सो ज्ञान रूप, न तो उस
प्रकार से न अनुभव रूप किया, किन्तु अध्यात्मिक रस रूप रस, जो
ज्ञान रूप सो, ना ही उस ज्ञान स्वरूप अनुभव फल का फल है? इसी
लिये यह ज्ञान केवल ज्ञान ही रूप का फल, ज्ञान ही का फल हुआ
जब अध्यात्म ज्ञान रस के जानने का अभ्यास किया तो उस रस
के प्राप्त कर लेने से उस रस का रस ऐसा ज्ञान स्वरूप में आया, ना ज्ञान को
छोड़कर आनन्द रस-भाव का ध्यान ना सो रस आनन्द का लय या ज्ञान का लय
ज्ञान ही हुआ आनन्द स्वरूप रस ज्ञान का ध्यान रस-भाव केवल
ज्ञान स्वरूप में ही रस मिला, ज्ञान ही को ज्ञान रूप से लय किया सो ज्ञान
स्वरूप रूप में आनन्द रस का ज्ञान केवल ज्ञान रूप से ही आया ना कि
अन्य, रस ज्ञान रूपी ज्ञान केवल न रहा जी!
जिस को न जान कर, ना जानने रूप उस अध्यात्म के ज्ञान रूप को
अज्ञान कह रहे हो? सो अज्ञान रूप केवल अज्ञान होगा; ज्ञानानन्द रूप
ज्ञान ऐसा उत्तम स्वरूप को ना कर ज्ञान आ-के सो, आ-के रस ज्ञान रूप
ज्ञान ऐसा उत्तम आनन्द रस उस रस का अज्ञान स्वरूप ज्ञान कह कर
अज्ञान से रस कह ज्ञान, सो अज्ञान का ज्ञान स्वरूप ना तो ज्ञान कह
ना ही उस अध्यात्म ज्ञान-स्वरूप को ज्ञान ना कह कर अज्ञान स्वरूप कह
सो अज्ञान स्वरूप ज्ञान ही को ज्ञान कह रहे हो? तो ज्ञान कहो! ना ज्ञान
कहो! कह तो ज्ञान, रस केवल ज्ञान कहा
उस रस को, ज्ञान कहा तब अध्यात्म ज्ञान स्वरूप उस ज्ञान स्वरूप
केवल आनन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान का रस कहा जी, सो ज्ञान ही ज्ञेय से ज्ञान
रहा जी! ज्ञान का स्वरूप केवल ज्ञान स्वरूप ही, ज्ञान स्वरूप ना ज्ञान से ही
ज्ञान का ज्ञान उस रूप को ज्ञान रूप कहा जी, सो सो अध्यात्म ज्ञान-ध्यान
स्वरूप से ही ही ही ही ज्ञान का ध्यान रूप से ज्ञान का ध्यान सो रस, ना आनन्द
का ध्यान ना उस ज्ञान स्वरूप जी! अध्यात्म केवल जो रस कहा, केवल
ज्ञान रूप ज्ञान से अध्यात्म का रस ऐसा ज्ञान कहा सो क्या? ज्ञान क्या? सो
289

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291

इस प्रकार जो जीव इस कर्मोदयके उदय कालके परिणाम करता है उन परिणामोके निमित्तसे आगामीकालमे कर्मबंध होता है
इसलिये आत्मा कर्मके निमित्तसे इस संसारमे परिभ्रमण करता हुआ दुःखरूपी ज्वालासे जलता रहता है।
अब कर्मका उदय कैसा होता है? इस बातको स्पष्ट रीतिसे समझाते हैं। प्रथम ज्ञानावरण, दर्शनावरण,
मोहनीय, अंतराय, इन चारों घातिया कर्मोंमेसे सर्वघाती-प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभाग बंधके पीछे जितने काल पर्यन्त
बंधके योग्य स्थिति रहती है उसका प्रथम समयमे ही जो आबाधा कालका नियम है उस समयमे उस कर्मप्रकृतिके
परमाणुओकी रचना करता हुआ स्थिति आबाधा कालके समाप्त होते ही प्रथम समयमे उदयमे आनेके योग्य स्थिति रचनाको
करता हुआ बंध समयमे सर्व अनुभागको घटाता हुआ उस आबाधा कालमे सर्व अनुभागको न्यून करता है। इसतरह सर्वघातिया
कर्मोंकी स्पर्धक रचना होती है। जो कर्म बंधके समय जैसा अनुभाग बंधा था वह उदयके समय उतनाही फल देता है।
केवल ज्ञानावरण, केवल दर्शनावरण, निद्राद्विक, पंचम अंतराय, इन नौ प्रकृतियोंके बंधके समयका सर्व अनुभाग
उदीरणाके समय सर्व अनुभागको उदयमे आनेके योग्य करता हुआ उदयमे आता है। बंधके समय जिस कर्मका जघन्य अनुभाग
बंधा था वह उदयके समय जघन्य फल ही देता है। उत्कृष्ट अनुभाग बंधा था वह उत्कृष्ट फल ही देता है।
इस प्रकार ज्ञानावरण आदिक कर्मोंकी रचनाका क्रम समझना चाहिये।
भावार्थ-इस तरह जीवके मिथ्यात्व आदिके निमित्तसे बंधे हुये कर्मोंकी आबाधा समाप्त होकर उदय होता है।
यदि यह जीव अपने परिणामोंको शुद्ध रखे तो नूतन कर्मोंका बंध न हो। कर्मोंका उदय आयेगा और अपनी स्थिति पूर्ण
