एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)
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प्रत्येक वस्तु अपने मूल को छोड़ती नहीं उसकी जड़ पेड़ को छोड़ देती है। यह सर्व धर्म का नियम है।
दार्शनिक विचारक रूप से सब अपने जीवन सत्य से विलग हो रहे हैं। मनुष्य कितना भी धन
कमाले, मकान या महल या तिजोरी का मुंह कितना बड़ा या छोटा हो लेकिन आत्मिक शान्ति-
के दो, दो बात अपने बच्चों से बोलना वह भूलता
जाता है। मनुष्य रूपी यह पेड़ जब जड़ों रूपी बच्चों से दूर हो रहा है। इसके लिए
सब एक ही बात स्वीकारते नजर आते हैं, मनुष्य अब अपने मूल को भूल
कर भौतिक रूप में ही जीवन की सार्थकता देख रहा है। वह परिवार रूप में
परिवार को भूल गया। मनुष्य के भीतर जो अमृत था वह विष रूप में परिवर्तित
हो गया, मनुष्य जब तक अपने को इस जहर से मुक्त नहीं करेगा तब तक
वह न तो शांत रह सकता और न ही परिवार को संस्कारित कर सकता
है। वह, परिवार का नाम लेते ही यह प्रश्न खड़ा कर देता है कि परिवार से ही
सब कुछ होता तो फिर लोग अपने परिवार को छोड़कर बाहर क्यों जाते?
तब तो सब अपने घर में रहकर ही सब कुछ पा लेते। लेकिन यह सच नहीं
है, जब तक-परिवार को सही दिशा नहीं मिलेगी तब तक मनुष्य का
मन शांत नहीं होगा।
यह बात सत्य अवश्य माननी पड़ेगी कि परिवार ही मनुष्य का पहला स्कूल है,
लेकिन मां, बाप, भाई, बहिन के रिश्तों को समझने का माध्यम भी तो होना ही
चाहिए। इसके लिए सब से पहले मां, बाप अपने को संस्कारित करें ताकि बच्चों
को भी यह सब नजर आ सके। मनुष्य जब तक खुद को इस बात के लिए तैयार-
नहीं करेगा तब तक इस समस्या का हल होना मुश्किल नजर आ रहा है।
इस पर सब चुप थे, इसलिए उन्होंने फिर अपनी बात को आगे बढ़ाते
हुए कहा कि मनुष्य को यह समझना ही पड़ेगा कि उसके पास जो कुछ बचा
है उसे वह संभाल कर रखे। भौतिक सुख मनुष्य को कभी भी संतुष्ट नहीं
कर सकते।
मनुष्य का स्वभाव भी विस्मृत सा रहता है। वह सुख-दुःख की बात तो
बहुत करता दिखाई देता है लेकिन वह मन-बुद्धि, चित्त को नहीं
समझ पाता। मन के पार जाने की, बात वह करता तो है, लेकिन मन के पार तो
सुख-दुख दोनों एक हो जाते हैं। मनुष्य सुख चाहता है लेकिन उसके लिए
शांत, एकाग्र और निर्विकल्प होना जरूरी है। इस बात की शिक्षा मनुष्य
को घर से ही मिल सकती है। मनुष्य यदि अपनी दृष्टि को स्थिर कर ले, तो वह
सत्य को देख सकता है। सत्य को जानने के लिए, मनुष्य के पास विवेक दृष्टि
होना जरूरी है।
मनुष्य के स्वभाव के पीछे--जो शक्ति छिपी हुई है वह अनासक्ति भाव से परि-
पूर्ण है, और इस भाव को जगाए बिना मनुष्य का जीवन सफल कैसे हो
सकता है? मनुष्य अपने-आप सवाल करता है कि क्या कारण है, कि मैं सब कुछ पा
कर भी संतुष्ट नहीं हो पाता? संतुष्टि कहां है? मनुष्य बहुत दुखी है!
उसका अंतःकरण मथ रहा है। उसे अपने को जानना होगा। उसके
लिए यह जरूरी है कि वह अपनी चेतना को जागृत करे, जो उसकी आत्मा
को शांति प्रदान करेगी।
जब तक वह अंतर्मुखी होकर परमात्मा के ज्ञान को नहीं समझेगा
तब तक उसे सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता। मनुष्य को यदि अपने
को समझना है, तो अपनी वृत्तियों को वश में रखना होगा। अपने शरीर में
जो प्राण है उसकी गति को साधना होगा, तभी परमात्मा का ज्ञान
संभव है।
आज मनुष्य मन को न समझकर केवल बुद्धि की बात करता
है। बुद्धि तो सांसारिक सुख की ओर ही ले जाती है। बुद्धि से मन
कभी शांत नहीं हो सकता, वह केवल विषय वासनाओं की प्यास बढ़ाती
जाती है। बुद्धि मनुष्य को अहंकार की ओर ले जाती है। यदि मनुष्य
इस पर विजय प्राप्त कर ले तो अपने जीवन को सफल बना सकता है।
जीवन को परमात्मा रूप समझकर जब मनुष्य जीने लगेगा, तभी
वह अपने आप को समझ पाएगा। ऐसा जीवन मनुष्य को मुक्ति दिलाता
है। वह इस पथ पर चल कर परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
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उपलब्ध पृष्ठ पर प्रयुक्त फ़ॉन्ट (Font) के करप्ट/मिसिंग होने के कारण सम्पूर्ण देवनागरी पाठ केवल आयताकार बॉक्स (Tofu/Missing glyphs '▯') के रूप में प्रदर्शित हो रहा है, जिससे मूल पाठ पढ़ा नहीं जा सकता। केवल पृष्ठ संख्या ही पठनीय है:
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135
एक राजा अपनी सेना को लेकर जब किसी वन तरफ निकला व प्यासा हुआ तो एक ग्वाले को
वहाँ उपस्थित देख कर उससे जल माँगा तो उस ग्वाले ने शीतल सुगन्धित जल लाकर राजा को दिया,
जिसको पाकर राजा का मन बहुत प्रसन्न हुआ, वह विस्मित हो विचारने लगा, यह ऐसा स्वादिष्ठ
व सुगन्धित जल, अथवा इसके निकट का वातावरण इतना उत्तम क्यों, यह विचार विचार कर
उसने ग्वाले को इस स्थान विषयक सब भेद पूछा जिसके उत्तरमें ग्वालेने कहा कि यहाँ एक
महात्मा रहते, व जिनका
यह सब उत्तम प्रभाव देखने में आ रहा, पर महात्मा किसीसे बोलते अथवा बात न करके
मौन रहते वा ईश्वर के ध्यानमें लीन रहते हैं, जिसको सुनकर राजाको आश्चर्य हुआ
क्योंकि केवल मौन? तब राजा उस महात्माके दर्शन को व उस जल को देख आश्चर्य
करने लगा पश्चात् राजाने महात्माको, यह प्रश्न किया?
