सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: एक ओंकार सतनाम (जपुजी साहिब व संत दृष्टान्त) · ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन · 1975 (उद्गम)

DevanagariHindipublished322 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 322 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 25

पत्र लिखने पर चार मास बाद उत्तर प्राप्त हो रहा था, सो भी सब प्रकार संशय उत्पन्न
करने का कारण था।
"पत्रिका का नया अंक छप गया, ग्राहक को तीन-चार रु० भिजवाइये, आपके घर
पर सब कुशल है। ससुराल वाले चार सौ रु० और मांगते हैं। आपका बड़ा लड़का
दस बार बीमार हो चुका अबकि बार बच गया तो बच गया वर्ना गया समझो, घर
पर किसी से बन नहीं रही सो मैं अमुक के पास जा रहा हूँ।"
ऐसा समय न आये तो क्या सब कुछ न आये।
इस प्रकार का पत्र जब घर पर आ रहा हो तो, वह मन स्थिर या शान्त रह
सके गा?
जब कोई व्यक्ति घर परिवार से दूर काम पर जाता हो अथवा, रोजगार
करने जाता अथवा घर बैठ कर ही सब काम काज करता हुआ काम चलाये? रोजगार करने
में कठिनाई आये तो समझ लें, आपके घर का आधार ही समाप्त हो रहा अथवा, यह
विचार कर चिन्ताग्रस्त हो कर बैठ गया हो, काम करने में भी रुचि समाप्त हो
जाये तब उस व्यक्ति से आशा क्या होगी?
रुपये पैसे का कष्ट, संकट घर पर घर के काम में आयेगा? या तो घर बन्द कर
के बैठ गये हों, रोजगार में कोई नया काम सोचा? सब काम बन्द हो, बच्चे
के लिये या अपने सिर पर सिर छुपाने के लिये अपने सिर पर मकान बना हो, या
फिर उस से कर्जा वापस मांगा गया हो?
मनुष्य यह सब सोच कर ऐसा काम करता है, रोजगार में लग जाता है, सब
चिन्ता छोड़ कर अपने काम पर निरन्तर अग्रसर हो या परिवार में सिर छिपाने
का साधन खोज निकाले अथवा यह, मन को समझा लेवे कि जब तक मेरे बच्चे
जीवित हैं, अपने ही रोजगार द्वारा सब कुछ कर लूंगा तो वह सब कुछ बना ले, सब
घर को ठीक कर ले जब तक स्वयं अपने हाथ पैर से काम करे, हिम्मत करके
उठे, संकटों को सब प्रकार दूर करे, समझ बूझ कर, बुद्धि लगा कर, रोजगार
बढ़ा कर, सब कुछ ठीक कर सकता है लेकिन आलसी हो कर बैठ जाय
या समस्याओं अथवा घर के सब रूप रंग देखकर घबरा कर बैठ जाय
तो, कभी भी सब प्रकार के सुख प्राप्त नहीं कर सकता है, जब तक मनुष्य
संकटों का डट कर सामना करे, सब कुछ स्वयं करने की हिम्मत करे तो
सफलता उस के चरण चूमेगी! घबराने से, सब कुछ हाथ से जाता रहता है।
सब को छोड़ कर सिर पर हाथ रख कर, बैठकर रोने लगे अथवा रो कर बैठ
जाय तो इस का कोई हल
निकलने की आशा नहीं हो सकती है, जब भी सब कुछ हाथ से गिर गया
अथवा व्यापार में सब दो--चार सौ का नुकसान दिखाई दे रहा हो--तो यह
तो नहीं हो गया, कि व्यापार बन्द ही करना या सिर पकड़ कर बैठना? फिर काम
किसने पूरा किया?
जब व्यापार को नया रूप देकर दो-दो काम हो, कार्य विशाल रूप बना
कर सब प्रकार साधन जुटाकर दिन-रात परिश्रम से काम कर लाभ प्राप्त
कर सकता, चिन्ता दो-दो काम की, कार्य सब प्रकार रूप रंग बदल
सकता सब कुछ है, तो सिर पर हाथ, रख कर दो--चार चिन्ता करके बैठ
जाने से क्या लाभ पहुंचेगा? यह सब कुछ तो मनुष्य करता ही रहता सब
प्रकार के लाभ स्वयं प्राप्त करके सफल हो सकता।
जब देखा गया, व्यापार बन्द कर दिया गया तो सब काम ही बंद हो
गया, ग्राहक भी घर बैठा रह कर इन्तजार करता है, ग्राहक मन ही मन में यह
सोचता रहा उसने माल बाहर से ला कर देना था सो नहीं दिया है, सो तो जो काम
का चक्र चलना था रुकावट उसने स्वयं उत्पन्न की जिससे वह माल मंगवाता रहा
होगा, अब वह माल अपने पास ही रख कर पछतायेगा, सोच विचार
करके जब तक माल घर पर पड़ा रहेगा तब तक पैसा फंसा रहेगा, काम सब ही बंद
रहेगा सो तो माल बाहर का भी रुक गया उसने व्यापार ही बंद कर दिया, सब ही
नुकसान सब तरह का उठाता रहा जब तक वह यह सब सोचता तब तक और दिन बीत
गये सो दिन का चक्र तो दिन के समय ही चलना है रात को समय पूरा हो जाना
सो यह तो २४-घंटे रोज, कम होते जा रहे हैं और सब प्रकार के नुकसान को
नुकसान ही बढ़ रहा सो सब प्रकार की सब ओर चिन्ता बढ़ती जाती रही।
25