कर खिर जायगा। इसलिये हे चेतन ! अपने परिणामोंको शुद्ध कर ! आगामी आनेवाले कर्मोंसे आत्माका कोई संबंध न रहे।
उदयमे आये हुये कर्म तुझे कुछ भी कष्ट नहीं दे सकते।
अब आचार्य कहते हैं कि, जिसप्रकार ज्ञान चेतनाके द्वारा कर्मोंका नाश होकर मोक्षकी प्राप्ति होती है, उसीप्रकार
अज्ञान चेतनाके द्वारा यह जीव कर्मबंधको करता हुआ संसारमे परिभ्रमण करता है। अज्ञान चेतनाके दो भेद हैं-एक
कर्मचेतना और दूसरी कर्मफल चेतना। इनमेंसे कर्मचेतना तीन प्रकारकी होती है। एक तो अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी
क्रियाको करता हुआ यह परिणाम करता है कि मैं इस कार्यको करता हूँ, दूसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि मैं
इस कार्यको कराता हूँ, तीसरा अज्ञानी यह परिणाम करता है कि जो दूसरा इस कार्यको कर रहा है वह बहुत अच्छा कर
रहा है। इसप्रकार जीव मन, वचन, कायकी क्रियामे रत हुआ अपनेको कर्ता मानता है। यद्यपि जीव कर्मका कर्ता
नहीं है तथापि अज्ञानके कारण अपनेको कर्ता मानकर कर्मबंधको करता है। कर्मफल चेतनाके भी तीन भेद हैं-एक
अज्ञानी जीव सातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त हुये इष्ट संयोगोंमे सुखी होता है, दूसरा असातावेदनीय कर्मके उदयसे प्राप्त
हुये अनिष्ट संयोगोंमे दुःखी होता है, तीसरा समभाव धारण करता है। इसप्रकार सुख, दुःख और समता परिणामके निमित्तसे
अज्ञानी जीव कर्मोंका बंध करता है।
तात्पर्य-अज्ञानी जीव मन, वचन, कायकी क्रियाओंको अपनी क्रिया मानता है, जिससे कर्मोंका बंध होता है।
वास्तवमे अज्ञान चेतनाके कारण यह जीव कर्मोंके निमित्तसे होनेवाले सुख दुःखादिको अपनी आत्माका स्वरूप
मान लेता है, इसलिये इस अज्ञान चेतनाको कर्मफल चेतना कहते हैं। जो जीव कर्मोंके निमित्तसे उत्पन्न हुये सुख-दुःखको
भोगता हुआ अपने स्वरूपको भूल जाता है वह अज्ञान चेतनाका धारक है। इसप्रकार अज्ञान चेतना तीन प्रकारकी है-कर्म
चेतना, कर्मफल चेतना और अज्ञान चेतना। इन तीनों प्रकारकी अज्ञान चेतनाओंका त्याग करके प्रत्येक भव्यजीवको ज्ञान
चेतनाको ग्रहण करना चाहिये।
जैसे कोई कामी पुरुष काम चेष्टाओंसे उत्पन्न हुई तृप्तिको ही सुख मानता है, वैसेही यह अज्ञानी जीव
कर्मफल चेतनाके कारण अपने आत्माके स्वरूपको भूलकर अन्य बाह्य पदार्थोंमे सुख मानता है। कर्मफल चेतनाके कारण
कर्मका उदय आनेपर जीव सुखी दुःखी होता है, कर्म चेतनाके कारण शुभ वा अशुभ कर्मोंको करता हुआ अपनेको
कर्ता मानता है, अज्ञान चेतनाके कारण अपनेको देह स्वरूप मानता है, इसलिये ज्ञानी पुरुषोंको उचित है कि
वे कर्म चेतनाको भी त्यागें, कर्मफल चेतनाको भी त्यागें और अज्ञान चेतनाको भी त्यागें तथा ज्ञान चेतनाको
अंगीकार करें। ज्ञान चेतनाके द्वारा ही संसारके कारणभूत कर्मोंका क्षय होता है। ज्ञानी जीव अपनेको शरीर
स्वरूप नहीं मानता, कर्मोंका कर्ता नहीं मानता और कर्मफलका भोक्ता नहीं मानता। वह तो केवल ज्ञाता दृष्टा
मात्र रहता है। इसलिये वह नवीन कर्मोंका बंध नहीं करता तथा पूर्वबद्ध कर्मोंकी निर्जरा करता है। यद्यपि
ज्ञानीके भी राग-द्वेष होते हैं तथापि वह उन राग-द्वेषके परिणामोंको अपना स्वरूप नहीं मानता। वह जानता
है कि ये सब पुद्गल कर्मके विपाक हैं।
भावार्थ-जो जीव अज्ञान चेतनाको छोड़ देता है वह ज्ञानी है। ज्ञान चेतनाके प्रकट होनेपर आत्माको
यथार्थ स्वरूपकी प्राप्ति होती है। उस समय जीव अपनेको देहादिकसे भिन्न, परभावोंसे भिन्न, ज्ञाता दृष्टा
मात्र अनुभव करता है। यही ज्ञान चेतना सम्यग्दर्शन आदिकी साधक है।