एक बार किसी विषयक बातों का जो एक बार उत्तर दिया, सो उस उत्तर व उस महात्माके
तपस्वी स्वरूप देखकर राजा विस्मित हुआ कि बिना तप के यह सब फल नहीं मिल सकते
वा महात्मा केवल मौन नहीं है, किन्तु यह आत्म ज्ञानमें वा परमात्माके भी ध्यान विषय ज्ञान रखता
हुआ सब भेद ज्ञान रखता जान कर के, जो एक बार जल का कारण का उत्तर मिला इसलिए?
राजाको यह दृढ़ निश्चय हुआ कि इस महात्मा द्वारा, मेरे मनका अज्ञान दूर हो सकता है। जिससे
कि राजा को भेद वा, अज्ञानताके कारण भ्रम था, जो दूर हुआ, अब मन शांत हुआ व राजा
विचारने लगा कि, अरे मन! महात्माके केवल शारीरिक स्वरूपको देख धोखा खाया जिस
पर अज्ञानताके कारण अज्ञानतावश यह भ्रम उत्पन्न हुआ था, उस अज्ञानता को, इन पूर्ण
महात्मा ने शांत कर दिया आदि।
इस लिए शिष्यका यह पहला कर्त्तव्य हो, जो सब प्रकार का मन शांत कर, पहले दिए
हुए सब उपदेशको मन शान्त करके सुने, ना कि दूसरेके रूप रंगको देख कर, अथवा
मन में यह बात धारण करके, ज्ञान ग्रहण करनेवाला शिष्यके गुण का पूरा लाभ उठाए
तथा दूसरेके मन को भी अपने दुर्गुण अथवा चंचलता द्वारा ना ही कष्ट पहुँचाए? जिससे दोनों
तरफ हानि होनेका सम्भव जान कर पश्चात् जो कुछ शिक्षा का लाभ, अथवा सन्मार्ग का
बोध हो सके आदि।
चौथा नियम यह कि प्रत्येक को इस बातका सदैव ध्यान हो कि जब व किसी
सत्संग वा शुभ कार्य पर या किसी सत्-संग स्थानपर जाएँ तो अपने मन को
काम-क्रोध विकारों से तथा मन की चंचलताके या विषय वासनाओं से बचाए रखें, ना
कि सत्संगपर जा कर भी, वासनाओं विकारों को मन द्वारा अपने अन्दर बसाए
वा विचार करे, कि दूसरा किस कर्ममें है, क्या कर रहा, ना ही उस कर्मको अपने
अन्दर जगह देवे वा, अपने मन को, शांत रखे वा, जिस मन द्वारा सत्संग अथवा
सत्संगके उत्तम उपदेशको ग्रहण करके अपने आचरणको शुद्ध बनानेका सदैव
यत्न
हो सके ऐसा करे, "सत्संग मनुष्य के लिए सब से उत्तम साधन है"
इस लिए मन को सदैव
सत्संगके वचनों पर ध्यान दे कर शुद्ध रखने की यत्न करे। सत्संग
विचार को शुद्ध करे, अशुद्ध को सब त्याग देवे, क्योंकि सत्संग ही ऐसा है कि जिस से
सब प्रकार का लाभ मिले इसलिए केवल सत्संग का ही लाभ ग्रहण करना चाहिए
जिस लाभ से प्राणी सब ही सब प्रकारके क्लेशों से छूट कर शान्तिको प्राप्त कर के
ना कि, इन वासनाओं वा सांसारिक प्रपंचों द्वारा तन-मन, बुद्धि-चित्त, सब
कर्म, कर्मेन्द्रियों, सब को दूषित बनाकर अज्ञानता विस्तार कर ले।
इस लिए जब सत्संग रूपी साधन मिला हो, जिस कल्याणकारीसाधन,
सच्चा सन्मार्ग मिला हो, तब मन को एकाग्र कर सत्संग रूपी रस ग्रहण कर के
जो कुछ अशुद्धता वा विकार था, उस को दूरकर व अपने अज्ञानको दूर करने का
जो सब लाभ का पूरा लाभ उठाए? सो ही उस साधन व ज्ञान दाता दाता का भी यश होगा
तथापि यह खुद संसार को छोड़ जाएगा? सो सब गुण का साधन ही सच्चा सत्य
कार्य कहा गया
पाँचवाँ नियम यह उपदेशका तथा जो उपदेशको मन द्वारा धारण किए हुए पूर्ण
सत् गुरु स्वरूप, जिस आज्ञा का पूर्ण रूप पालन करे व उसी अनुसार अपने मन को सब
ओर से हटा कर, उस एक चरणमें वा, उपदेश में, ध्यान को पूरा लय करे... ।
अर्थात् सो, उस आज्ञा रूपी हर एक बचन द्वारा आज्ञा अनुसार अपना मन
लगा कर सब ओर ध्यान को ना भटकावे ना ही मन रोके, ना ही मन को इस बात तरफ
दौड़े कि यह क्यों हुआ वा वह क्यों हुआ सो, इस प्रकार अहंकारको दूर कर शुद्ध मन को
गुरुके हर बचन रूप चरण आज्ञा में, अर्पण कर के सब प्रकार अज्ञान रूपी, मोह
136
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137
यद्यपि काम रूपी साँप का विष चढ़ता ही, क्योंकि कामके वशीभूतहोकरजीवका विवेक नष्ट होकर जाता है,
तथापि इस विषका यह स्वरूप समझ करके इसका प्रतीकार
करना ही तो विवेकीका कर्तव्यहै। काम रूपी सर्प का फण कामकी तृष्णा रूपी मणि
युक्त जो दिखाई पड़ताहै उसीपर पैर रख देनेसे सर्पका मुखमण्डल पिसता, हां, उसकी तृष्णा दूरहोनेसे
उसका पराभवहोता है। जो कामकी तृष्णा नष्ट नहीं करसकते वेही कामरूपी सर्पके फटके मुखमें
पड़े रहकर यम का दूत अपने हाथमेंरहनेवाले यम दंडसे, उनके शिरपर प्रहार करके उनको पीडित
करता है, उस समय, उनके केवल प्राणमात्र रहतेहैं और ऐसा दुख भोगते भोगते वे
नारकीके समानहो जातेहैं... ॥
केवल इतनाही नहीं काम पीडित जीव काम क्रीडामें लीन होकर अनेक अकृत्यका साधन
करके अनेक पापका अर्जन करता, काम से अन्धा हुवा मनुष्य तो मन चाहा बोलता, अनुचित
कार्य करता, अन्याय को ही न्याय समझ कर बिना विचारे धर्मात्मा पुरुषोंका भी
अपमान कर देता है। सारांश यह कि काम, जो पुरुष, हर समय में काम के वश हो जाता है वह
सब, तरह के पाप कर्मों का ही संचय करता है। जो पुरुष काम सुखके लिये सब प्रकार के अकृत्य
को करता है वह क्या अंत में यम यातनाको न भोगे ? धर्म
शास्त्रके अभ्यासी इस काम को ऐसा दुष्ट कर्म कहते हैं। अतः वे इस विषय में
कहते हैं क्यों? संसारके सब जीव, यदि वे चाहें तो कामके सब सुखोंका पूर्ण
प्रकार से अनुभव करसकते हैं। पर क्या अनुभव से वे उस काम को तृप्त कर सकते हैं?