यद्यपि ज्ञानीके भी अज्ञान चेतनाका सद्भाव पाया जाता है तथापि वह ज्ञानीके परिणाम नहीं हैं,
इसलिये ज्ञानी, कर्मफलको भोगता हुआ भी अलिप्त रहता है। अज्ञानी अज्ञान चेतनाके कारण बंधको प्राप्त होता है।
इस अध्यायमे प्रथम अधिकारका वर्णन किया गया।
292

विचार करके ऐसा उपाय, साधन, पुरूषार्थ करो कि सर्व जगत मात्र सब कुछ छूट भी जावेगा
केवल अपने साथ सत्-स्वरूप आत्मा ही अमर सत्य रहेगा ऐसा मान, जानकर सब कुछ को
ही असार समझ कर इस सब का मोह त्याग करके ही रहो कि सब तो, कभी ना कभी सब कुछ
छूट ही जाना सब कुछ छूट ही रहा है। इसी बात का दृढ़ निश्चय करो, केवल एक ही अमर
सत्य, अखंड एक रसम् नित्य सुख स्वरूप सब काल तीनों कालों में, अपने रूप ही को, अपने
रूप स्वरूप--सच्चिदानन्द को विचारो।
केवल अपने सत्य-आत्म स्वरूप ही को! कि यह तीनों कालों काल में भी ना कभी
भी ना-होने वाला ही सदा रहेगा
सत्-स्वरूप ही विचार ही सब कुछ सब का आधार रूप, कल्याणकारी रूप सच्चा
स्वरूप? रूप सब का आधार रूप निज स्वरूप आत्म स्वरूप ही सदा सत्य असीम अविनाशी
ही अविनाशी का सब स्वरूप ही आधार रूप कल्याण का दाता स्वरूप कल्याण अविनाशी
स्वरूप ही को अपना स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता ही है। ना कि अन्य
कि संसार मिथ्या पदार्थों स्वरूप सब का आधार रूप कल्याण का दाता हो यह सब मिथ्या
जगत को, संसार को, प्रपञ्चमय को, सब ही प्रपञ्चमय को अपना स्वरूप जानकर ना सत्य
समझ कर ना सत्य रूप मानो, सब नाश स्वरूप है।।
सत्-स्वरूप रूप केवल एक सच्चिदानन्द को अपना स्वरूप ही ना जानकर सब
प्रपञ्च स्वरूप ही को कल्याण रूप दाता सब ही का सब समझ कर प्रपञ्च स्वरूप ही
जगत् भ्रममय जगत को ही कल्याण सत्-स्वरूप स्वरूप ही सदा सत्य रूप समझकर
अपने ही स्वरूप को सत्य रूप सच्चिदानन्द को सब सत्य समझा? तो सब ही सत्य है,
कल्याण अविनाशी सब का सत्य सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब का ही ना मान करके
सदा सब कुछ को मिथ्या नाश रूप अविनाशी सब अविनाशी सब को ही सत्य
जाना ना, केवल अपने ही को अपना रूप ही सब संसार का सब कुछ ना ही जानकर
ना माना, प्रपञ्च ही माना।
अविनाशी स्वरूप ही को, अपना सत्य रूप ज्ञान ही अपना सत्य स्वरूप को,
सच्चिदानन्द--निज स्वरूप सब ही स्वरूप सब सब का सब ही अपना सब रूप सब
कल्याण ही सब कल्याण स्वरूप सब अविनाशी सब ही सब अपना ही कल्याण
सब कुछ निज स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही सब सब स्वरूप का आधार ही सत्य
सब अपना स्वरूप ज्ञान, ना अपना सच्चिदानन्द स्वरूप सब सब कल्याण का रूप ।
सब ही को अपना सच्चिदानन्द ही, ना माना सब कुछ ना ही सत्य है।।
ना सब ही अपना ना ही सब स्वरूप सब ही कल्याण स्वरूप निज स्वरूप
सब ही अपना रूप ही, ना स्वरूप ही कल्याण रूप स्वरूप, ना अपना ही,
अपना सब ही स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ज्ञान सब सब । ना अपना सत्-स्वरूप
कल्याण रूप ज्ञान । सब सब सब ही का सच्चिदानन्द स्वरूप ही सब अपना
कल्याण स्वरूप ही सब स्वरूप ही सब ही अपना सच्चिदानन्द ज्ञान ही सब का।
अपना रूप ही को, सब ही स्वरूप ही सब कल्याण रूप अपना स्वरूप
अपना ज्ञान ही सब का ही कल्याण सच्चिदानन्द ही ही ज्ञान ही ज्ञान सदा अखंड
स्वरूप ज्ञान सब का ही स्वरूप ही ही ज्ञान ही ज्ञान का ज्ञान रूप ज्ञान ही
ही ज्ञान ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ही ज्ञान ही, कल्याण ज्ञान ही ज्ञान
कल्याण स्वरूप ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही ज्ञान ही, ज्ञान ही, ज्ञान ही,
ज्ञान ही, ज्ञान ही, ना ज्ञान ही ज्ञान सदा ज्ञान ही, स्वरूप ही सब ज्ञान रूप।
केवल ही ज्ञान सच्चिदानन्द ही ज्ञान ही ही ज्ञान स्वरूप।
अपना रूप, सब ही का स्वरूप ही सब सच्चिदानन्द ही स्वरूप ज्ञान
कल्याण स्वरूप, स्वरूप--ज्ञान ही स्वरूप ही स्वरूप सब ज्ञान सच्चिदानन्द स्वरूप
ज्ञान स्वरूप सब कल्याण ही कल्याण ही सच्चिदानन्द स्वरूप सब सच्चिदानन्द ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही; सच्चिदानन्द ज्ञान स्वरूप ज्ञान
ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान रूप,
सब ज्ञान स्वरूप ज्ञान? सच्चिदानन्द ही ज्ञान ज्ञान ही ही ही ज्ञान रूप ज्ञान
स्वरूप, ज्ञान स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान सब सब ज्ञान ही ज्ञान ज्ञान सच्चिदानन्द
ज्ञान सब सब सब ही सच्चिदानन्द ही स्वरूप सब ही स्वरूप ही, सब कल्याण ही
स्वरूप ही ज्ञान ज्ञान
ज्ञान ही सब ही ही सब ही ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान सब ही ज्ञान ज्ञान सब
ज्ञान सब सब ही ज्ञान स्वरूप ज्ञान, ज्ञान ज्ञान ही ज्ञान ही ही ज्ञान ज्ञान ही
सब ज्ञान--ज्ञान ज्ञान ही स्वरूप ज्ञान
"सत्य-रूप ही ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान स्वरूप स्वरूप है।"
293

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294

इस प्रकार जब विश्वामित्र का प्रभाव बहुत बढ़ गया अथवा उनके प्रभावकी सीमा
का पार न रहा तब यह बात सब ओर फैल गई। सब-जगह लोग विश्वामित्र के इस काम की
भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे। वशिष्ठजी का यह द्वेष देखकर देवराज इन्द्र को बड़ा आश्चर्य
हुआ। वे सोचते थे कि वशिष्ठजी को काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर कोई विकार
छू--तक नहीं सकता था, पर वे इस बात पर ध्यान न देकर विश्वामित्र को सता रहे हैं। क्या वशिष्ठजी
मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं? क्या वे मुनि नहीं हैं?
विश्वामित्र महात्मा वशिष्ठ की बात सुनकर अपने घर चले गये। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को फिर कामधेनु के
लिये बहुत तंग किया। वशिष्ठजी ने उनसे कामधेनु को छीना। विश्वामित्र ने सोचा, यह वशिष्ठजी बड़ा भारी
अनर्थ कर रहे हैं।
अब राजा विश्वामित्र ने इस बात का निश्चय किया कि मैं अपने बल से कामधेनु को वापस लाऊँगा।
विश्वामित्र बहुत-से बाणों द्वारा वशिष्ठजी को मार-मारकर मार डालने लगे। वशिष्ठजी को विश्वामित्र ने बाणों
से आच्छादित कर दिया। वशिष्ठजी ने मुसकराते हुए कहा, “हे राजन्! तू मुझे अपने बाणों से मारना
चाहता है। तू क्षत्रिय-तेज से वशिष्ठ को पराजित करना चाहता है। यह असम्भव है। क्षत्रिय-तेज से ब्रह्म-तेज
बहुत बड़ा है। यह कहकर वशिष्ठजी ने विश्वामित्र के बाणों को शान्त कर दिया।
इस बात को सुनकर विश्वामित्र ने विचार किया, मैं ऐसा काम क्यों करूँ? उन्होंने सोचा
कि मैं तप द्वारा वशिष्ठजी से ब्रह्मतेज प्राप्त करने का विचार करता हूँ, क्योंकि क्षत्रिय-तेज
ब्रह्म-तेज के सामने कोई चीज नहीं है। इसलिए मैं तपस्या करूँगा। विश्वामित्र ने तपस्या
आरम्भ कर दी। वे कठोर तपस्या करते-करते सब-कुछ छोड़कर वन में चले गये। विश्वामित्र ने
ऐसा तप किया, जिस तप के प्रभाव से विश्वामित्र ब्रह्मर्षि हो गये।
जब इस बात का विश्वामित्र को पता लगा कि वशिष्ठजी मेरे से बहुत प्रसन्न हैं, इसलिए विश्वामित्र
वशिष्ठजी के आश्रम में जाने का विचार करने लगे। वशिष्ठजी के आश्रम में जाने से पहले विश्वामित्र ने
एक कुल्हाड़ी अपने पास रख ली।
रात्रि का समय था। उस समय वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से कहा, हे अरुन्धती!