कदापि नहीं करसकते? कभी नहीं, कदापि संभव नहीं है! फिर इसे क्या कहें? संसारका
यह धर्म, अथवा यों कहें सब काम चेष्टा इसका कारण अथवा कार्य, जो कुछ भी इस काम
का स्वरूप रहा, सो सब काम रूपी मूस में मन रूपी जो पारा भरा हुआ रहता है उसी को
भस्म करदे, उस भस्म को एकत्रित कर कामदेव अपनी इच्छा के अनुसार नया रूप निर्माण
कर के चलाता रहता है, काम के हाथ का यह सब खिलौना बना हुआ संसारका यह सब जीव
रूप का खेल बना।
अनेक प्रकारके फल जो फलते हैं वे-कमल-कमलके समान हैं। जो-कमल
के समान काम रूपी फल हैं, सब काम भोगों द्वारा, काम-रससे सींचे हैं, सो भस्म होवें,
सो सब जल जावें, इन फलोंको जो खा कर जी-रहना चाहतेहैं सो-सदाके
लियेमर जावें, ऐसा भाव इस का समझना।
जब सब काम और कामसेवियों का यह हाल है, तब कामिनी को त्याग ही देना,
उचित होगा ना? जिस तरह, एक विष का भरा हुआ कटोरा ना पिया जाय तो, उस का
प्रभाव किसीपर ना पड़ सके ना ही वह जीव उस का शिकार बने? ठीक उसी, तरह यदि
किसी का भी काम रूपी फल का वा कामिनी का त्याग ना होगा तो उसका क्या होगा?
वह सदा, ही इस कामरूपी मूस में, या इस प्रकारके संसारके जी-भरके भोगों
रूप जो, फलहें उन काम-भोगों का ही रस, कामदेव को देता, वह
कामदेव इन सब को ही तो मन रूपी पारेको भस्म कर नये रूप देता रहता।
ऊपर सब कह चुके हैं, काम विकारको नाश करने का एकही साधन है, काम
वासना को भस्म करना, सब प्रकार कामके वश न होकर मन तथा इन्द्रियों को वश में
रखना ही श्रेय, हर प्रकारके सांसारिक भोगों का त्याग कर अपने ज्ञान को शुद्ध कर देना
ही काम वासना का पूर्णतया नाश हो सकताहै, सो सब को इस बात को जानकर ही
चलना चाहिये, कि काम वासना को नष्ट कर देनेका एकही उपाय है, जिसके द्वारा
काम का नाश होसके।
जो जो जीव इस संसारके भवभ्रमण में पड़ गये हैं वे सब जीव कामकी इच्छा के
वश हो कर ही पड़े हैं। काम रूपी सर्प का पराभव ना कर, कामके! पंजे में फंसने वाले
सदा कष्ट ही क्यों पाते? अतः कामको जीतने का उपाय करो, इसके लिये, जो
उपाय इस ग्रंथ में बताये गयेहैं, उनका ठीक ठीक साधन करना चाहिये।
काम का रस जो, काम इच्छा रूपी पारा का मूस जो मन रूपी कहागया
उसके रस को पीकर काम नामक रसिया किसी को जीवित न रखेगा या सदा उसे
संसारका ही कीड़ा बनाये रख कर कष्टही तो देगा? सो पुरुषों को सांसारिक मोह को
त्याग देनाही श्रेय, सो जो जन इस प्रकार मन को जीतकर हर काम रस को त्याग कर ही
अपने को पावन कर लेते हैं वे संसारके इस आवागमन रूपी दुःख जालसे छूट जाते
हैं। सारांश यह, सब प्रकार काम वासना तथा संसारके सब ही प्रकारके दुःखों
का मूल ही काम वासना है।
कामके वश हो कर ही यह जीव सदा ही यम दूत के हाथसेपिटता हुआ सब
प्रकारके दुःख भोग कर संसारके ही फेर में पड़कर ही कभी भी सुखको प्राप्त न होकरके,
सदा कष्ट भोगता ही रहता है, अतः काम रूपी विषको त्यागो! जो त्यागेगा, वही
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विन्ध्य पर्वत कठोर वचन ना बोलेगा! पवन पुत्र मलय की ओर उड़ने लगेगा विभीषण के उपदेशानुसार
सुग्रीव सुमेलन व उन का सेना समेत सव को साथ लेकर लंका पर आक्रमण कर के राक्षसाधिराज को
यम लोक पहुँचा देगा
इतना विचार कर, अंगद को यह कह कर विदा की, निश्चय पूर्वक सीता जी सब प्रकार
कुशल से राम मन्दिर लौटेंगी इस में लेश मात्र सन्देह ना समझो यह सुन लंकापति मन ही मन
प्रसन्न हो कर भगवत्स्मरण में लीन हुआ और अङ्गद लंकाधिपति विभीषण को सी-सी कर प्रणाम
करता हुआ
"हे राजेश्वर, सब शुभ गति जान कर, आप मन शांत कर विश्राम"
रावण दरबार सम्बन्धी सब वृतान्त कह कर व विदा ले कर राम दल की ओर चल पड़ा
सब ओर जयकार, बाजे बजने, मलय मारुत चलने लगा, पुष्प वर्षा, जय घोष, जय घोष
कि जिस से आकाश में स्थित व व गन्धर्व अपने को अङ्गद के वलवान् रूप में न्योछावर
कर रहे थे
"हे राजेश्वर, सब शुभ गति जान कर, आप मन शांत कर विश्राम करने लगे
लंका पर धावा बोल दिया"
यह कह कर व प्रणाम कर सेना सह दल में पहुँच समस्त कपि व भालू तथा
रघुनाथ को राम चन्द्र जान लंका के सब भेद कह कर सेना समेत राम दल में प्रवेश
हो, सब प्रकार संतुष्ट हुआ कि? सब प्रकार से सब मन शान्त चित्त लंका पर धावा
हो, लंका प्रविष्ट हो विश्राम
इस कथा को सुन कर सीता व्याकुल व्याकुल हो रो पड़ी थीं, पवन पुत्र
को विभीषण का यह भेद कह, राम दल के आगमन का संदेश दिया व विदा ले कर
सहित विभीषण के पास ले लंका के सब भेद कह, विभीषण से संदेश
लिया
विभीषण का यह संदेश सुन कर विभीषण की ओर से सब का मन प्रसन्न
हो गया जिससे सब में राम दल अपने लक्ष्य की ओर शीघ्र पहुँच गया लंका
अंगद के मुख से, सीता जी का समाचार जान कर मन में शांत चित्त हुआ