आज की रात बड़ी सुहावनी है। आज चन्द्रमा का प्रकाश बहुत ही अच्छा लग रहा है। अरुन्धती
ने अपने पति वशिष्ठजी के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, महाराज! क्या बात है कि आज की
रात सुहावनी दिखाई दे रही है? विश्वामित्र ने इस बात को सुना। उन्होंने अरुन्धती के वचनों को
सुनकर सोचा कि वशिष्ठजी विश्वामित्र की प्रशंसा कर रहे हैं। वशिष्ठजी ने अपनी पत्नी अरुन्धती से
कहा कि हे अरुन्धती! विश्वामित्र का तप विश्वामित्र के समान आज की चांदनी के समान चमक रहा
है। यह बात विश्वामित्र ने सुन ली। विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरणों पर कुल्हाड़ी रख दी।
विश्वामित्र ने हाथ जोड़कर वशिष्ठजी से कहा, हे मुनिवर! विश्वामित्र को क्षमा कर दो। वशिष्ठजी
बोले कि हे विश्वामित्र! यदि तुम पहले से ही ऐसा कर लेते तो आज तुम ब्रह्मर्षि बन जाते।
जब तुमने वशिष्ठ को देखा तब तुम्हारे मन में एक बात थी और जब तुमने दूसरे को देखा तब
तुम्हारे मन में दूसरी बात थी। जब तुम्हारे मन में दोनों बातें एक जैसी हो गईं तब विश्वामित्र
ब्रह्मर्षि बन गये।
विश्वामित्र ने वशिष्ठजी के चरण स्पर्श किये। विश्वामित्र ने सोचा कि वशिष्ठजी के चरणों
में बड़ा भारी सुख है। विश्वामित्र के मन में कोई बात नहीं रही। वशिष्ठजी ने विश्वामित्र को
गले से लगा लिया।
विश्वामित्र ने अपने मन में विचार किया कि जब तक संसार में मनुष्य अपने कर्त्तव्य
का पालन नहीं करता तब तक वह कभी भी तरक्की नहीं कर सकता।
जब मनुष्य किसी काम को अपना कर्त्तव्य समझकर करता है, तब उसका वह काम अवश्य पूरा
होता है। जो मनुष्य अपने कर्त्तव्य को ठीक तरह से पूरा करता है, तब उसका यश संसार में चारों
ओर फैल जाता है। ऐसे मनुष्य का नाम संसार में अमर हो जाता है। विश्वामित्र अपने कर्त्तव्य में लगे
रहे। विश्वामित्र ने तपस्या की। विश्वामित्र ने अपने जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया। विश्वामित्र
का यश चारों ओर फैल गया। विश्वामित्र ने सोचा कि मनुष्य का धर्म है कि वह अपने कर्त्तव्य का
पालन करे।
कर्त्तव्य का अर्थ है कार्य। जब मनुष्य अपने कार्य को भली प्रकार से पूरा करता है, तब
वह संसार में यश प्राप्त करता है। विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। वशिष्ठजी ने
विश्वामित्र के कर्त्तव्य का पालन करने के कारण विश्वामित्र को अपने हृदय से लगा लिया था। विश्वामित्र
एक तपस्वी थे। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से ब्रह्मर्षि-पद को प्राप्त किया था। विश्वामित्र ने अपने
जीवन में तपस्या को मुख्य स्थान दिया था। विश्वामित्र ने तपस्या के बल से संसार को दिखा
दिया कि मनुष्य अपने कर्त्तव्य के बल से सब-कुछ प्राप्त कर सकता है।
इस प्रकार विश्वामित्र ने अपने कर्त्तव्य का पालन किया। संसार में कर्त्तव्य का पालन करने से मनुष्य
का यश चारों ओर फैल जाता है। मनुष्य को अपने जीवन में कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। कर्त्तव्य
का पालन करने से मनुष्य का यश बढ़ता है। कर्त्तव्य का पालन मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है।
295

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296

विषयाभिलाष तीव्र कषायरूप भाव न करना, इन तीव्र कषायरूप भावों सहित यदि कदाचित् मन्द
न होवे तब, कदाचित् मन्द कषायरूप भी किया तो उसका फल मिलेगा
निदान तो धर्म नहीं यह निश्चय पर भरोसा रखकर किया है, निदान भी किया तो फल
मिलेगा परन्तु वह फल उसका जीव को--संसार सुख भोग रूप प्राप्त फल भोगने पर भी तृप्त नहीं
होगा और ऐसा उपाय भी--संसार के विनाश रूप तो नहीं पर मोक्ष के उपाय रूप धर्म नहीं यह
जीव ऐसा विचार करके कि यह सब अनादिकाल का ही मोह उदय, निदान का फल भोग, सो तो
अनादिकाल पर्यन्त भोग रहा ही आया पर उसका फल अहित, ऐसा जो जानकर भी निदान रूप भाव
महापापरूप परिणाम को जो जीव उत्तम परिणाम रूप मानता, सो वह मिथ्यादृष्टि ही होकर
अहित फल भोग कर इस संसार परिभ्रमण-दुःख पावेगा! इस विचार से सब जीव अपने मन में इस
प्रकार का सन्देह न राखिये, अर्थात्, निदान, संक्लेश परिणाम रूपभाव महाकष्ट दायक जान कर
इन भावों भाव को दूर कर ही अपने शुद्ध भावों का साधन करो
निदान का त्याग कर ऐसा विचारना कि यह तो सब पर का सुख सो पुण्य का उदय संबन्धी
सब विकार रूप ही है इस भोगरूप सुखनिधान परिणामन मन्द, तो फिर क्या फल? इस विचार
से पुण्य का फल भी मत चाहो, अर्थात् विषय कषाय भोगों को! विचार कर त्याग ही करना चाहिये,
इससे केवल पाप उदय ही, संसार का मार्ग नष्ट हो कर मोक्ष पावेगा! विचार करो कि भोग
सुख का त्याग सब शुद्ध मोक्ष परिणाम ही, केवल मोक्ष पद का सुख ही जीव उत्तम सुखकारी
ऐसा निश्चय मानकर संसारिक सुखनिधान भाव को त्यागो और जो उत्तम निश्चय करो?
अब इस उपशम के स्वभाव का जो भाव सो संशय-विहीन मोक्ष सुख के करने वाले निश्चय-
सम्यक् विशुद्धरूप विशुद्ध केवल विशुद्ध है, संशय-विहीन परिणाम ही सम्यक् विशुद्ध भाव
जिस रूप विशुद्ध भाव करके ही मोक्ष रूप विशुद्ध फल जीव को प्राप्त हो, ऐसा जानना
योग्य
जिसके हृदय सम्यक्त्व का उदय स्वरूप विशुद्ध हो सो सम्यक् ज्ञानी जीव इस संसारिक
सर्व सुख संबन्धी भाव विषय कषाय आदि महापापरूप को त्याग करके निश्चय मोक्ष मार्ग
ज्ञान भाव, केवल ज्ञान स्वरूप संचेत, केवल पद विशुद्ध-स्वभावानन्द में ही मन को लीन करता
हुआ स्वरूप, निज पर भावों सहित नहीं है, स्वरूप पद का संशय रहित ज्ञान द्वारा निश्चय
मोक्ष मार्ग सुखों को ही केवल मोक्ष सुखस्वरूप जान कर इस संबन्धी निश्चय करे?
सम्यक्त्वि जीव को, संशय-हीन भाव धारके, जो जो ज्ञान धार कर मन में राग भाव आया,
उसका भी पर त्याग करके सो सब त्याग किया उस परिणाम से मोक्ष स्वरूप भाव को ही पर
ही का त्याग करके शुद्ध स्वरूप ही, जो यह संबन्धी पर उपशमस्वरूप को जान कर विशुद्ध
ज्ञान सम्यक्त्व को विशुद्ध जानके पर भाव को त्याग, इस ही स्वरूप भाव सहित विशुद्ध
सम्यक्त्व का भाव जान, जो ज्ञान उस भाव का फल मोक्ष भाव ही प्राप्त किया जिससे कि
मोक्ष फल प्राप्त न हो सके, सो सब त्याग करके विशुद्ध पद पावे
जो शुद्ध स्वरूप सम्यक्त्व पर्याय को मन से जो ध्यावे दिन--अरु रात दिन--अरु रात!
सब सब जो भाव संशय त्याग करके सो जीव सो सब अज्ञान विकार सहित विषय को त्याग करके
शुद्ध स्वरूप सम्यक् भाव को ही केवल निज भाव जानता है, अर्थात् विषय कषाय को त्याग
शुद्ध स्वरूप ही का भोग जानके सो सम्यक्त्व भाव को ही मोक्ष स्वरूप निश्चय मोक्ष
विशुद्ध को निज संशय-विहीन पद को केवल सम्यक् विशुद्ध परिणाम से ही सं-विहीन पद
केवल शुद्ध पद स्वरूप सम्यक्त्व पद को निज सुखदायक भाव को केवल विशुद्ध सम्यक्त्वस्वरूप ही
जीव मान कर केवल सम्यक् स्वरूप रहा, यह इसका अर्थ
सम्यक्त्व को केवल सम्यक् विचार कर केवल परिणाम ज्ञान रस को पान ही करे,
जो पर्याय सो विशुद्ध पद केवल पद केवल विशुद्ध ज्ञान स्वरूप सम्यक्त्व विशुद्ध पद संशय-
हीन केवल पर्याय को विशुद्ध पद सम्यक्त्व स्वरूप जाने? सो ही सम्यक्, केवल ज्ञान पद,
सब ही ज्ञेय को जानने से सब संशय पद को नाश करके केवल ज्ञान स्वरूप प्रगटावे, केवल
ज्ञान सब ज्ञेय केवल जाने, केवल ज्ञान सब संशय पद को नाश कर केवल स्वरूप
प्रकाश सब ज्ञेय केवल रूप से मोक्ष स्वरूप ही सम्यक्त्व स्वरूप को जान सके? ऐसा
जो सम्यक् स्वरूप सो केवल विशुद्ध
सो सम्यक्त्व स्वरूप भावार्थ इस रूप सो जो केवल ज्ञान इस केवल पद को केवल ज्ञान
रूप न जान कर जो केवल ज्ञान संशय ज्ञान रूप सम्यक्त्व को निज ज्ञान स्वरूप ज्ञान
मन्द भाव सम्यक्त्व का ही भाव जाने, जो सम्यक्त्व को सम्यक्त्वस्वरूप ही, संशय रहित
जाने! केवल ज्ञान सम्यक्त्व, सो केवल पद, केवल सम्यक् केवल जाने! सो केवल
भाव सो, केवल ज्ञान केवल संचेत रूप, केवल ज्ञान सब ज्ञेय सब को नाश स्वरूप
ज्ञान का ही भाव, सो केवल ज्ञान केवल स्वरूप केवल ज्ञान
संशय रहित ज्ञान सम्यक् भाव, संशय ज्ञान सम्यक् सम्यक्त्व केवल परिणाम
ज्ञान का फल जो मोक्ष फल सो सम्यक्त्व संशय-विहीन सो केवल परिणाम विशुद्ध केवल सं--
297

तथा ज्ञान, तथा ध्यान, तथा विद्या इत्यादि साधनों का तो क्या काम जहाँ आनन्दमय स्वरूप
का वास, जहाँ वासना रूप विषय-भोग का सम्बन्ध ही, वहाँ काम क्रोधादिक माया का चक्र-व्यूह रहता
होगा ऐसा जान कर उन सब मुनियों ने एक मत हो कर श्री सच्चिदानन्द-घन प्रभु श्रीकृष्ण