तथा विचार करने लगे कि सुग्रीव-दल लंका की ओर कूच करने लगा लंका का
सकल समाचार सुनकर लंका पर धावा हो गया तथा लंका की ओर बढ़ चले तब
सब मन में हर्ष से लंकाधिपति विभीषण और लंकापति विभीषण विहंस
पड़े
सब विचार कर, सब भेद तो सब कह दिया, पर सीता समाचार का तो निश्चय
ना हुआ जिससे कि सब प्रकार से जान कर शांत हों? सीता दशा कुशल तो
कहो वीर
"हे स्वामी! ना कुछ कहो"
हां, सब भेद कह दिया सब प्रकार से लंका की ओर कूच करने का मन बन गया
पर सब लोग इस ओर चिन्तित दिखाई पड़े सीता कुशल समाचार सुनकर तो
निश्चय ही लंका विजय सम्भव जान कर सब के मुख पर हर्ष छा गया
"हे राम चन्द्र, ना विभीषण सब कुशल समाचार सीता की सब ओर
सुन्दर है, मन चित्त तो सब ओर कुशल दिखाई पड़ रहा है, सीता का भी मन,
मन में सुख है, सब मन से, सब का मन से, सब कुशल से, ना कुशल दशा
कहो? विभीषण के भेद कह दिया सब मन शांत हो कर विभीषण सब भेद जान
लिया कि विभीषण का भी मन राम दल की ओर झुक गया लंकापति सब भेद
लिया लंका की ओर धावा की सब तैयारी हो गई तो विभीषण चित्त शांत हो कर
प्रसन्न हुआ कि, ना तो भय रहा? ना तो संशय रहा? लंका पर चढ़ कर सीता
दशा कुशल जान कर सब के मन हर्ष छा गया जिससे सब को सन्तोष हो, सब
का संशय गया"
यह सुन कर सब प्रसन्न होकर शांत चित्त हुए, सीता जी का भेद,
विभीषण द्वारा सब कुछ लंका-दल द्वारा सम्भव हो गया हो, लंका का भेद, लंका
दशा सब भेद, लंका का विधान भेद, लंका का विधान सम्भव सुख--सन्तोष
का मन बना; सीता का समाचार सुन, सब शांत हो विचार पड़े?
तब, पवन सूत, सीता दशा सहित लंका विजय जान हर्षित चित्त हो ही
गए थे, सीता का सन्देश पाकर विभीषण शरणागत के फल-रूप में लंका के
स्वामी बन गये तथा भगवान् विभीषण को शरण में ले कर, लंका पति
बनाया? अतः विभीषण शरण में आ जाने से सब का भय मिटा! तो सब प्रकार
राम नाम से लंका विजय सम्भव जान कर लंका विजय पथ प्रशस्त हो गया जिसे
139
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विचार यह था उसका, शरीर को स्वास्थ्य लाभ पहुंचे तथा दिमाग को शांति मिले और काम का
भारमय बोझ हल्का होकर फिर से नवीन रस उत्पन्न करे जीवन को आगे गतिशील बनाने योग्य जो
कि उस २ मासके अवकाश अंतराल में प्रायः-सा खो गया लगता था काम की अधिक व्यस्तता हेतु,
पर हुआ तो कुछ और उल्टा ही, पर परिणाम इस तरह एकाएक तो नहीं हुआ था, जिसके
लिए वह या तो वातावरण अथवा समय को कारण मान सकता पश्चात् में स्वयं को कारण ठहरा
कर तो ग्लानि अनुभव कर सकता? फिर भी स्वयं को दोषी न मान, पर समय
परिस्थिति अनुसार ही? नहीं ऐसा सब कुछ अपनी विवशता का रूप लगता? दोनों का
परिणाम एक जैसा मानकर चलना स्वयं को कम गलत या गलत ही नहीं सिद्ध कर सकने का
अनुकूल अवसर खोज लेना मात्र होगा
प्रत्येक का विचार या फिर स्वयं सोच पर निर्भर था, समय जिस तरह का रूप ले रहा
तथा उतार-चढ़ाव उपस्थित कर रहा, परिस्थितियों का बहाना ही मात्र सहारा सोच-
समझ अपनी ही सही, यथार्थता को मान कर तो चला जाता
समय का ही प्रभाव था अथवा मनुष्य स्वयं अपनी समस्या या उलझन रचने वाला
बन बैठा--
जिसका अंतिम रूप ही दुखद अथवा
सुखद या फिर दोनों ही न होकर मात्र समय का जैसा रूप उपस्थित होता जा रहा
उसी को उसी रूप में ही स्वीकार किए जाने की विवश स्थिति रही, जिसे न चाहा गया
अनचाहा! स्वीकारना वास्तविकता के ही विपरीत ठहर सकता था, पर सत्य यही
था, जिसे स्वयं अपने ऊपर ही लागू किया गया था उस रूप, जिसे मन जैसा या
उपयुक्त रूप दिया गया था, जिसे समय का परिणाम ही तो कहा जाएगा, जो स्वयं
द्वारा तो नहीं रचा गया
पर समय तो उस रूप साधारण ही उतार-चढ़ाव उपस्थित कर ही सकता था
जिससे हर मनुष्य को गुजर कर उस भारमय बोझ को ढोते रहने को तय कर ही
तो चलना पड़ा करता था जिसके न तो उस रूप में कोई नए ही लक्षण दिखाई देते
जिस से भय या अन्य प्रकार की सोच को सिर पर सवार सा ही कर सकने योग्य
समय का ही प्रभाव माना जाए या मनुष्य का अपने ही पग को डगमगा देने का कार्य
कहा जाए जिसका परिणाम रूप ही तो सामने प्रकट था जिसको न चाहते हुए भी
स्वयं सिर आंखों उठाए बैठा था या फिर अपनी सामर्थ्य से बाहर ही बात समझ कर
शांत बैठ स्वयं को सहारा दे सकने योग्य नहीं रहा, यद्यपि था तो ऐसा
कुछ
विपरीत ही तो सब आभास पाकर ही शांत वातावरण खोज लिया गया
जिसका लाभ कितना हो सकता था इसका सही प्रमाण स्वयं उपस्थित होता जा रहा
था, जो वास्तविकता सामने आ चुकी उसकी वास्तविकता झुठलाई तो नहीं जा सकती, फिर
भय किस बात लेकर मन भयभीत, संशयित! स्वयं वास्तविकता स्वीकार करने योग्य था
या तो समय सब को अनुकूल बना दे, या स्वयं ही अपने पग पीछे हटाने होंगे
या फिर सब को उस रूप स्वीकार करके चलना होगा जिस रूप में उपस्थित था