भगवान् के चरणारविन्दों का आश्रय ग्रहण किया जिससे वे सब के सब अनायास ही इस
भव-सिन्धु पार उतर गये, तब शुकदेव जी, जो जन्म-काल सेही ज्ञानी तथा निष्काम रूप
भगवान् के स्वरूप का ध्यान धरके उस समय ध्यान-मग्न हो गये।
हे महाराज ! तब यह सब कौतुक देख, राजा परीक्षित ने भी विचार किया कि
अरे रे! यह क्या हुआ, भूल तो हुई, पर बड़े भारी पुण्य-कर्मों के उदय से हुई। जो भगवान्
ने मुझे मुनि के पास भेजा और मुनि ने मुझको शाप दिया।
हे महाराज ! राजा ने ऐसा विचार कर अपने पुत्र को राज्य-भार देकर आप
संसार से विरक्त हो, श्री गंगा जी के तीर पर जा बैठे और आमरण अनशन
का व्रत धारण किया।
उसी समय व्यास, पराशर, शुकदेव, नारद, दुर्वासा, विश्वामित्र,
कश्यप, भृगु, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, अत्रि, भारद्वाज, अगस्त्य, कण्डु, च्यवन,
कण्व, मैत्रेय, दालभ्य, और्व, आपस्तम्ब, मार्कण्डेय, शतानन्द, भारद्वाज,
कपिल आदि बड़े-बड़े महर्षि अपने-अपने शिष्यों सहित वहाँ आये।
राजा परीक्षित ने सब मुनियों का चरण-स्पर्श कर यथायोग्य पूजन किया
और हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि, “हे मुनीश्वरो! कृपा करके मुझे वह साधन
बताइये जिससे मेरा कल्याण हो और श्री भगवान् के चरणों में मेरा मन लगे।”
राजा के ऐसे वचन सुन कर सब मुनियों ने आपस में विचार किया। कोई
कर्म काण्ड को श्रेष्ठ कहने लगा, कोई ज्ञान को, कोई योग को और कोई
तप को उत्तम बतलाने लगा। जब मुनियों में मत-भेद हुआ, तब राजा ने
कहा कि “हे मुनीश्वरो! मुझे ऐसा उपदेश दीजिये जिससे सात दिन में मेरा
उद्धार हो जाय।”
जब सब मुनि आपस में विचार कर ही रहे थे कि इतने में श्री शुकदेव जी
वहाँ पधारे। शुकदेव जी को देखते ही सब मुनि उठ खड़े हुए और उनका
बड़ा आदर-सत्कार किया। राजा परीक्षित ने भी शुकदेव जी के चरणों में
प्रणाम किया और प्रार्थना की कि, “हे भगवन्! कृपा करके मुझे वह कथा
सुनाइये जिससे मेरा उद्धार हो जाय।”
शुकदेव जी ने कहा, “हे राजन्! सुनो, मैं तुम्हें वह कथा सुनाता हूँ
जिसके सुनने से मनुष्य सब पापों से छूटकर भगवान् के परम पद को प्राप्त होता है।”
298

इस प्रकार महाराज पृथु--द्वारा अभिनन्दित भगवान् ने भी प्रसन्न हो राजा को, जिनका
हृदय शुद्ध था।
अहो, राजा का भगवान् मधुसूदन और उनके भक्तों के प्रति कितना दृढ़ और अनन्य
प्रेम था! वे भगवान् सबके हृदय की बात जानने वाले हैं। अतः उन्होंने राजा के निष्कपट
प्रेम भाव को देख लिया और वे प्रसन्न हो गये। वे, जो सबके नियन्ता
"भगवान् ने कहा कि हे वीर, हे राजा ! मैं तुम्हारे इस यज्ञ से बहुत ही प्रसन्न हूँ--जिसमें
कि यज्ञ--कर्ता ने भी, अर्थात् तुमने भी अपने हृदय में मेरे प्रति अनन्य भक्ति भाव को ही
सब कुछ मान कर यज्ञ किया था।"
जो पुरुष इस प्रकार निष्काम भाव से यज्ञ करता है,
वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
इस प्रकार के पुरुष को सब प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं।
जो लोग इस संसार में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस
लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--परलोक में, अर्थात् इस लोक--

अध्यात्मशास्त्र कहता नहीं विभावभावों जानो, किन्तु यह जीवविभावभावों को क्यों जानेगा
जानेगा? विभावभाव तो अपने रूपको नहीं जानते किन्तु जीव, स्वरूप को और विभाव भावको
सब प्रकारोंसे जान रहा है, इससे सिद्ध होता है कि सब प्रकार ज्ञाना ही काम रहा
है। पर्याय स्वभाव रूप परिणत ज्ञान हुआ विभाव भाव नहीं था किन्तु ज्ञानका ही रूप था।