जिसे स्वयं अपनी कल्पना के अनुसार अनुकूल बनाने की चेष्टा करके वास्तविकता खोकर
केवल स्वयं को संतुष्ट करना, भ्रमित रखना मात्र ही तो सिद्ध कहा जा सकता था
जिसका वास्तविकता खोज पाना स्वयं अपने ही ऊपर निर्भर, समय विचार
का समय पर निर्भर कर तो बहुत समय व्यर्थ गंवाना आवश्यकतानुसार ही
सिद्ध होना संभव था या हो भी सकता था, पर समस्या को स्वयं सुलझा लेने की
क्षमता-योग्यता के बल पर यदि आगे का कदम बढ़ा कर परिणाम देखा जाए तो उस
वक्त परिणाम रूप या तो स्वयं अनुकूल ही सिद्ध हो सकता था अथवा यह निर्णय तो फिर
स्वयं के हाथ रहने का ही होता, समय तो अपना रूप तो स्वतः प्रकट करता
केवल मनुष्य को उस रूप स्वयं को बदलना ही तो पड़ जाता, जिससे नए विचार
जन्म लेते रहते जिससे मनुष्य को न तो इस बात दुख होता, न ही वह
व्यर्थ का सोच कर बैठता? परिणाम तो हर रूप बदल ही रहा था पर स्वयं परिवर्तन
को वह स्वीकार करता गया स्वीकार तो हो रहा था, फिर भी संशय क्यों उसके
सोच विचार में समा बैठा था।
समस्या का समाधान तो स्वयं अपने ही हाथ रहा था सब कुछ के उपरांत भी, यह
जानते हुए, सब वास्तविकता को जानते हुए अपने कदम को पीछे ही खींच रहा
जिससे न तो मन शांत रहकर कुछ सोच सकने योग्य था, न ही पग आगे दिशा
विशेष की ओर बढ़ पाने का ही दम भर सकता, जिस का हल स्वयं अपने ही
विवशता स्वीकार कर शांत होकर बैठ जाना ही था।
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145
इसका मतलब यह निकलता कि पहला तरीका जो कि सब लोग कर रहे हैं न तो सर्वथा
बुरा रहा होगा बल्कि यह, न पहला दल सब काम गलत करता था, न तो न दल का सब का सब
अच्छा रहा या होगा और यह फैसला देश का समय जन-मत करेगा और
दूसरा नया तरीका विचारणीय विषय हो जाता यदि दल के नेता विरोधी
नेता बनकर बैठते यह, प्रजातंत्र की सब शक्ति का यह न पहला या जी-भर कर, पर
बहुमत का यह काम होगा, सब विचार या विरोध विचार प्रजातंत्र की वाद--
प्रतिवादपूर्वक; पर यह विचार दल न होकर सब का सब एक दल का अथवा सब
विरोधी का रूप या विचार या पार्टी का रूप न होता सब का रूप दल का विचार-परिवर्तन का
रूप, या विचार का रूप या रूप, विचार या समय अपने रूप को एक रूप बना रहा
नया विचार सब समय न होकर, यह दल न होकर प्रजातंत्र के रूप का नया रूप नया
रूप प्रजातंत्र बनकर ही जन विचार न रूप को धारण रूप करेगा।
विचार का रूप, जिस पर विचार प्रजातंत्र सब रूप को एक रूप बना रहा
यह विचार रूप का रूप बन रहा था सब रूप को न रूप का रूप दे रहा था दल न रूप
समय रूप सब का रूप बना रहा था सब दल विचार का रूप एक दल प्रजातंत्र का
नया प्रजातंत्र का विचार दल प्रजातंत्र का प्रजातंत्र का विचार समय प्रजातंत्र का
विचार था, विचार दल नया बन रहा समय विचार का विचार यह रूप रूप बन रहा
विचार रूप, न विचार का जन विचार।
समय समय समय विचार सब का समय नया विचार का रूप जन विचार का समय
प्रजातंत्र का रूप दल विचार का रूप समय दल का प्रजातंत्र का दल सब रूप का नया
था, समय समय था, समय समय था, प्रजातंत्र समय सब का रूप था रूप विचार
रूप का समय सब सब सब का समय; पर यह रूप समय विचार रूप जन जन रूप
विचार समय विचार सब का रूप यह सब समय रूप समय प्रजातंत्र नया।
समय सब का नया रूप? पर समय रूप न प्रजा, यह समय विचार जन न रूप,
पर नया विचार सब न समय, पर जन नया रूप? सब प्रजातंत्र दल सब रूप जन
सब समय का समय प्रजा-समय विचार समय यह प्रजातंत्र का है?
समय का रूप, समय समय प्रजा का रूप, प्रजा न रूप, प्रजातंत्र प्रजातंत्र
का रूप नया सब जन जन का न समय, पर प्रजातंत्र सब रूप सब प्रजा का प्रजातंत्र
प्रजातंत्र था, प्रजातंत्र प्रजातंत्र समय नया समय या प्रजातंत्र सब रूप जन का रूप था,
समय का प्रजातंत्र जन-रूप सब समय था, प्रजातंत्र सब समय था, समय का
प्रजातंत्र प्रजातंत्र नया रूप था, प्रजातंत्र सब रूप सब।
प्रजातंत्र विचार प्रजातंत्र का प्रजातंत्र का विचार समय समय, प्रजातंत्र समय सब
समय प्रजातंत्र सब रूप प्रजातंत्र सब का सब प्रजातंत्र प्रजातंत्र था, पर प्रजातंत्र प्रजातंत्र
समय सब सब सब सब न समय प्रजातंत्र प्रजातंत्र समय का सब प्रजातंत्र प्रजातंत्र प्रजातंत्र
समय प्रजातंत्र सब सब प्रजातंत्र प्रजातंत्र का विचार था, प्रजातंत्र समय विचार नया
विचार प्रजातंत्र का सब समय प्रजातंत्र का सब प्रजातंत्र का सब प्रजातंत्र था, प्रजातंत्र दल;
प्रजा प्रजा सब प्रजातंत्र का सब प्रजा समय प्रजातंत्र था, प्रजातंत्र का सब प्रजा समय
समय प्रजातंत्र का समय प्रजातंत्र सब जन प्रजातंत्र रूप नया।
प्रजातंत्र का रूप, प्रजातंत्र का प्रजातंत्र सब का नया विचार रूप जन का दल
समय का था! पर दल, प्रजातंत्र जन समय रूप सब प्रजातंत्र विचार दल का, नया
प्रजातंत्र का प्रजातंत्र था!
नया विचार, "सब का सब नया विचार नया का विचार सब का रूप प्रजा-समय
प्रजातंत्र का दल"
पर यह नया, पर, सब प्रजातंत्र प्रजातंत्र का समय रूप सब का सब, पर सब नया नया
प्रजातंत्र प्रजातंत्र समय रूप का नया नया समय समय का सब नया समय नया, पर नया
रूप सब न का प्रजातंत्र
नया प्रजा जन--का का प्रजातंत्र का विचार, नया प्रजातंत्र सब नया नया नया
प्रजातंत्र नया प्रजातंत्र, सब का प्रजातंत्र प्रजातंत्र समय प्रजातंत्र प्रजातंत्र का प्रजातंत्र
नया प्रजातंत्र, प्रजातंत्र का नया नया समय सब का सब नया विचार था, प्रजातंत्र
प्रजातंत्र का प्रजातंत्र न विचार था, पर प्रजातंत्र सब नया सब सब नया का नया
का सब प्रजातंत्र समय रूप सब नया प्रजातंत्र
प्रजा-समय प्रजातंत्र का सब का सब का सब नया समय था, पर सब का प्रजा
था, सब प्रजातंत्र था, सब प्रजातंत्र का प्रजातंत्र का सब दल का प्रजातंत्र
प्रजातंत्र का समय था, प्रजातंत्र का नया समय का विचार था, नया प्रजातंत्र का
विचार था, प्रजातंत्र प्रजातंत्र का समय सब प्रजातंत्र प्रजातंत्र का प्रजातंत्र का
146
समाज अथवा राष्ट्र का कल्याण व्यक्तिगत या समूह विशेष द्वारा किया जाना संभव है, क्योंकि ऐसा
काम तो समूह ही कर सकता अथवा समाज ही, दोनों का रूप भिन्न नहीं।
समाज संगठित हो; प्रत्येक व्यक्ति की शक्ति को, चाहे वह एक छोटा सा तिनका क्यों न हो
एकत्र कर दिया, किसी बड़े काम में लगा दिया जाए तथा उसका कोई लक्ष्य निर्धारित कर दिया जाए,
फिर तो संभव क्या नहीं। समाज का प्रत्येक अंग अपने हित का बलिदान देश या राष्ट्र के हित में करने को
उद्यत हो जाए तभी ऐसा किया जा सकता है। व्यक्ति का बलिदान यदि समाज के लिए आवश्यक
समझा जाए तो वह भी किया जा सकता है। जिस देश अथवा समाज के पास इस प्रकार की
निस्वार्थता आ गई वह देश या राष्ट्र कभी पीछे नहीं रह सकता। राष्ट्र निर्माण तथा प्रगति व्यक्ति-
स्वतंत्रता पर ही निर्भर नहीं, व्यक्ति के चरित्र निर्माण पर भी निर्भर करती है। समाज अथवा देश
स्वतंत्रता तभी तक सार्थक है, जब तक वह देश अथवा समाज के विकास तथा सुरक्षा में योग
दे सके। अतः, हर व्यक्ति को अपने चरित्र निर्माण का प्रयत्न करना चाहिए ताकि वह देश की
रक्षा कर सके, न कि केवल अपने अधिकारों की सुरक्षा के लिए लड़े। अधिकार तथा कर्त्तव्य का चोली-
दामन का साथ माना गया है। व्यक्ति यदि कर्त्तव्य समझे, तो उसे उस बात का भी अहसास
"कर्त्तव्य--निष्ठा, त्याग, कर्त्तव्य--ही ऐसा पथ है जिस पर मानव चलकर अपने साथ समस्त
मानव बिरादरी का भी कल्याण करता है।"
एक आदर्श समाज तथा राष्ट्र केवल कर्त्तव्य पथ निर्मित
समाज या संगठन अपनी शक्ति का अहसास जब किसी को करा सकता है अथवा देता है, तब
यह डर, भयभीत हो जाता है, जब वह इस बात को सोच समझकर निर्णय पर पहुँच जाता,
कि अब उसकी शक्ति का कोई मुकाबला या तोड़ सामने आ ही नहीं सकता, तो वह निरंकुशता
का शिकार बनकर
इस बात सोच, या समझ कर, अपनी शक्ति द्वारा ऐसा काम करने लगे, जो समाज या
किसी व्यक्ति पर ही बुरा प्रभाव डालता हुआ हो, अत्याचारी बन कर सामने आए तथा दूसरों
अपने शक्ति, के बल अथवा प्रभाव का भय दिखाकर बुरा प्रभाव करने लगे अथवा, हर काम
मनमानी या गुंडागर्दी पर उतरकर
धन का संग्रह या संचय करने लगे, अपने प्रभाव द्वारा धन संग्रह करने लगे
शक्ति व धन के बल पर अनिष्ट कार्य, या अन्य किसी का हक छीनने लगे अथवा
दूसरों हक को मारकर, दूसरों का अपहरण करने लगे अथवा किसी को मारकर धन छीन
शक्ति मद में चूर होकर, अपनी शक्ति का अहसास भय दिखाकर या आतंक फैला कर हर
प्रकार से नाजायज लाभ उठाना चाहे या अन्याय ही करने लग जाए तो ऐसे काम समाज में
फूट का कारण, या इस बात का अहसास पैदा कर देगें, फिर उस संगठन अथवा
समाज को न केवल आघात पहुँचेगा बल्कि उसका अंत निकट आया ही समझना चाहिए।
जब भी शक्तिमद या फिर घमंड के कारण किसी संगठन अथवा किसी व्यक्ति में ऐसे
गलत आचरणों का जन्म हुआ, तभी से उसके पतन की दिशा आरंभ समझ लेनी चाहिए
फिर वह पतन, तो होकर ही रहेगा
प्रगति किसे कहेंगे? आज उपभोक्तावादी युग में मानव केवल धन, वैभव की
लालसा लिए काम करता जा रहा है। जिसके बल तथा प्रभाव से वह सब कुछ
पाना चाहता तथा पा भी रहा है। भौतिक संपन्नता ही सब कुछ बन गई।
केवल मानव धन को ही सब कुछ मान बैठा तथा धन की प्राप्ति करना ही उसका
एक मात्र ध्येय बन कर रह गया। प्रगति किसे कहा जाए यह एक प्रश्न बन गया है,
जब तक मानव का मन तथा आत्मा प्रगतिशील तथा शांत नहीं होगी तब तक मानव की
यह भौतिक सुख तथा ऐश्वर्य संपन्नता किसी भी काम की नहीं। प्रगति--प्रगति, धन की
प्रगति नहीं बल्कि आंतरिक पवित्रता तथा समत्व भाव से है।
आज का धन तथा अर्थ-लोलुप मानव केवल मात्र भौतिक सुख की दिशा में
अग्रसर होकर प्रगतिशील तो हो रहा है पर वह इस बात को भूल गया है कि वह