ज्ञान जब इस बातको जान लेताहै कि यह सब विभाव भाव तो केवल ज्ञेय ही हैं ज्ञेयका
स्वभाव ज्ञायक भावका नहीं हो सकता है, ज्ञान का स्वभाव तो, ज्ञायक ही
रूप है तब ज्ञानी का ज्ञान विभावोंसे भिन्न अपने ज्ञायक भाव में लीन हो जाता है,
इसमें विभावका विभावपनाभी नष्ट हो जाता और केवल ज्ञानका रूप बना रहता है।
ज्ञान जब विभाव में ज्ञानकी ही कल्पना कर लेता है तब वह विभाव रूप
हुआ! जो ज्ञान यह या उस ज्ञान रूप हुआ उस ज्ञानका कभी नाश नहीं हो
सकता। जो इस ज्ञान को विभाव से भिन्न है, जान लेता, सो वह ज्ञान,
वह ज्ञेय, वह दृष्टा, विभावको त्याग देता है सो ऐसा विभावका त्याग
केवल ज्ञानका ही काम होताहै न कि विभावका । जिस प्रकार
ज्ञान पर्याय का इस बात का ज्ञान हो जाता है कि विभाव केवल ज्ञेय रूप
ही है तब ज्ञानी अपने ज्ञान स्वभाव को विभाव से सर्वथा भिन्न ही
मान लेता है ज्ञान में विभाव का प्रवेश नहीं होने देता है। जब ज्ञानको यह
मालूम हो जाताहै कि इस विभावका मेरे साथ सम्बन्ध ही नहीं केवल ज्ञेयका ज्ञायक
रूप सम्बन्ध है तब विभाव अपने आप नष्ट हो जाताहै तब ज्ञानका ही परिणमन
सब प्रकार विभावों रूप से न होकर केवल ज्ञाना रूप ही होता रहताहै
जो सर्व तरह से, ज्ञान मात्र ही, उस ज्ञान में विभावका
लेश मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता है, ज्ञानी पुरुषोंका उपदेश
ही इस बात का रहता है कि अपने ज्ञायक भाव को सर्वथा विभाव से भिन्न
ही जानो क्योंकि विभाव मात्र पराधीन परिणाम हैं जिनसे कि कभी भी
ज्ञान का लाभ नहीं हो सकता केवल ज्ञानका विभाव-भाव केवल
ज्ञेय रूप होकर केवल ज्ञाता रूप ही रहता है उस रूप कभी नहीं हो सकता
केवल यह अज्ञान भाव है।
सब ही प्रकार से यह ज्ञान ही सिद्ध होता है कि संसार में
विभाव, जो भी काम इस के द्वारा होता वह केवल ज्ञान का ही
चमत्कार है न कि अज्ञानका, अज्ञानका तो कोई रूप नहीं,
जो कुछ रूप है सो ज्ञान ही का है? विभावका नाश होने पर ज्ञान ही तो
रहा, सो अज्ञानका नाश हो ही गया, फिर क्या, केवल ज्ञान; केवल
ज्ञान का ही काम विभाव रूप से ज्ञान को भिन्न करना है, सो ज्ञान ही
तो ज्ञायक है, सो ज्ञान ही ज्ञायक भाव से भिन्न कभी नहीं
सब प्रकार अज्ञानका ही त्याग हो जाना संभव है जो कि ज्ञान
द्वारा ही ज्ञानका स्वभाव अपने ही रूपमें परिणत हो जाता है।
ज्ञानी सब विभावों को अपने रूप से भिन्न ही समझ कर कभी विभाव
रूप नहीं परिणमता किन्तु अपने ही ज्ञान स्वभाव में ही लीन
रहता है तब ज्ञान को विभाव रूप कौन कहेगा? जब ज्ञान विभावका नाश
कर केवल अपने स्वरूप मात्रमें परिणत हो जाता है तब कौन विभाव कह
सकता है तब विभाव कहाँ रहा ? ज्ञानी ज्ञान मात्र ही रहा फिर
ज्ञानका विभाव का सम्बन्ध कहाँ से हो सकता है?
जब ज्ञान ही ज्ञान रूप में लीन हो जाता तब ज्ञान
का ही काम होता है तब ज्ञान विभाव रूप से ज्ञान को ही भिन्न
ज्ञान रूप करता है तब यह ज्ञान ही तो ज्ञानका सब कुछ काम
ही तो करता है, इस बात, को जान कर ज्ञानी सब रूप से अपने
ज्ञायक... से ही परिणत होता है सो ज्ञान ही ज्ञेय, ज्ञान ही ज्ञाता
होता है।
अब दो गाथा द्वारा इस विषय-को
ही और स्पष्ट करते हैं कि।
सब ज्ञानी जो कि हैं, वे पुद्गल-कर्म फल को जानते हुए
ही रहते, उनका वे कभी परिणमन नहीं करते न ही बँधते हैं,
जिससे कि केवल ज्ञानका रूप ही बना रहता है जो कि ज्ञान केवल ही ज्ञानी
रूप होता है न अज्ञान रूप, सो सब प्रकार से, जो कुछ भी ज्ञान
का काम रहा सो, सो ज्ञानीका ज्ञान ही।
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