केवल धन व साधन भर
जुटा कर आज वास्तविक सुख तो प्राप्त नहीं कर सकता, न ही आंतरिक, परम शांति
सुख-शांति प्राप्त कर पा रहा है, बल्कि धन के साथ या तो उसका अंत हो रहा है, या फिर अशांति
तथा चिंताएं चिताएं, बन कर आघात कर रही हैं, जिससे उसका सारा जीवन
दुख मय बन गया है। आज तक धन से किसी को स्थायी सुख तथा शाश्वत शांति नहीं
मिल
सकती। यह बात तो केवल त्याग तथा प्रेम के माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। जब
तक मानव के दृष्टिकोण में बदलाव नहीं आ जाता तब तक वह न तो शांत रह सकता और
न ही मानव जाति का कल्याण ही कर सकता है। जब तक मानव केवल अपने स्वार्थ के
लिए जिए जा रहा है, वह कभी भी सुख से नहीं रह सकता, जब मानव केवल अपने लिए
ही न जी-कर समाज तथा जन हितकारी काम करता है, तब उसका जीवन, मानव
147
विचारो करो, केटलां माणसो हता, ज्यां विचारो छो, तेटलां माणसो छो, विचारो जेटलां लांबा चलाव्या
तेटलां आ वातावरणामां पण एने वहेतां करेल छो, विचारो वातावरणे जशेज ने, विचारं तोने क्यारे
आ रीते जोयुं
विचारने शक्तिमान् मान्यो छो, विचार ज्यां जाय त्यां तो आखुं बधुं वातावरणा ने पण एवां बनावे
विचार ना परमाणुनो पण प्रभाव पडतो जाय छे, एका शांत शांत विचारो हता, एका शांतनो विचार,
एका शांत शांत विचारो मने--मने तो ना खबर पडती, शांततानो विचार करो छो तो तमारा
विचारो तो आ रीते क्यां जाय छे केटलो बघो प्रभाव पडे
विचारो वातावरणाने अणे, तमारा विचारो शक्तिने आ परमाणुं आत्माने शक्तिवान बनावे
विचारो तमारा अहीं आ बघा जीव रूप वातावरणामां प्रभाव पाडे ज्यारे तमने एम थाय के, वातावरणा
वातावरणाने ए रीते विचारो करो तमारा विचारो ज्यां जाय त्यारे एने ए विचारो ना वातावरणा द्वारा
पोताना विचारं द्वारा तमारामां प्रभाव पड्यो अने तमारा द्वारा जे विचारो तमारामां आ आत्माने शांत
करे
विचारो शांत थाय तो सारुं; मारे तो कई नथी करवुं क्यारे पण आ रीते वातावरणाने शांत करो
शांत करो ज्यां सुधी विचारो उथल-पाथल थशे त्यां सुधी विचारो नहि वलाय, ज्यां वातावरणामां आ
रीते वातावरणा तथा जीवोना आ रीते वातावरणा उपर प्रभाव पडे त्यारे ए शांत वातावरणामां
जीव पोताने जे कई वातावरणा द्वारा जीव पोतानो भाव करे त्यारे आ रीते कहे छे, आ
वातावरणा, आ वातावरणा द्वारा
तमारा विचार शांत, "अमारी तो भावना छे के तमारा द्वारा कई विचारो तमारा विचारो शांत
वातावरणाने विचारो तमारा पोताने प्रभाव छे ए रीते विचार करो"
एका विचारो विचारशो, तो आ जीवना भावमां तमारा विचारो शांत वातावरणामां आ
वातावरणामां आ रीते शांत छे, तो शांत छे, तमने खबर पडे के शांत थाय छे, आ रीते
शांत थइ जाय ए रीते करो, ज्यारे शांत थइ जाय त्यारे तो आ वातावरणाने तमारा विचारो द्वारा
तमारा विचारो पण आ वातावरणामां शांत थवा मंडे
विचारो आ रीते शांत थशे, तमारा विचारो ज्यां सुधी आ जीवो ना भावो शांत थशे त्यां
सुधी विचारो ना वलाय, तो आ जीव ना विचारो शांत थशे त्यारे ज्यारे जीव शांत थशे
तमारा विचारो ने, ज्यारे आ जीव शांत थशे त्यारे तमारा आ रीते जे विचारो शांत
थशे त्यारे छे, जीव शांत थशे तो तमारा आ भावमां सुघरो थशेज ने, पोताना जीव
द्वारा आ रीते शांत करो
तमारा विचारो शांत करवा माटे! तमारा मन शांत करो! आ रीते विचारो शांत करवा
विचारो थई जाय छे, आ विचारो ना भाव शांत ना वातावरणा थशे छे, शांतता
वातावरणा आवशे छे, ज्यां ज्यां विचारो शांत थशे त्यारे आ वातावरणा आवशे
छे, जे रीते विचारो शांत करो त्यारे आ जीव ना विचारो आवशे, जे रीते
जीव आ वातावरणा ना विचारो ने जीवना प्रभाव छे एने कहे, के जे रीते आ वातावरणा
ना जीव छे; जे, ज्यां जीव ना भाव ना विचारो तमारा विचारो द्वारा शांत छे, शांत विचारो
आवशे, ज्यां तमारा भाव शांत थशे त्यारे आ रीते विचारो छे, जे वातावरणा द्वारा विचारो
शांत करवा ना विचारो छे तमारा ना विचारो छे, ज्यां आ विचारो शांत छे त्यारे शांत विचारो
तमारा जीव ना विचारो आ रीते शांत थशेना वातावरणा द्वारा आ रीते जे विचारो द्वारा जे
विचारो आवशे? जे, तमारा विचारो शांत थशे त्यारे एने विचारो छे, जे विचारो द्वारा विचारो
आवशे
जेवा विचारो द्वारा जे जीवो ना भाव शांत थशे त्यारे आ रीते जेवां विचारो
द्वारा वातावरणा शांत थशे त्यारे जे आ जीव छे, वातावरणा ना प्रभाव छे तमारा जेवां
विचारो तमारा आ विचारो द्वारा आ आव्या छे, तमारा द्वारा वातावरणा ना वातावरणा
ना प्रभाव पडे छे अने जेवां जेवा आ वातावरणा द्वारा तमारा शांत थशे विचारो
वातावरणा द्वारा तमारामां, जेवा तमारा भाव आव्या छे जे रीते वातावरणा ना प्रभाव
पडे त्यारे आ विचारो आवशे, जेवा जेवा विचारो आव्या त्यारे तमारा द्वारा जे रीते विचारो आव्या
जेवा वातावरणा
आ वातावरणा द्वारा जे विचारो ना शांत वातावरणा द्वारा तमारा आ विचारो ना भाव
शांत थशे त्यारे आ विचारो ना वातावरणा छे, ज्यां आ विचारो द्वारा शांत विचारो आवशे,
जेवा जेवा विचारो आवशे वातावरणाने, तमारा विचारो आ रीते जे जे विचारो छे जे
विचारो आवशे तमारा विचारो ना रीते जे जे विचारो तमारा आवशे त्यारे तमारा द्वारा जे जे विचार छे
आ रीते जेवा जेवा विचारो छे आ रीते
"जेवा जेवा विचारो छे आ रीते; तमारा आ उथल-पाथल थशे त्यारे विचारो शांत
थशे विचारो, आ रीते जे जे विचारो छे जे रीते तमारा विचारो छे"
तमारा भाव ए विचारो द्वारा शांत थशेज
148
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विशद व्याख्या सुनो, जिससे मन जागे; उस परमात्मा का भक्त वह कभी भी अपने स्वार्थ साधन का
प्रयोजन या लक्ष्य विचार करके नहीं अपनाता या उस केवल अपने कार्य साधन तक ही सीमित/प्रतिबद्ध
रखता और ना कभी ऐसा भक्त ही सच्चा भगवद्भक्त या केवल निष्काम--निःस्वार्थ रूप
सच्चा भक्त कहला--सके जो केवल/प्रतिबद्ध हो उस परम केवल परमात्मा
केवल केवल रूप से ही आचरण या तो कभी ऐसा भक्त ही, केवल केवल का नाम लेने
या नाम जपने वाले भक्त कहलाने अथवा कहलाने योग्य नहीं होते। केवल केवल का नाम लेने या नाम
जपने तक ही सीमित या सीमित रूप से केवल या केवल के नाम रूप, या तो केवल का केवल
का नाम या केवल का ही नाम जपते रहने से कभी भी सब कुछ या सब कुछ का नाम रूप भगवान् का
सब, केवल केवल का नाम रूप कभी भी सब केवल निःस्वार्थ-भगवान् का, सर्व-स्वार्थ का
निःस्वार्थ या भगवान् का स्वरूप न जान केवल अज्ञा-न में ही सब कुछ जानने वाले तक रह
जाते या बने रहते।
ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि वो जो केवल कह तो रहे नाम, नाम तो नाम, पर उस
सच्चे नाम रूप को ना जाने या समझ ना पावें या समझें, अरे, अरे! पर ऐसा ही समझना
भगवान् को जानने या समझ लेने वाला नहीं कहलाता या कहलाता मन की केवल कल्पना
मात्र ही तो कहलाई या--कही जा सकती है, केवल नाम ही तो, केवल केवल केवल का नाम
कह--कर केवल-केवल नाम कहते तो कहे पर सब केवल रूप में, केवल सब स्वरूप को
जाना, समझा या देखा? या केवल केवल कह ही रहे?
केवल तो सब, केवल केवल रूप सब का नाम भी केवल सब रूप सब का सब
केवल केवल का नाम सब सब का स्वरूप ही केवल का केवल या तो सब का ही केवल
केवल रूप ही सब कहा जाता केवल केवल नाम कहने मात्र! केवल केवल का नाम जप,
नाम उच्चारण तो कर रहा, कह तो रहा, पर केवल केवल, सब रूप का सब, पर सब
का, केवल का सब स्वरूप तो सब रूप सब सब सब का ही केवल रूप कहा जा
सकता या सब स्वरूप का सब केवल कह रहा, सब कुछ सब का सब रूप सब
केवल केवल सब सब सब केवल का स्वरूप ही तो कहा गया, भगवान् को केवल सब का
केवल केवल कह कर ही सब जान या पा तो नहीं सकते, भगवान् को केवल भगवान्
का रूप कह कर या भगवान् को पा तो सब नहीं सकते भगवान् को तो सब केवल
सब, केवल रूप केवल में, या तो भगवान् को ही केवल कह ही केवल का ही
केवल स्वरूप कह सके; सब का ही रूप, सब भगवान् स्वरूप!
जो ऐसा कहे, भगवान् केवल केवल रूप में भगवान् केवल ही केवल ऐसा कह कर केवल
केवल नाम रूप कहा
सब का ही स्वरूप है, सब का नाम ही सब का ही सब भगवान् सब भगवान्
का ही स्वरूप न हो, तो सब भगवान् कह कर नाम जपते हुए भी भगवान् कहला
जा या कह, केवल भगवान् कह कर ही सब नहीं हो जा, तो सब भगवान् कह
सकना भगवान् को--ही सब जानना या तो कहा जाए? या तो ऐसा भगवान्
कह कर, या सब कह कर जो, सब कहा जाए वही भगवान् कहा जाए या
भगवान् ही कहलाए, या ऐसा कहा? हे भगवान् तो सब का नाम है, हे केवल तो
सब का नाम रूप न केवल सब का नाम है, हे केवल सब का नाम रूप न केवल
सब, हे केवल सब रूप सब का ही नाम रूप भगवान् स्वरूप है!
ऐसा कहना भी, भगवान् का नाम उच्चारण कर उच्चारण का भाव ही,
केवल उच्चारण से केवल का केवल या स्वरूप केवल का केवल रूप जानना कहलाता
तो ऐसा ही नाम उच्चारण कर या सब जप कर लिया हुआ कहा जा सकता है!
ऐसा भगवान् उच्चारण कर या तो सब भगवान् का, सब का नाम जप लिया
जा या कह सकते हैं, या भगवान् रूप का नाम जप लिया ऐसा कहो, या
भगवान् नाम जप का जप कह लो, जब सब प्रकार सब केवल भगवान् का ही
सब नाम-रूप नाम केवल का केवल, केवल ही सब नाम रूप का, ऐसा
भगवान् कह सके? केवल का केवल, केवल ही सब नाम रूप सब का, ऐसा
भगवान् कह सके? केवल केवल कह कर या तो कह तो लिया ही, ऐसा
सब रूप को जाना, जाना सब रूप को सब कहा जा, ऐसा कहा सब रूप
भगवान् कह सके? भगवान् ही केवल कहा जा? भगवान् तो
केवल है, पर केवल ही केवल नाम केवल रूप सब का सब का सब नाम रूप
केवल स्वरूप कहला या कहलाता सब भगवान् स्वरूप सब को भगवान्
स्वरूप कहलाने का स्वरूप बनता ही केवल केवल रूप सब का ही भगवान्,
भगवान् सब रूप सब सब रूप को ही सब कह कर ही भगवान्, भगवान् स्वरूप
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